भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 194 में से

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पृष्ठ 189

नीतिशतकम् १६७

मार्जितुम् = पोंछने के लिए, मूकभावः = चुप रहना, मूर्धजाः = केश, मूर्ध्नि = सिर पर, मृगाश्चरन्ति = पशु विचरण कर रहे हैं, म्लानेन्द्रियस्य = शिथिल इन्द्रियों वाले का।

यथेष्टम् = इच्छानुसार, यशः काये = यश रूपी शरीर में, योजयते = लगाता है, रञ्जयति = प्रसन्न करता हैं, रजताद्रिणा = चाँदी के पर्वत द्वारा, रुचिराकारः = सुन्दर आकृति वाला, रोद्धुम् = रोकने के लिए, लब्ध्वा = प्राप्त करके, लाङ्गलाग्रैः = हलों के अग्रभागों द्वारा, लाङ्गूल = पूँछ, लालनात् = लाड प्यार से, लालाक्लिन्नम् = लार से भीगा हुआ, लुनन्ति = काटते हैं, लुब्धक = बहेलिया, लोकस्थितिः = लोक मर्यादा, लोकापवात् = लोक निन्दा से।

वनचरैः = वनवासियों के द्वारा, वयः = आयु, वहल = घनी, वाञ्छति = चाहता है, वाञ्छा = इच्छा, वारणम् = रोकने वाला, वारणानाम् = हाथियों का, वाराङ्गना = वेश्या, विकचीकरोति = खिलाता है, विगन्धि = दुर्गन्धयुक्त, वित्तवत्सु = धनवानों में, विद्याख्य = विद्यानाम वाला, विद्यावदातम् = विद्या से उज्ज्वल, विनिपातः = पतन, विनिर्मितम् = बनाया गया, विभाति = सुशोभित होता है, विमतिता = बुद्धिहीनता, विमृशन्तः = सोचते हुए, विरमन्ति = रुक जाते हैं, विलिखति = खोदता है, विलोकयति = देखता है, विशिखाः = बाण, विशीर्यते = नष्ट हो जाता है, विषमम् = कठोर, विषये = राज्य में, विष्टपं = संसार, विहीनम् = रहित, वैदग्ध्यकीर्तिम् = निपुणता के यश को, व्यालं = हाथी को, व्यसनम् = शौक, व्यपगत = दूर हो गया।

शक्त्या = शक्ति के अनुसार, शतमुखः = सैकड़ों प्रकार से, शल्यतुल्यः = कांटे के समान, शाठ्यम् = दुष्टता, शाणोल्लीढः = शान पर चढ़ाई हुई, शाम्यति = शान्त हो जाता है, शार्वम् = शिव को, शाल्योदन = भात, शास्त्रोपस्कृत = शास्त्रों द्वारा शोधित, शिखरिणाम् = पर्वतों का, शीर्यते = नष्ट हो जाती है, शीर्षावशेषाकृतिः = सिर मात्र शेष आकृति वाला, शीलम् = अच्छा स्वभाव, शुचौ = पवित्रता में, शैलतटात् = पर्वत की चोटी से, श्यानपुलिनाः = सूखे तटों वाली, श्वा = कुत्ता, श्रुतौ = वेदों में, श्रूयताम् = सुनो।

संघात = समूह, संदह्यताम् = जला डाले, संनह्यते = सन्नद्ध होता है, संरुणद्धि = रोकती है, सञ्चितानि = एकत्रित, सन् = होते हुए, सत्त्ववतां = शक्तिशाली लोगों का, सत्वानुरूपम् = स्वभाव के अनुरूप, सदसि = सभा में, सन्तप्यन्ते = दुःखी होते हैं, समक्रियाम् = समान आचरण वाला, समन्तात् = चारों ओर, समाविशतु = प्रवेश करे, समुन्मीलति = प्रकट होता है, सम्पातः = गिरना, सम्भाविताः = प्रतिष्ठित।

सिकतासु = बालू में, सिञ्चति = सींचती है, सुकृत = अच्छी प्रकार किया गया, सुकृतिनः = पुण्यात्मा, सुचरितैः = सुन्दर आचरणों से, सुजनता = सज्जनता,