नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।
७. व्याकरणात्मक टिप्पणयः- १. शतम् मुखानि यस्य सः, शतमुखः (बहुव्रीहि) २. वि + नि + पत् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) • २. उप + √गम् + क्त + टाप् = उपगता ३. विवेकात् भ्रष्टः, विवेकभ्रष्टः, तेषां विवेकभ्रष्टानां (पञ्चमी तत्पुरुष)
(ख) हिन्दी व्याख्या
१. आद्यन्त-
यद्धात्रा....................................................................जलम्।
२. संदर्भ-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित गीतिकाव्यों में अग्रणी ‘नीतिशतकम्’ नामक काव्य से अवतरित है।
३. प्रसङ्ग-
व्यक्ति को कभी भी धनवानों के सामने दीनहीन नहीं बनना चाहिए, अपितु धैर्य को धारण करना चाहिए। इसी बात को सोदाहरण समझाते हुए कवि कहता है कि—
शेष व्याख्या श्लोक संख्या के अनुसार अन्वय हिन्दी अनुवाद, व्याख्या, विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणी आदि शीर्षकों के अन्तर्गत करनी चाहिए।
इस विषय में एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छात्रों को व्याख्या में विस्तार उतना ही देना चाहिए जितने विस्तार की उन्हें समय अनुमति प्रदान करे। यदि उन्हें ऐसा प्रतीत हो कि समय कम है तो उन्हें हिन्दी अनुवाद लिखने की आवश्यकता नहीं है। विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणियों में भी अपेक्षाकृत कम लिखा जा सकता है। ध्यान रहे परीक्षा में निर्धारित समय के अन्तर्गत सम्पूर्ण प्रश्न-पत्र का हल करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
(ग) विद्वत्पद्धति का सारांश
नीतिशतकम् में कवि ने एक ही विषय को लेकर कुछ श्लोकों की संरचना की है तथा उन्हें एक साथ संग्रह कर दिया गया। ये संग्रहित श्लोक ही तत्तत् पद्धति के नाम से कहे गये हैं। यहाँ हम विद्वत्पद्धति का संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। छात्रों को इसी प्रकार अन्य पद्धतियों का सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।