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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

१६२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।

७. व्याकरणात्मक टिप्पणयः- १. शतम् मुखानि यस्य सः, शतमुखः (बहुव्रीहि) २. वि + नि + पत् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) • २. उप + √गम् + क्त + टाप् = उपगता ३. विवेकात् भ्रष्टः, विवेकभ्रष्टः, तेषां विवेकभ्रष्टानां (पञ्चमी तत्पुरुष)

(ख) हिन्दी व्याख्या

१. आद्यन्त-
यद्धात्रा....................................................................जलम्।

२. संदर्भ-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित गीतिकाव्यों में अग्रणी ‘नीतिशतकम्’ नामक काव्य से अवतरित है।

३. प्रसङ्ग-
व्यक्ति को कभी भी धनवानों के सामने दीनहीन नहीं बनना चाहिए, अपितु धैर्य को धारण करना चाहिए। इसी बात को सोदाहरण समझाते हुए कवि कहता है कि—

शेष व्याख्या श्लोक संख्या के अनुसार अन्वय हिन्दी अनुवाद, व्याख्या, विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणी आदि शीर्षकों के अन्तर्गत करनी चाहिए।

इस विषय में एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छात्रों को व्याख्या में विस्तार उतना ही देना चाहिए जितने विस्तार की उन्हें समय अनुमति प्रदान करे। यदि उन्हें ऐसा प्रतीत हो कि समय कम है तो उन्हें हिन्दी अनुवाद लिखने की आवश्यकता नहीं है। विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणियों में भी अपेक्षाकृत कम लिखा जा सकता है। ध्यान रहे परीक्षा में निर्धारित समय के अन्तर्गत सम्पूर्ण प्रश्न-पत्र का हल करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।

(ग) विद्वत्पद्धति का सारांश

नीतिशतकम् में कवि ने एक ही विषय को लेकर कुछ श्लोकों की संरचना की है तथा उन्हें एक साथ संग्रह कर दिया गया। ये संग्रहित श्लोक ही तत्तत् पद्धति के नाम से कहे गये हैं। यहाँ हम विद्वत्पद्धति का संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। छात्रों को इसी प्रकार अन्य पद्धतियों का सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।

नीतिशतकम्१६३

जिस राजा के राज्य में शिष्यों को देने योग्य शास्त्रों से सम्पन्न, उत्कृष्ट काव्य निर्माण में निपुण, विद्वान्, कवि निर्धन अवस्था में रहते हैं। यह तो उस राजा की ही मूर्खता कही जाएगी, क्योंकि कवि तो बिना धन के भी ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। कवि जैसी मणियों को न पहचानने के लिए राजा जैसे जौहरी ही दोषी माने जाने चाहिएँ।

ऐश्वर्य सम्पन्न लोगों को विद्वानों का आदर करना चाहिए, क्योंकि उनके पास तो विद्या नामक अद्भुत गुप्त धन है और इस धन की विशेषता है कि यह सदा कल्याणों को ही देता है और साथ ही अधिकाधिक दान देने पर यह बढ़ता ही है।

कवि ने परिष्कृत वाणी को ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण बताया है—

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥

विद्याविहीन व्यक्ति तो पशु ही होता है। इसलिए व्यक्ति को सदैव विद्या अध्ययन करना चाहिए। विद्या में अनेक विशेषताएँ हैं। यह मनुष्य का छिपा हुआ खजाना है। यह यश, सुख और भोगों को देने वाली है। राजा भी विद्या की ही पूजा करते हैं धन की नहीं।

इसी प्रकार यदि व्यक्ति में श्रेष्ठ कविता बनाने की सामर्थ्य है तो उसके लिए राज्य भी बेकार है।

सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम्?

मनुष्य को यदि इस संसार में सफलता प्राप्त करनी है तो उसे कुछ बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए जैसे— दुष्टों से सदैव दुष्टतापूर्वक, सेवकों के साथ दयापूर्वक, विद्वानों के साथ सरलतापूर्वक तथा बंधुजनों के प्रति उदारतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए।

इसी प्रकार व्यक्ति को सदैव अच्छे लोगों की संगति ही करनी चाहिए, क्योंकि सत्संगति से व्यक्ति सत्य बोलना सीखता है, पापों से दूर रहता है तथा उसका सर्वत्र यश प्रसारित होता है—

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥२४॥

१६४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

जिन लोगों के पास विद्या नहीं है, दान नहीं करते, तपस्या का आचरण नहीं करते उन्हें कवि ने मनुष्य रूप में विचरण करते हुए पशु ही बर्ताया है। ठीक इसी प्रकार साहित्य, संगीत और कला से रहित व्यक्ति भी पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु ही है—

साहित्य-संगीत-कला-विहीनः,
साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः,
तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥१३॥

इसी प्रकार राजाओं को कभी भी विद्वानों का अपमान नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी तो ऐसे पण्डितों के लिए तिनके का समान है। राजा यदि क्रोधित भी होता है तो अधिक से अधिक विद्वान् को अपने राज्य से निष्कासित कर सकता है, किन्तु उसकी योग्यता, क्षमता, विद्वत्ता आदि को तो किसी भी स्थिति में उससे नहीं ले सकता है। रससिद्ध कवियों के यशः शरीर में वृद्धावस्था और मरणादि से उत्पन्न भय नहीं होता है। अतः वे श्लाघनीय हैं।

(घ) शब्दार्थ

अंकितः = चिह्नित, अकरुणत्वम् = निर्दयता, अकारणविग्रहः = बिना कारण झगड़ा, अखिलाः = सम्पूर्ण, अज्ञः = न जानने वाला, अज्ञतायाः = मूर्खता का, अतिरभसा = अत्यन्त वेग से, अत्ति = खाता है, अथ = इसके पश्चात्, और अधः = नीचे, अधिगतपरमार्थान् = प्राप्त कर लिया है परमतत्त्व को जिसने, अनक्षरम् = विद्या रहित, अनवच्छिन्न = आच्छादित न किए जा सकने वाले, अनवद्या = प्रशंसनीय, अन्वेक्षणात् = बिना देखभाल से, अनिशम् = निरन्तर, अनुत्सेकः = अभिमान न होना, अनुपहतविधिः = जिसके विधान का खण्डन नहीं किया जा सकता, अनुयाहि = अनुसरण करो, अनुव्रताः = अनुकूल क्रिया, अनैकान्त्यात् = अनेक अवस्था वाला होने से, अन्तर्धनम् = गुप्तधन, अपहर्तुम् = अपहरण करने के लिए, अपाकरोति = दूर करती है।

अप्रगल्भः = असहासी, अप्रतिहताः = न रुकने वाली, अभिजनः = उत्तम कुल में उत्पन्न, अभिजातः = कुलीन, अभियोगः = परिश्रम, अभ्यर्चनीया = पूजनीय, अभ्युदये = उन्नति में, अम्भोद वर = श्रेष्ठ बादल, अम्भसि = जल में, अम्भोजिनी = कमलिनी, अर्घतः = मूल्य से, अर्थपरा = धन प्रदान करने वाली, अर्थिभ्यः = याचकों को, अर्थिसु = याचकों में, अर्थोष्मणा = धन की गर्मी के द्वारा, अवगतम् = जाना, अवञ्चकः = धोखा न देने वाला, अवदात् = उज्ज्वल, स्वच्छ, अवधार्या = विचार की जानी चाहिए,

नीतिशतकम् १६५

अवमंस्थाः = अपमान करो, अवलिप्तता = अभिमान, अवाप्त-विभवस्य = प्राप्त किया है ऐश्वर्य को जिसने, अविकलानि = पूर्ण, अवेक्ष्य = देखकर, अशेष गुणाकरम् = सम्पूर्ण गुणों की खान, असुभङ्गे = प्राणों के नष्ट होने पर, असून् = प्राणों को, अस्थायिन्यः = अस्थायी, अस्थिकम् = हड्डी का टुकड़ा, अहह = आश्चर्यसूचक।

'आखुः = चूहा, आगमा = शास्त्र, आढ्य = धनी, आत्मदमने = आत्म नियन्त्रण में, आदौ = पहले, आपदि = आपत्ति में, आपन्नः = प्राप्त हुआ, आयसि = लोहे पर, आराधयेत् = प्रसन्न कर सकता है, आराध्यः = प्रसन्न करने योग्य, आर्जवम् = सरलता, आर्द्रयन्ति = भिगोते हैं, आविपत्तेः = मृत्युपर्यन्त, आशु = शीघ्र ही, आश्रयन्ते = आश्रय में रहते हैं, आसादयेत् = प्राप्त कर ले, आस्थाम् = श्रद्धा को।

इतः = इधर से, इनकान्तः = सूर्यकान्त मणि, इष्टद = इच्छित वस्तु को देने वाला, इह = यहाँ, इहते = चाहता है, ईदृशी = ऐसी, उज्जत = छोड़ दो, उत्पलकोमलम् = कमल के समान कोमल, उत्तुंगात् = ऊँचे से, उद्रच्छत् = ऊपर उठती हुई, उद्दिष्टम् = बताया गया है, उद्धत = अहंकारी, उद्धरेत् = निकाल ले, उन्नमन्तः = ऊपर उठते हुए, उद्भासित = प्रकाशित, उन्मनः = व्याकुल, उपकृतेः = उपकार का, उपशमः = शान्ति, उपचीयते = बढ़ जाता है, उपयान्ति = प्राप्त होते हैं, उपाश्रयेण = सहारा लेने से, ऊर्जितम् = बलवान्, एकान्तगुणम् = केवल गुण स्वरूप, एतादृशाः = ऐसे, ओघः = समूह।

कः अर्थः = क्या लाभ, कंकोल = शीतल चीनी, कदर्थितस्य = पीडित, कन्याधारी = गुदड़ी धारण करने वाला, कन्दुकः = गेंद, कमठपतिना = कछुओं के स्वामी के द्वारा, करण्ड = पिटारी, कर्मभूमिम् = संसार को, कर्मायत्तम् = कर्मों के अधीन, काचित् = कोई स्त्री, काले = समय पर, कार्पण्योक्ति = दीनता से युक्त कथन, कार्यार्थी = कार्य करने का इच्छुक, किञ्चिज्ज्ञः = कुछ जानने वाला, किमु = प्रश्नवाचक अव्यय, कियन्तः = कितने, कुत्स्याः = निन्दा के योग्य, कुपरीक्षकाः = खराब परीक्षक, कुम्भकवल = मस्तक का टुकड़ा, कुरंगायते = हिरण के समान हो जाता है, कुर्वता = करते हुए, कुलालवत् = कुम्हार के समान, कुलिश प्रहारैः = वज्र के प्रहारों से, कुल्यायते = छोटी सी नहर के समान हो जाता है।

कृच्छगतः = कष्ट में पड़े हुए, कृत्स्नम् = सम्पूर्ण, कृथाः = करो, कृमिकुलचितम् = कीड़ों के समूह से व्याप्त, कृशानुताप = अग्नि का ताप, केयूराणि = बाजूबन्द, कैतवम् = धूर्तता, कैरवचक्रवालम् = कुमुद समूह, कोद्रवाणाम् = कोदों (अन्न) के, क्रोडाधीनम् = गोद में, क्षयिणी = क्षीणता से युक्त, क्षान्तिः = क्षमा, क्षितिधेनुम् = पृथ्वी रूपी गाय को, क्षुत्क्षामाः = भूख से दुर्बल, क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं, खलोपासनात् = दुष्टों की सेवा से, खादन् = खाते हुए, ख्यापयन्तः = प्रकाशित करते हुए, गुर्वी = लम्बी, गुह्यम् = गोपनीय, गोचरगतैः = इन्द्रियों का विषय बने हुए।

१६६ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्

चाटुलः = बहुत बोलने वाला, छिन्धि = काटो, छेत्तुम् = काटने के लिए, छादनम् = छिपाने वाला, जम्बुकम् = गीदड़ को, जल्पकः = बकवादी, जहि = छोड़ दो, जुह्वानम् = हवन करते हुए को, जाड्यम् = मूर्खता को, जातेन = उत्पन्न होने से, जानीमहे = हम जानते हैं, जायते = उत्पन्न होता है, जीवमानः = जीवित रहता हुआ, जुगुप्सितम् = घृणित, ज्ञातिः = सम्बन्धी।

तनिम्ना = दुबलेपन से, तुतुषुः = संतुष्ट हुए, तृणलवप्रायाः = तिनके के टुकड़े के समान, दंष्ट्रांकुर = दाढ़ का अग्रभाग, दम्भः = अभिमान, दरी = कुरूप, गुफा, दाक्षिण्यम् = उदारता, दिवसधूसरः = दिन में मलिनकान्ति, दुधुक्षसि = दुहना चाहते हो, दुर्गतः = दुर्दशा को प्राप्त, दुर्विदग्धः = अभिमानी (व्यक्ति), दौर्मन्त्र्यात् = बुरी सलाह से, धरित्रीम् = पृथ्वी को, धात्रा = विधाता ने, धीवरः = मछुआरा, धृष्टः = ढीठ, ननु = निश्चयपूर्वक, निकृतिम् = अपमान को, निघ्नन्ति = नष्ट करते हैं, नितराम् = अत्यधिक, निधनम् = नाश को, निपत्य = गिरकर, निर्घृणता = निर्दयता, निर्व्याजता = निष्कपटता, निवारयति = रोकता है, निवृत्तः = हटा हुआ, निशितांकुशेण = तीक्ष्ण अंकुश से।

पक्षच्छेदः = पंखों का कटना, पञ्चषाः = पांच, छः, पत्तने = नगर में, पयसां पत्युः = जलों के स्वामी, परार्थम् = दूसरों के लिए, परिक्षीणः = निर्धन, परिग्रहफल्गुताम् = ग्रहण की गई वस्तु की निस्सारता को, परितुष्यति = व्याकुल होती है, परित्यज्य = त्यागकर, परिवाद = निन्दा, परिस्फुरित = देदीप्यमान, परिहर्त्तव्या = त्यागने योग्य, पयोनिधौ = समुद्र में, पर्यंकम् = पलंग को, पर्यटन् = घूमते हुए, पर्वतीकृत्य = पर्वत के समान बनाकर, पादाक्रान्त = पैरों (किरणों) से व्याप्त, पिण्डदस्य = अन्न देने वाले के, पिपासार्दितः = प्यास से व्याकुल, पिशुनता = चुगलखोरी, पीडयन् = दबाता हुआ, पीयूष = अमृत, पुरतः = सामने, पुरा = पहले, पुषाण = पुष्ट करो, पुष्णाति = पुष्ट करता है, प्रच्छादय = छिपाओ, प्रच्छन्नम् = अत्यन्त गुप्त, प्रणयिता = अनुराग करने वाला, प्रतिनिविष्ट = दुराग्रही और हठी, प्रतिपाद्यमानम् = दिया जाता हुआ, प्रथयति = विस्तार करती है, प्रभवति = प्रभावशाली होता है, प्रमादात् = आलस्य से, प्रमार्ष्टुम् = मिटाने के लिए, प्रययुः = प्राप्त हुए, प्रविचलन्ति = विचलित होते हैं, प्रसह्म = बलपूर्वक, प्रसादोन्मुखः = अनुग्रहशील, प्रसृतये = अंजलि के लिए, प्रहरणम् = अस्त्र, प्राज्ञः = बुद्धिमान्, प्राणाघातात् = प्राणों के विनाश से, प्रीणयन्तः = प्रसन्न करते हुए, प्रीणयेत् = प्रसन्न करे, बलभित् = इन्द्र, ब्रूहि = बोलो,

भिक्षाटनम् = भिक्षा के लिए घूमना, भागधेयम् = सौभाग्य, भाव्यम् = जो होना है, भुङ्क्ते = खाता है, भूरि = अनेक, भोगकरी = भोगों को देने वाली, भोगिनः = सर्प, भ्राम्यति = घूमता है, मज्जतु = डूब जाए, मण्डिता = सुशोभित, मतिमताम् = बुद्धिमानों की, महार्णवे = समुद्र में, महार्हैः = बहुमूल्य, मानोन्नतिम् = सम्मान और उन्नति को,

नीतिशतकम् १६७

मार्जितुम् = पोंछने के लिए, मूकभावः = चुप रहना, मूर्धजाः = केश, मूर्ध्नि = सिर पर, मृगाश्चरन्ति = पशु विचरण कर रहे हैं, म्लानेन्द्रियस्य = शिथिल इन्द्रियों वाले का।

यथेष्टम् = इच्छानुसार, यशः काये = यश रूपी शरीर में, योजयते = लगाता है, रञ्जयति = प्रसन्न करता हैं, रजताद्रिणा = चाँदी के पर्वत द्वारा, रुचिराकारः = सुन्दर आकृति वाला, रोद्धुम् = रोकने के लिए, लब्ध्वा = प्राप्त करके, लाङ्गलाग्रैः = हलों के अग्रभागों द्वारा, लाङ्गूल = पूँछ, लालनात् = लाड प्यार से, लालाक्लिन्नम् = लार से भीगा हुआ, लुनन्ति = काटते हैं, लुब्धक = बहेलिया, लोकस्थितिः = लोक मर्यादा, लोकापवात् = लोक निन्दा से।

वनचरैः = वनवासियों के द्वारा, वयः = आयु, वहल = घनी, वाञ्छति = चाहता है, वाञ्छा = इच्छा, वारणम् = रोकने वाला, वारणानाम् = हाथियों का, वाराङ्गना = वेश्या, विकचीकरोति = खिलाता है, विगन्धि = दुर्गन्धयुक्त, वित्तवत्सु = धनवानों में, विद्याख्य = विद्यानाम वाला, विद्यावदातम् = विद्या से उज्ज्वल, विनिपातः = पतन, विनिर्मितम् = बनाया गया, विभाति = सुशोभित होता है, विमतिता = बुद्धिहीनता, विमृशन्तः = सोचते हुए, विरमन्ति = रुक जाते हैं, विलिखति = खोदता है, विलोकयति = देखता है, विशिखाः = बाण, विशीर्यते = नष्ट हो जाता है, विषमम् = कठोर, विषये = राज्य में, विष्टपं = संसार, विहीनम् = रहित, वैदग्ध्यकीर्तिम् = निपुणता के यश को, व्यालं = हाथी को, व्यसनम् = शौक, व्यपगत = दूर हो गया।

शक्त्या = शक्ति के अनुसार, शतमुखः = सैकड़ों प्रकार से, शल्यतुल्यः = कांटे के समान, शाठ्यम् = दुष्टता, शाणोल्लीढः = शान पर चढ़ाई हुई, शाम्यति = शान्त हो जाता है, शार्वम् = शिव को, शाल्योदन = भात, शास्त्रोपस्कृत = शास्त्रों द्वारा शोधित, शिखरिणाम् = पर्वतों का, शीर्यते = नष्ट हो जाती है, शीर्षावशेषाकृतिः = सिर मात्र शेष आकृति वाला, शीलम् = अच्छा स्वभाव, शुचौ = पवित्रता में, शैलतटात् = पर्वत की चोटी से, श्यानपुलिनाः = सूखे तटों वाली, श्वा = कुत्ता, श्रुतौ = वेदों में, श्रूयताम् = सुनो।

संघात = समूह, संदह्यताम् = जला डाले, संनह्यते = सन्नद्ध होता है, संरुणद्धि = रोकती है, सञ्चितानि = एकत्रित, सन् = होते हुए, सत्त्ववतां = शक्तिशाली लोगों का, सत्वानुरूपम् = स्वभाव के अनुरूप, सदसि = सभा में, सन्तप्यन्ते = दुःखी होते हैं, समक्रियाम् = समान आचरण वाला, समन्तात् = चारों ओर, समाविशतु = प्रवेश करे, समुन्मीलति = प्रकट होता है, सम्पातः = गिरना, सम्भाविताः = प्रतिष्ठित।

सिकतासु = बालू में, सिञ्चति = सींचती है, सुकृत = अच्छी प्रकार किया गया, सुकृतिनः = पुण्यात्मा, सुचरितैः = सुन्दर आचरणों से, सुजनता = सज्जनता,

१६८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

सुधास्यन्दिभिः = अमृतवर्षी, सुरतमृदिता = सम्भोग में मर्दन की गई, सूनुः = पुत्र, सूर्यातपः = सूर्य की धूप, सृजति = रचना करता है।

स्पृष्टः = स्पर्श किया गया, स्युः = होने चाहिएँ, स्पृहा = इच्छा, हतविधेः = दुष्ट विधाता, हर्तुः = हरण करने वाले के, ह्रीमति = लज्जा से, हुत्भुक् = अग्नि, हेतिनिहतः = शस्त्रों द्वारा घायल।

श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकश्लोक सं०पृष्ठश्लोकश्लोक सं०पृष्ठ
अकरुणत्वम्५१६७छिन्नोऽपि रोहति९३१२१
अज्ञः सुखमाराध्यःजयन्ति ते२५३३
अधिगतपरमार्थान्१८२२जाड्यं धियो हरति२४३२
अप्रियवचन दरिद्रैः७१९४जाड्यं हिमर्ति५३६९
अम्भोजिनी वारविलास१९२४जात कूर्मः सः८११०६
अयममृतनिधानं१०२१३३जातिर्यातु रसातलं४०५२
आज्ञाकीर्तिः पालनं४८६४तानीन्द्रियाणि५०६६
आरम्भगुर्वी क्षयिणी५९७८तृष्णां छिन्धि भज८२१०८
आलस्यं हि मनुष्याणां१२११५९त्वमेव चातकाधारो७३९५
इतः स्वपिति केशवः८०१०४दानं भोगो नाशः४३५७
उद्भासिताखिलखलस्य५८७६दाक्षिण्यं स्वजने२३३०
एकेनापि हि शूरेण३८५०दिक्कालाद्यनवच्छिन्न
एके सत्पुरुषाः७७१००दुर्जनः परिहर्तव्यः५२६८
एको देवः केशवो७२९५देवेन प्रभुणा स्वयं१०५१२९
ऐश्वर्यस्य विभूषणं९४१२२दौर्मन्त्र्यान्नृपतिः४२५५
कदर्थितस्यापि हि९०११८न कश्चिच्चण्डकोप५६७४
करे श्लाघ्यस्त्यागः६३८२नमस्यामो देवान्११०१४४
कर्मायत्तं फलं पुंसां१२०१५८नम्रत्वेनोन्नमन्तः७०९२
कान्ताकटाक्षविशिखाः६७११४निन्दन्तु नीतिनिपुणा८९११६
कृमिकुलचितं१०१२नेता यस्य बृहस्पतिः९६१२५
किं तेन हेमगिरिणा८४११०नैवाकृतिः फलति११६१५३
कुसुमस्तबकस्येव३१४२पत्रं नैव यदा१०८१४१
केयूराणि न भूषयन्ति२०२५पद्माकरं दिनकरो७६९९
को लाभो गुणिसंगमः२६३५परिक्षीणः कश्चित्४५५९
क्वचित्भूमौ शय्या८८११५परिवर्तिनि संसारे३०४१
क्षान्तिश्चेत्२२२९पतितोऽपि कराघातैः१०६१३९
क्षुत्क्षामोऽपि२७३६पापात्निवारयति७८१०२
क्षीरेणात्मगतो७९१०२प्रदानं प्रच्छन्नं६७८६
खल्वाटो दिवसे९९१३०प्रसह्य मणिमुद्धरेत्
गुणवद्गुणवद्वा११४१५८प्राणाघातान्निवृत्तिः६४८४

१७० •श्रीभर्तृहरिविरचितम्

श्लोकश्लोक सं०पृष्ठश्लोकश्लोक सं०पृष्ठ
प्रारभ्यते न खलु८६११३लोभश्चेदगुणेन किं५४७१
प्रिय सखे विपद्१०३१३४वने रणे शत्रुः११८१५६
प्रिया न्याय्यावृत्तिः६६८६वरं पक्षच्छेदः३४४६
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताःवरं पर्वतदुर्गेषु१५१९
ब्रह्मा येन कुलाल११११४६वरं शृङ्गोत्संगात्९१११८
भग्नाशस्य करण्ड९७१२७वहति भुवनश्रेणीं३३४४
भवन्ति नम्रास्तरवः७४९६वह्निस्तस्य जलायते९२१२०
भीमं वनं भवति११९१५७वाञ्छा सज्जनसंगमे६१८०
मज्जत्वम्भसि११७१५५विद्या नाम नरस्य रूपं२१२७
मणिः शाणोल्लीढः४४५३विपदि धैर्यमथा६२८१
मनसि वचसि काये८३१०९विरम विरमायासाद्१०४१३६
मालती कुसुमस्येव३७४९व्यालं बालमृणाल
मृगमीनसज्जनानां६०७९शक्यो वारयितुं१२१५
मौनान्मूकः प्रवचन५७७०शशिदिवाकरयोः१०७१४०
यथा कन्दुकपातेन९८१२९शशीदिवसधूसरो५५७३
यदचेतनोऽपि३५४८शास्त्रोपस्कृतशब्द१६१९
यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं११शिरः शार्वं स्वर्गात्१११४
यद् धात्रा निजभालपट्ट४९६५शुभ्रं सद्मसविकमा११३१४९
यः प्रीणयेत्सुचरितैः६९९१श्रोत्रं श्रुतेनैव७५९८
यस्यास्ति वित्तं४१५३सत्यानृता च४७६२
यां चिन्तयामि सततंसन्तप्तायसि६८९०
यां साधूंश्च खलान्११२१४७सन्त्यन्येऽपि३२४३
येनैवाम्बरखण्डेन१०११३२सम्पत्सु महतां६५८६
येषां न विद्या१४१८साहित्यसंगीतकला०१३१७
रत्नैर्महार्हैः८५१११सिंहशिशुरपि३६४८
राजन्दुधुक्षसि४६६१सूनुः सच्चरितः१०९१४२
रे-रे चातक सावधान९५१२४सृजति तावदशेष१००१३१
लज्जागुणौघजननीं३९५१स्थाल्यां वैदुर्य११५१५२
लभेत सिकतासुस्वल्पस्नायुवसा२८३८
लाङ्गूलचालनमधः२९४०स्वायत्तमेकान्त१०
हर्तुर्याति१७२१

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