भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 194 में से

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पृष्ठ 164

१४२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

चातक का प्यासा रहना, उसके भाग्य में लिख दिया, अतः उसे मिटाना तो किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।

विशेष– १. विधि के विधान को बदलने में कोई भी समर्थ नहीं है। यदि भाग्य में नहीं है तो व्यक्ति को संसार में समृद्धि होने पर भी लेशमात्र भी मिलना सम्भव नहीं है।
२. करील वृक्ष की विशेषता है कि उस पर वसन्त ऋतु में भी पत्ते नहीं आते हैं।
३. चातक के विषय में प्रसिद्ध है कि वह वर्षा के जल की बूँद से ही अपनी प्यास शान्त करता है।
४. भाग्य की प्रबलता का सुन्दरता से प्रतिपादन किया है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
सूर्याश्वैर्म्सजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. करीरस्य विटपे (षष्ठी तत्पुरुष) करीरविटपे
२. अव + √लोक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवलोकते
३. √दूष् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दूषणम्
४. ललाटे लिखितम् (सप्तमी तत्पुरुष) ललाटलिखितम्
५. √मृज् + तुमुन् = मार्जितुम्
६. √क्षम् + अच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षमः
७. न + एव = नैव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
८. न + उलूकः + अपि + अवलोकते (आद् गुणः, अतो रोरप्लुतादप्लुते, इकोयणचि, अ + उ = ओ, :— उ— ओ, इ— य्)
९. √लिख्+ क्त = लिखितम्
१०. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति

सूनुः सच्चरितः सती प्रियतमा स्वामी प्रसादोन्मुखः,
स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निष्क्लेशलेशं मनः।
आकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो विद्यावदातं मुखं,
तुष्टे विष्टपहारिणीष्टदहरौ संप्राप्यते देहिना।।१०९।।

अन्वय– विष्टपहारिणी इष्टद हरौ तुष्टे, देहिना सच्चरितः सूनुः, सती प्रियतमा, प्रसादोन्मुखः स्वामी, स्निग्धम् मित्रम्, अवञ्चकः परिजनः, निष्क्लेशलेशम् मनः, रुचिरः आकारः, स्थिरः विभवः, विद्यावदातम् च मुखम् सम्प्राप्यते।

अनुवाद– संसार (के कष्टों) का हरण करने वाले, मनोवाञ्छित (वस्तु) प्रदान करने वाले भगवान् विष्णु के प्रसन्न होने पर देहधारी (मनुष्य) के द्वारा श्रेष्ठ आचरण