भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 194 में से

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पृष्ठ 163

नीतिशतकम् १४१

४. √बन्ध् + ल्युट् = बन्धनम् ५. मति + मतुप् = मतिमत् (षष्ठी तत्पुरुष) मतिमताम् ६. दरिद्र + तल् = दरिद्रता, ताम् दरिद्रताम् ७. वि + √लोक् + ल्यप् = विलोक्य ८. √मन् + क्तिन् = मतिः ९. शशिदिवाकरयोः + ग्रहपीडनम् (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) १०. गजभुजङ्गमयोः + अपि (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) ११. विधिः + अहो (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः)

पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं, नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं, यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥१०८॥

अन्वय- यदा करीरविटपे पत्रम् न एव (भवति), वसन्तस्य किम् दोषः ? उलूकः दिवा अपि यदि न अवलोकते, सूर्यस्य किम् दूषणम् ? (यदि) चातकमुखे धाराः न एव (पतन्ति), मेघस्य किम् दूषणम् ? विधिना यत् पूर्वम् ललाटलिखितम् तत् मार्जितुम् कः क्षमः ?

अनुवाद- यदि करील के वृक्ष पर पत्ता नहीं (होता है, तो) वसन्त का क्या दोष ? उल्लू दिन में भी यदि नहीं देखता (तो) सूर्य का क्या दोष ? (यदि) चातक के मुख में (जल की) धारा नहीं (गिरती है, तो) मेघ का क्या दोष ? विधाता के द्वारा जो पहले मस्तक पर लिख दिया (तो) उसे मिटाने में कौन समर्थ है ?

व्याख्या- भाग्य में लिखा हुआ कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है, इसी बात का प्रतिपादन कवि ने कुछ उदाहरण देकर किया है— सामान्य रूप में वसन्त ऋतु में सभी वनस्पतियों पर फूल और सुन्दर पत्ते आ जाते हैं, जिनसे उनकी शोभा में वृद्धि होती है, किन्तु इसके विपरीत करीर का वृक्ष इस सुन्दर ऋतु में भी पत्तों से रहित रहता है। इसमें वसन्त ऋतु का तो कोई दोष नहीं माना जायेगा। यह उसका दुर्भाग्य ही है, जिसे कोई भी मिटाने में समर्थ नहीं है।

इसी प्रकार सूर्य दिन भर संसार को आलोकित करता है, जिसमें सभी प्राणी इस सुन्दर संसार का अवलोकन करते हैं, किन्तु यदि उल्लू अपने भाग्य-दोष के कारण दिन में भी नहीं देख पाता है, तो इसमें सूर्य का तो कोई दोष मानना उचित नहीं है।

बादल धरती पर चारों ओर समान रूप से वर्षा करता है, किन्तु यदि उसके जल की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरती हैं तब यह तो चातक का ही दुर्भाग्य है, बादल को इस विषय में दोषी कहना लेशमात्र भी उचित नहीं है। विधाता ने ही इस प्रकार