नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनं,
गजभुजङ्गमयोरपि बन्धनम्।
मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां,
विधिरहो बलवान् इति मे मतिः॥१०७॥
अन्वय- शशि-दिवाकरयोः ग्रहपीडनम्, गज-भुजङ्गमयोः बन्धनम् अपि, मतिमताम् च दरिद्रताम् विलोक्य, मे मतिः इति (अस्ति), अहो विधिः बलवान्।
अनुवाद- सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहों (राहू, केतु) द्वारा पीडित किए जाने को, हाथी और सांप के बन्धन को भी (देखकर) और बुद्धिमानों की दरिद्रता को देखकर मेरी बुद्धि तो यही है कि अहो ! भाग्य (ही) बलवान् (है)।
व्याख्या- जब हम सूर्य और चन्द्रमा जैसे विशाल आकार वाले तेजस्वी ग्रहों को राहू और केतु जैसे ग्रहों के द्वारा पीड़ित किया जाता हुआ देखते हैं। इसके अलावा जब हम हाथी जैसे शक्तिशाली एवं भयंकर सर्प जैसे विषैले और खतरनाक जीवों का बांधा जाना भी देखते हैं।
इसी प्रकार जब हम इस संसार में देखते हैं कि अत्यन्त बुद्धिमान् व्यक्ति भी दरिद्रता में अत्यन्त दयनीय जीवन जीने के लिए बाध्य है, तो उस स्थिति में हमारी बुद्धि केवल एक ही निश्चय पर पहुँचती है कि भाग्य वस्तुतः बलवान् होता है। कोई कितना भी प्रभावशाली, भयंकर, समर्थ अथवा योग्य क्यों न हो, दुर्भाग्य के वशीभूत होकर उनको भी कष्ट और आपत्तियों का सामना करना पड़ता है।
विशेष-
१. कवि ने सूर्य, चन्द्रमा, हाथी और सांप तथा विद्वान् का उदाहरण देते हुए भाग्य की प्रबलता का प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से किया है।
२. पुराणों के अनुसार सूर्य और चन्द्र का ग्रसन (ग्रहण) राहू और केतु नामक राक्षस ग्रहों के द्वारा किया जाता है, किन्तु वर्तमान वैज्ञानिक युग में यह बात निराधार सिद्ध हो गयी है।
३. अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के तेज, बल, पौरुष आदि सबकी निरर्थकता प्रतिपादित की गई है।
४. द्रुतविलम्बित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।
५. समुच्चय तथा अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. शशी च दिवाकरश्च शशिदिवाकरौ, तयोः शशिदिवाकरयोः (द्वन्द्व समास)
२. √पीड् + ल्युट् = पीडनम्। ग्रहाभ्याम् पीडनम् (तृतीया तत्पुरुष) ग्रहपीडनम्
३. गजश्च भुजङ्गश्च गजभुजङ्गौ, तयोः गजभुजङ्गमयोः (द्वन्द्व समास)