नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १४३
वाला पुत्र, सती साध्वी पत्नी, कृपालु स्वामी, स्नेही मित्र, कपटरहित सेवक, क्लेश के अंश मात्र से शून्य मन, सुन्दर आकार, स्थिर ऐश्वर्य और विद्या से पवित्र मुख प्राप्त किया जाता है।
व्याख्या- परम कृपालु भगवान् विष्णु, जो संसार के सभी प्रकार के कष्टों का हरण करने में सक्षम हैं तथा मनोवाञ्छित वस्तु को प्रदान करने वाले हैं, के पूर्ण प्रसन्न होने पर इस संसार में व्यक्ति को उत्तम आचरण वाला पुत्र, एकमात्र पति के प्रति ही अनुरक्त रहने वाली, प्रिय लगने वाली पत्नी, ऐसा स्वामी जो कठोरतापूर्वक आचरण नहीं करता हो, अपितु दयाभाव से युक्त हो, अत्यन्त प्रेम करने वाले मित्र तथा निश्छल एवं समर्पित भाव से सेवा करने वाले सेवक तथा कपटरहित बन्धु लोग, पूर्णतया प्रसन्न रहने वाला मन, अत्यन्त मनोहर आकृति और कभी भी समाप्त न होने वाला ऐश्वर्य, धन-धान्य एवं विद्या से पवित्र मुख प्राप्त किया जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस संसार में ऊपर गिनाई गई वस्तुओं एवं विशेषताओं की प्राप्ति मनुष्य को सहज ही नहीं होती है और जिन्हें होती है, वे या तो अत्यन्त पुण्यवान् होते हैं या फिर अत्यन्त कृपालु भगवान् विष्णु ही यदि उनपर प्रसन्न हो जाएँ। दोनों ही स्थितियों में उपरोक्त का प्राप्त होना सौभाग्य का सूचक है।
विशेष- १. उपर्युक्त सभी बातें व्यक्ति को यदि प्राप्त हो सकें तो निश्चय ही वह सर्वाधिक भाग्यशाली होगा और वह सौभाग्य भगवान् विष्णु की कृपा से ही सम्भव है।
२. प्रस्तुत श्लोक से ऐसा प्रतीत होता है कि महाकवि भर्तृहरि वैष्णव मतावलम्बी थे।
३. श्लोक में प्रयुक्त परिजन का अर्थ सम्बन्धी भी किया जा सकता है।
४. कुछ विद्वानों के मत में यह श्लोक प्रक्षिप्त है।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥
६. श्लोक में प्रयुक्त 'हारिणी' पद का अर्थ 'रञ्जयति' भी किया जा सकता है, तब अर्थ होगा संसार को प्रसन्न करने वाले, किन्तु यह अर्थ उतना प्रभावशाली प्रतीत नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √तुष् + क्त = तुष्टे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
२. देह + इनि = देहिन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन) देहिना
३. प्रिय + तमप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रियतमा
४. प्रसाद + उन्मुखः = प्रसादोन्मुखः (गुण, आद् गुणः) प्रसादाय उन्मुखः (चतुर्थी तत्पुरुष)