भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 194 में से

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१४४ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्

५. √स्निह् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) स्निग्धम्
६. न वञ्चकः, अवञ्चकः (नञ् तत्पुरुष) √वञ्च् + ण्वुल् = वञ्चक
७. क्लेशस्य लेशः, क्लेशलेशः, निर्गतः क्लेशः यस्मात् तत् निष्क्लेशलेशम् (अव्ययीभाव समास)
८. विद्यया अवदातम् (तृतीया तत्पुरुष) विद्यावदातम्
९. अव + √दै + क्त = अवदातम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०. विष्टपं हर्तुम् शीलम् यस्य सः, विष्टपहारी (बहुव्रीहि) विष्टप् + √हृ + णिनि = विष्टपहारिन्
११. इष्ट + √दा + क = इष्टद
१२. आ + √कृ + घञ् = आकारः

कर्म-पद्धतिः

नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगाः,
विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः।
फलं कर्मायत्तं किममरगणैः किञ्च विधिना,
नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न तेभ्यः प्रभवति॥९०॥

अन्वय- (वयम्) देवान् नमस्यामः, ननु ते अपि हतविधेः वशगाः, विधिः वन्द्यः, सः अपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः, फलम् कर्मायत्तम्, अमरगणैः किम्? किम् च विधिना? तत् कर्मभ्यः नमः येभ्यः विधिः अपि न प्रभवति।

अनुवाद- (हम) देवताओं को नमस्कार करते हैं, किन्तु वे भी दुष्ट विधाता के वश में हैं। (तो फिर) विधाता ही वन्दना के योग्य है, वह भी केवल निश्चित कर्म के अनुसार (ही) फल देने वाला है (इस प्रकार यदि) फल (मात्र) कर्म के अधीन हैं (तो) देवताओं से क्या ? और विधाता से क्या ? उन कर्मों को (ही) नमस्कार है, जिन पर विधाता का भी प्रभाव नहीं होता है।

व्याख्या- कवि सर्वप्रथम देवताओं को शक्तिशाली एवं सर्वोपरि मानते हुए उनके प्रति नमन करता है, किन्तु तभी उसे विचार आता है कि देवता भी सर्वोपरि नहीं हैं, वे भी भाग्य के अधीन हैं, क्योंकि उनके आदेश की पालना में ही वे अनेक कार्य करने को बाध्य हैं। तब कवि विधाता को सर्वोपरि समझते हुए उसे नमन करने का विचार बनाता है, तभी उसे ध्यान आता है कि यह विधाता भी पूर्णतया स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, अपितु यह जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्रदान, करता है, कर्म फल में उसकी इच्छा लेशमात्र भी प्रभावी नहीं होती।

पुनः कवि विचार करता है— जब फल प्राप्ति पूर्णतया कर्म के अनुसार ही होती है अर्थात् व्यक्ति यदि अच्छे कर्म करेगा तो अच्छा फल मिलेगा और यदि पाप कर्म करेगा

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