नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १४५
तो निश्चय ही उसे बुरे फल की प्राप्ति होगी। तो फिर कवि कहता है कि तब हमें देवताओं की वन्दना से क्या लाभ ? अर्थात् हम उनकी वन्दना नहीं करेंगे। इसी प्रकार उस विधाता के प्रति भी नमन से कोई लाभ नहीं है।
हम तो एक मात्र कर्म की ही पूजा करते हैं, जिनको करने पर विधाता भी फल देने के लिए बाध्य होगा।
विशेष- १. कर्म की ही सर्वोपरि महत्ता का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन किया गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'हत' पद विधाता के प्रति उपेक्षा प्रकट करते हुए गाली के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
३. प्रकृति में पूर्णतया कर्मफल का सिद्धान्त ही लागू होता है।
४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसैःरुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी॥
५. 'नमस्यामः' पद यहाँ वर्तमानकालिक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए नाम धातु पद से बनकर प्रयुक्त हुआ है।
६. 'ननु' अव्यय का प्रयोग 'किन्तु' अर्थ की अभिव्यक्ति में हुआ है।
७. नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च सूत्र से नमः के योग में 'तेभ्यः कर्मभ्यः' में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. नमस् (नाम धातु) + क्यच् (लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) नमस्यामः
२. हतः विधिः हतविधिः तस्य (कर्मधारय) हतविधेः
३. वशम् गच्छन्ति इति वशगाः
४. √वन्द् + ण्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वन्द्यः
५. नियतम् नियतम् प्रति प्रतिनियतम् (अव्ययीभाव)
६. फल + √दा + क = फलदः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
७. आ + √यत् + क्त = आयत्तम्
८. अमराणाम् गणः, अमरगणः तैः अमरगणैः (षष्ठी तत्पुरुष)
९. प्र + √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रभवति
१०. कर्मणाम् आयत्तम् = कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
११. नमस्यामः + देवान् (हशि च - :- उ— ओ— आद् गुणः से)
१२. हतविधेः + ते + अपि (विसर्जनीयस्य सः, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
१३. विधिः + वन्द्यः (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) (:- र्)
१४. कर्म + एक = कर्मैकं (वृद्धिरेचि, अ + ए = ऐ)
१५. कर्म + आयत्तम् (अकः सवर्णे दीर्घः— अ + आ = आ)