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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

नीतिशतकम् १४५

तो निश्चय ही उसे बुरे फल की प्राप्ति होगी। तो फिर कवि कहता है कि तब हमें देवताओं की वन्दना से क्या लाभ ? अर्थात् हम उनकी वन्दना नहीं करेंगे। इसी प्रकार उस विधाता के प्रति भी नमन से कोई लाभ नहीं है।

हम तो एक मात्र कर्म की ही पूजा करते हैं, जिनको करने पर विधाता भी फल देने के लिए बाध्य होगा।

विशेष- १. कर्म की ही सर्वोपरि महत्ता का सुन्दर ढंग से प्रतिपादन किया गया है।

२. प्रस्तुत श्लोक में 'हत' पद विधाता के प्रति उपेक्षा प्रकट करते हुए गाली के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

३. प्रकृति में पूर्णतया कर्मफल का सिद्धान्त ही लागू होता है।

४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
रसैःरुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी॥

५. 'नमस्यामः' पद यहाँ वर्तमानकालिक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए नाम धातु पद से बनकर प्रयुक्त हुआ है।

६. 'ननु' अव्यय का प्रयोग 'किन्तु' अर्थ की अभिव्यक्ति में हुआ है।

७. नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च सूत्र से नमः के योग में 'तेभ्यः कर्मभ्यः' में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. नमस् (नाम धातु) + क्यच् (लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) नमस्यामः
२. हतः विधिः हतविधिः तस्य (कर्मधारय) हतविधेः
३. वशम् गच्छन्ति इति वशगाः
४. √वन्द् + ण्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वन्द्यः
५. नियतम् नियतम् प्रति प्रतिनियतम् (अव्ययीभाव)
६. फल + √दा + क = फलदः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
७. आ + √यत् + क्त = आयत्तम्
८. अमराणाम् गणः, अमरगणः तैः अमरगणैः (षष्ठी तत्पुरुष)
९. प्र + √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रभवति
१०. कर्मणाम् आयत्तम् = कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
११. नमस्यामः + देवान् (हशि च - :- उ— ओ— आद् गुणः से)
१२. हतविधेः + ते + अपि (विसर्जनीयस्य सः, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
१३. विधिः + वन्द्यः (विसर्जनीयस्य सः, ससजुषो रुः) (:- र्)
१४. कर्म + एक = कर्मैकं (वृद्धिरेचि, अ + ए = ऐ)
१५. कर्म + आयत्तम् (अकः सवर्णे दीर्घः— अ + आ = आ)

१४६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे,
विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटको भिक्षाटनं कारितः^१,
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥१११॥

अन्वय- येन (कर्मणा) ब्रह्मा (अपि) कुलालवत् ब्रह्माण्ड भाण्डोदरे नियमितः, येन विष्णुः (अपि) दशावतार- गहने महासंकटे क्षिप्तः, येन कपालपाणिपुटकः रुद्रः (अपि) भिक्षाटनम् कारितः, (येन) सूर्यः गगने नित्यम् एव भ्राम्यति, तस्मै कर्मणे नमः।

अनुवाद- जिस (कर्म) के द्वारा ब्रह्मा (भी) कुम्हार के समान, ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के अन्दर नियन्त्रित कर दिया गया, जिसके द्वारा विष्णु (भी) दस अवतार रूपी गम्भीर (और) महान् संकट में डाल दिया गया। जिसके द्वारा कपाल रूपी दोने को हाथ में लिए हुए शिव से (भी) भिक्षावृत्ति करा दी गई। (जिसके द्वारा) सूर्य (भी) आकाश में नित्य ही घूमाया जा रहा है, उस कर्म को नमस्कार है।

व्याख्या- कर्म के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं, इसका प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में करते हुए कवि कहता है कि— कर्म की सामर्थ्य के कारण ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण करने वाला ब्रह्मा भी ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के भीतर बन्द होकर, कुम्हार जिस प्रकार बर्तन बनाने में लगा रहता है, ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि का निर्माण करने में दिन-रात बिना विश्राम किए लगा हुआ है।

इसी प्रकार यह कर्म का ही प्रभाव है कि उसने सामर्थ्यशाली संसार का पालन करने वाले भगवान् विष्णु को भी एक दो नहीं, अपितु पूरे दस-दस अवतार लेने के लिए बाध्य कर दिया तथा उनमें उन्हें अनेकों कष्टों का भी सामना करना पड़ा।

इतना ही नहीं उसी शक्तिशाली एवं प्रभावशाली कर्म ने सम्पूर्ण संसार का विनाश करने वाले, भयंकर प्रलयकारी देवता भगवान् रुद्र को भी मृत मनुष्य की खोपड़ी का भिक्षा पात्र हाथ में लेकर भिक्षावृत्ति के लिए बाध्य कर दिया।

इतना ही नहीं सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाला, तेजस्वी सूर्य भी जिसके आदेश एवं प्रभाव के कारण आकाश में एक दो दिन से नहीं, अपितु अनन्त काल से चक्कर लगाने के लिए बाध्य है। ऐसे प्रभावशाली उस कर्म को प्रणाम हैं अर्थात् अन्त में कवि कर्म की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार कर नमन करता है।

विशेष- १. ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता भी कर्म के द्वारा नियन्त्रित हैं। अतः कर्म की सर्वोच्चसत्ता स्वतः सिद्ध है।


१. कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं सेवते।

नीतिशतकम् १४७

२. ब्रह्मा को निर्माण का, विष्णु को पालन का तथा शिव को विनाश का देवता माना जाता है।
३. पुराणों के अनुसार, भगवान् विष्णु ही संसार को कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए अनेक अवतार ग्रहण करते हैं।
४. 'नमः' पद को योग में 'कर्मणे' में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है— सूत्र नमः स्वस्तिस्वाहा स्वधाऽलं वषट्योगाच्च।
५. शिव की विशेषता है कि वे मनुष्य की खोपड़ी रूपी पात्र को ही सदा अपने पास रखते हैं तथा सर्वसामर्थ्यशाली होते हुए भी भिक्षाटन करके अपनी जीविका चलाते हैं।
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
७. ब्रह्मा की उपमा कुम्हार से दी गई है, अतः उपमालंकार, लक्षण—
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
८. ब्रह्माण्ड रूपी पात्र में रूपक अलंकार, लक्षण—
तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कुलाल + मतुप् = कुलालवत्, कुलालेन तुल्यः, इति
२. √क्षिप् + क्त = क्षिप्तः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. महति सङ्कटे, महासंकटे (सप्तमी तत्पुरुष)। √कृ + णिच् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कारितः √भ्रम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भ्राम्यति। कपालं पाणिपुटके यस्य सः, कपालपाणिपुटकः (बहुव्रीहिं) दश अवताराः दशावताराः, तैः गहनम्, दशावतारगहनं, तस्मिन् दशावतारगहने अव + √तृ + घञ् = अवतारः पाणि एव पुटकम्, तस्मिन् (कर्मधारय) √भिक्ष् + अट् + ल्युट् = भिक्षाटनम् नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितः।

या साधूंश्च खलान् करोति, विदुषो मूर्खान् हितान् द्वेषिनः,
प्रत्यक्षं कुरुते परोक्षममृतं हलाहलं तत्क्षणात्।
तामाराधय सत्क्रियां भगवतीं भोक्तुं फलं वाञ्छितं,
हे साधो! व्यसनैर्गुणेषु विपुलेष्वास्थां वृथा मा कृथाः॥११२॥

अन्वय- हे साधो! या खलान् साधून् करोति, मूर्खान् च विदुषः, द्वेषिणः हितान्, परोक्षम् प्रत्यक्षम् कुरुते, हलाहलम् तत् क्षणात् अमृतम् कुरुते, वाञ्छितम् फलम् भोक्तुम् ताम् भगवतीम् सत्क्रियाम् आराधय। व्यसनैः विपुलेषु गुणेषु वृथा आस्थाम् मा कृथाः।

१४८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- हे सज्जन, जो दुष्टों को सज्जन बनाती है और मूर्खों को विद्वान्, द्वेष करने वालों को हितकारी, परोक्ष को प्रत्यक्ष करती है। हलाहल (विष) को उसी क्षण अमृत बना देती है, मनोवाञ्छित फल को भोगने के लिए, उस देवी सत्क्रिया की आराधना करो। आसक्तियों के कारण बहुत से गुणों पर व्यर्थ श्रद्धा मत करो।

व्याख्या- मनुष्य एक मात्र सत्कार करने की क्रिया में निपुण हो जाता है तो फिर उसे अन्य किसी गुण की आवश्यकता नहीं है। घर आए अतिथि का व्यक्ति को अवश्य सत्कार करना चाहिए, क्योंकि यह दैवी गुणों से सम्पन्न सत्क्रिया मनुष्य को, यदि वह दुष्ट प्रकृति का है तो सज्जन बनाती है। यदि वह मूर्ख है तो उसे विद्वान् बनाती है, अर्थात् ऐसा करने से वह विद्वानों के सम्पर्क में आएगा तथा उसे अनेक विद्वानों का आशीर्वाद तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

जो लोग उससे शत्रुता रखते हैं वे उसके मित्र तथा हितेच्छु हो जाएँगे, जिस वस्तु का उसे ज्ञान नहीं है, वह भी जिनकी उसने सेवा की है तथा सत्कार किया है, उनसे प्रत्यक्षवत् ज्ञात हो जायेगी। इस अतिथि सत्कार रूपी देवी में तो वह गुण है कि यह हलाहल जैसे भयंकर विष के समान वातावरण एवं वस्तु को भी अमृत के समान मधुर और हितकारी बना देती है।

इसलिए अन्त में कवि सभी व्यक्तियों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि यदि तुम सब अपने मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति करना चाहते हो तो इस सत्क्रिया रूपी ऐश्वर्य की देवी की आराधना करो। अत्यधिक लालच एवं आसक्ति के कारण अलग-अलग अन्यान्य गुणों के पीछे भागना व्यर्थ है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में सेवा (अतिथि सत्कार) को सर्वोपरि प्रतिपादित किया है। काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

२. यहाँ साधो शब्द व्यञ्जना से दुष्ट अर्थ की भी अभिव्यक्ति कर रहा है।

३. यदि व्यक्ति में सेवाभाव है तो वह निश्चय ही सभी का मन जीतने में समर्थ है। अतः व्यक्ति को सेवाभावी 'अतिथि देवो भव' की भावना वाला होना चाहिए।

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—

सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

५. हलाहल पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था, जिसके कारण सम्पूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया था। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने उसे अपने कण्ठ में धारण किया था।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √द्विष् + णिनि = द्वेषिन् (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) द्वेषिनः
२. √वाञ्छ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वाञ्छितम्

नीतिशतकम् | १४९

३. √भुज् + तुमुन् = भोक्तुम्
४. भग + वतुप् = भगवत् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भगवतीम्
५. √कृ + सिप् (लुङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन), कृथाः
६. यहाँ मा पद के योग में अकृथाः पद में अ के आगम का निषेध हुआ है।
७. हित + अच् = हित (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) हितान्
८. अक्ष्णोः प्रति, प्रत्यक्षम् (अव्ययीभाव)
९. सत् + √कृ + इयङ् + टाप् = सत्क्रियाम्
१०. आ + √राध् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) आराधय
११. साधून् + च (नश्छव्यप्रशान् )न्– रु– ः– स्– शं
१२. √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) करोति
१३. न मृतम्, इति अमृतम् (नञ् समास)

शुभ्रं सद्म सविभ्रमा युवतय श्वेतातपत्रोज्ज्वला,
लक्ष्मीरीत्यनुभूयते चिरमनुस्यूते शुभे कर्मणि।
विच्छिन्ने नितरामंनगकलह क्रीडात्रुटत्तन्तुकं,
मुक्ताजालमिव प्रयाति झटिति भ्रश्यत् दिशो दृश्यताम्॥११३॥

अन्वय- चिरम् शुभे कर्मणि अनुस्यूते, शुभ्रम् सद्म, सविभ्रमाः युवतयः, श्वेतातपत्रोज्ज्वला लक्ष्मीः इति अनुभूयते, (किन्तु एतेषाम्) विच्छिन्ने नितराम् अनङ्गकलहक्रीडात्रुटत्तन्तुकम् मुक्ताजालम् इव भ्रंश्यत् झटिति दिशः प्रयाति (इति) दृश्यताम्।

अनुवाद- चिरकाल तक शुभ कर्मों का उदय होने पर (मनुष्य के) द्वारा धवल (स्वच्छ) महल, विलासवती स्त्रियाँ, श्वेत छत्र से देदीप्यमान लक्ष्मी इत्यादि का अनुभव किया जाता है। (किन्तु इन कर्मों के) नष्ट होने पर अत्यन्त काम कलह की क्रीडा में टूटे हुए धागे वाले मोतियों के समूह के समान टूटते हुए शीघ्र ही (ये सब विविध) दिशाओं में फैल जाते हैं, (यह) जरा देखिये।

व्याख्या- मनुष्य के द्वारा किए गए पूर्वजन्मों के शुभ कर्म जब–जब उदित होते हैं तो उसे उन पुण्य कर्मों के फलस्वरूप संगमरमर के बने स्वच्छ सुन्दर और शुभ्र महलों में भोग भोगना, सुन्दर एवं अत्यन्त विलासपूर्ण चेष्टाओं से युक्त निपुण स्त्रियों का सांन्निध्य एवं आनन्द तथा असीम ऐश्वर्य की स्वामिनी लक्ष्मी, जिसके ऊपर श्वेत छत्र सदैव देदीप्यमान रहता है, का उपभोग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
किन्तु जैसे ही ये पुण्य कर्म भोगने के पश्चात् नष्ट हो जाते हैं और दूसरे पुण्य कर्मों के अभाव में ये सब सुख सुविधाएँ, भोग सामग्रियाँ आदि ठीक उसी प्रकार तितर–बितर

१५० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

हो जाती हैं, जैसे अत्यन्त उद्दाम काम-क्रीड़ा के कलह में टूटे हुए धागे वाली माला के मोती सर्वत्र विविध दिशाओं में फैल जाते हैं।

आप सब भी इस विषय में गम्भीरता से विचार करें, यह कितनी आश्चर्यजनक बात है।

विशेष- १. पुण्यकर्मों का प्रभाव अद्भुत है। अतः व्यक्ति को सदैव शुभ कर्म ही करने चाहिएँ। २. शुभ कर्मों के नष्ट होने पर सभी भोगसामग्री किस अप्रत्याशित ढंग से बिखर जाती है। उसके लिए माला के मोतियों की कल्पना अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है। ३. उपमालंकार का प्रयोग दर्शनीय है। लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते॥ ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग भी प्रशंसनीय है। लक्षण— अनुप्रासः शब्द साम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्। ६. झटिति पद यहाँ अद्भुत कल्पना की अभिव्यक्ति कर रहा है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. वि + √छिद् + क्त (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) विच्छिन्ने २. √भ्रंश् + शतृ = भ्रश्यत् ३. विभ्रमैः सहिताः, सविभ्रमाः (अव्ययीभाव) ४. अनु + √भू + णिच् + त (आत्मनेः, प्रथम पुरुष, एकवचनं) अनुभूयते ५. अनु + √सिव् + क्त = अनुस्यूते (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ६. प्र + √इण् (गतौ) तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रयाति

गुणवदगुणवद् वा कुर्वता कार्यमादौ,
परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन।
अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते-
र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः॥११४॥

अन्वय- गुणवत् अगुणवत् वा कार्यम् कुर्वता पण्डितेन आदौ यत्नतः परिणतिः अवधार्या। अतिरभस-कृतानाम् कर्मणाम् विपाकः आविपत्तेः शल्यतुल्यः हृदय दाहिं भवति।

अनुवाद- अच्छा या बुरा काम करते हुए विद्वान् के द्वारा प्रारम्भ में (ही) यत्नपूर्वक (उसके) परिणाम पर विचार कर लेना चाहिए, (अन्यथा) अत्यन्त जल्दी में

नीतिशतकम् १५१

किए गए कार्यों का परिणाम मृत्युपर्यन्त कांटे के समान हृदय को जलाने (पीड़ा) वाला होता है।

व्याख्या- बुद्धिमान् व्यक्ति जब भी कोई अच्छा या बुरा कार्य प्रारम्भ करे, उससे पहले वह भलीप्रकार सूक्ष्म-दृष्टि से विचारं करते हुए, इस कार्य का परिणाम अच्छा होगा या बुरा यह जान लेवे।

कई बार व्यक्ति किसी काम को भावावेश में जल्दीबाजी में शुरू तो कर देता है, किन्तु उसके परिणाम उसे अत्यन्त कटु रूप में मिलते हैं, जिनका उसे मरणपर्यन्त अत्यन्त पश्चाताप होता रहता है, इस कार्य के फल उसके हृदय को ठीक उसी प्रकार वेदना पहुँचाते हैं, जिस प्रकार कोई कांटा शरीर के मर्मस्थल हृदय में प्रवेश करने के बाद पीड़ा पहुँचाने वाला होता है, क्योंकि ये दोनों ही वेदनाएँ असह्य होती है। वह व्यक्ति पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है।

विशेष- १. व्यक्ति को किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व उसके परिणाम के प्रत्येक पक्ष पर भली-भाँति विचार कर लेना चाहिए।

२. महाकवि भारवि ने भी कहा है— ‘‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’’ । (किरातार्जुनीयम्)

३. कई बार व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्य के परिणाम से इतना दुःखी एवं पीड़ित होता है जैसे उसके हृदय में किसी ने विष से बुझा हुआ नुकीला बाण ही चुभा दिया हो।

४. उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

५. 'हृदय दाहि' से अभिप्राय 'वेदना अतिरेक' की अनुभूति से है।

६. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।

७. 'पण्डित' शब्द का प्रयोग 'बुद्धिमान्' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. गुण + मतुप् = गुणवत्, न गुणवत् इति अगुणवत् (नञ् समास)
२. √कृ + शतृ (तृतीया विभक्ति, एकवचन, पुल्लिंग) कुर्वता
३. परि + √नम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) परिणतिः
४. यत्न + तसिल् = यत्नतः
५. अव + √धृ + ण्यत् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अवधार्या
६. वि + √पच् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विपाकः
७. वि + √पद् + क्तिन् = विपत्तिः
८. हृदय + √दह् + णिनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) हृदयदाही

१५२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

९. कर्मणाम् जातम् कर्मजातम् (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √जन् + क्त = जातम्
११. पण्डा + इतच् = पण्डितः
१२. √भू + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) भवति

स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति च लशुनं चन्दनैरिन्धनाद्यैः,
सौवर्णैर्लाङ्गलाग्रैर्विलिखति वसुधामर्क्रमूलस्य हेतोः।
कृत्वा कर्पूरखण्डान् वृत्तिमिह कुरुते कोद्रवाणां समन्तात्
प्राप्येमां कर्मभूमिं न चरति मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः॥११५॥

अन्वय- यः मन्दभाग्यः मनुजः इमाम् कर्मभूमिम् प्राप्य, इह तपः न चरति, सः वैदूर्यमय्याम् स्थाल्याम् चन्दनैः इन्धनाद्यैः लशुनम् पचति, अर्कमूलस्य हेतोः सौवर्णैः लाङ्गलाग्रैः वसुधाम् विलिखति, कर्पूरखण्डान् कृत्वा कोद्रवाणाम् समन्तात् वृत्तिम् कुरुते।

अनुवाद- जो भाग्यविहीन व्यक्ति इस कर्मभूमि को प्राप्त करके यहाँ तपस्या का आचरण नहीं करता है, वह वैदूर्यमणि से निर्मित बटलोई में चन्दन आदि के इन्धनों के द्वारा लहसुन पकाता है, आक की जड़ से लिए सोने के हल के अग्रभागों के द्वारा पृथिवी को खोदता है, कर्पूर के टुकड़े करके कोदों (अन्न) के चारों ओर घेरा बनाता है।

व्याख्या- सामान्य रूप से मनुष्य-जीवन दुर्लभ है, साथ ही यह जीवन ईश्वर ने इस संसार में कर्म करने के लिए प्रदान किया है, इसलिए यह संसार वस्तुतः कर्मभूमि है, किन्तु यदि कोई व्यक्ति इस कर्मभूमि रूपी संसार में आकर कर्म रूपी कठोर तप का आचरण नहीं करता है, अन्यान्य व्यर्थ के कार्य जैसे सोना, खाना, खेलना आदि कार्यों में ही अपना अमूल्य जीवन व्यतीत करता है, तो उसका यह जीवन पूर्णतया निरर्थक है और ये सब कार्य भी ठीक उसी प्रकार मूर्खतापूर्ण और निरर्थक हैं, जैसे—

कोई व्यक्ति बहुमूल्य वैदूर्यमणिजटित बटलोई में चन्दन आदि बहुमूल्य लकड़ी के ईंधन को जलाकर लहसुन जैसी तुच्छ वस्तु को पकाने का कार्य करे अथवा उसका यह कार्य सोने जैसी मूल्यवान् धातु से बने हल के द्वारा आक की जड़ जैसी तुच्छ वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करने जैसा अविवेकपूर्ण होगा।

उस व्यक्ति का यह कार्य, कोदों नामक खाद्यान्न जो जंगल में स्वतः ही उग आता है, की रक्षा के लिए कर्पूर के टुकड़ों से बाढ़ बनाने जैसा होगा।

अतः मनुष्य को इस संसार रूपी कर्मभूमि में आकर, मानवता की सेवा रूप प्रशंसनीय कार्यों में ही लिप्त रहना चाहिए, अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।


१. पचति तिलकणानिन्धनेश्चन्दनाद्यैः (चन्दन के ईंधन से तिलकणों को पकाता है) इन्धनोत्रै (इन्धनों के समूह से)

नीतिशतकम् १५३

विशेष- १. व्यक्ति को सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर अपने मूल्यवान् जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

२. संसार में जन्म लेकर भी यदि कोई व्यक्ति श्रेष्ठ कर्म नहीं करता है, तो वह अभागा ही माना जाएगा।

३. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्॥

४. कोदों अत्यन्त सामान्य प्रकार का अन्न जिसे तपस्वी वनों में प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह वहाँ स्वतः उग आता है।

५. दीपक तथा काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मन्दं भाग्यं यस्य सः, मन्दभाग्यः (बहुव्रीहि) २. कर्मणः भूमिः, कर्मभूमिः, तम् कर्मभूमिम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √चर् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) चरति ४. स्थाली + ङि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) स्थाल्याम् ५. √पच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) पचति ६. सुवर्ण + अण् = सौवर्णम् (नपुं., तृतीया विभक्ति, बहुवचन) सौवर्णैः ७. लाङ्गलानाम् अग्रम् तैः (षष्ठी तत्पुरुष) लाङ्गलाग्रैः ८. अर्कस्य मूलम्, अर्कमूलम्, तस्य अर्कमूलस्य (षष्ठी तत्पुरुष) ९. वि + √लिख् + तिप् = विलिखति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १०. कर्पूरस्य खण्डान् = कर्पूरखण्डान् (षष्ठी तत्पुरुष) ११. √वृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) वृत्तिः

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं, विद्याऽपि नैव न च यत्नकृताऽपि सेवा। भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि, काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः॥११६॥

अन्वय- न एव आकृतिः फलति, न एव कुलम्, न शीलम्, विद्या अपि फलति न एव, यत्नकृता सेवा अपि न (फलति), च यथा वृक्षाः (तथा) एव पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि खलु काले फलन्ति।

अनुवाद- न ही (सुन्दर) आकृति फलती है, न ही कुल, न शील। विद्या भी (फलवती) नहीं होती है और यत्नपूर्वक की गई सेवा भी नहीं (फलती है), (अपितु) जिस प्रकार वृक्ष (फलवान् होते हैं), (वैसे) ही पुरुष के पूर्व (जन्म) के तप के द्वारा सञ्चित भाग्य ही समय (आने) पर फलीभूत होते हैं।

१५४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याख्या- मनुष्य कितना ही सुन्दर क्यों न हो, कितने ही उच्च वंश में उसका जन्म क्यों न हुआ हो। कितना ही सदाचारी क्यों न हो, उसने कितने भी शास्त्रों का अध्ययन क्यों न किया हो अथवा कितने भी समर्पण भाव से तन्मयतापूर्वक दूसरों की सेवा क्यों न की हो, ये सब बातें व्यक्ति को शुभ फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं अर्थात् उक्त किसी भी कारण से लाभ एवं सुख की प्राप्ति ही हो यह अनिवार्य नहीं है।

अपितु व्यक्ति ने पूर्वजन्म में जिन कर्मों को तपस्यापूर्वक करते हुए अर्थात् शारीरिक कष्टों को सहन करते हुए इकट्ठा किया है, ऐसे पुण्य कर्मों द्वारा निर्मित भाग्य ही ठीक उसी प्रकार फल देने वाला होता है, जिस प्रकार उपयुक्त ऋतुकाल आने पर सभी वृक्ष फल देने वाले होते हैं।

कहने का तात्पर्य है कि पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति का भाग्य निर्माण होता है और वह भाग्य ही उपयुक्त समय पर व्यक्ति को सुख, उन्नति, यश, लाभादि प्रदान करने वाला होता है।

विशेष- १. मनुष्य के भाग्य का निर्माण भी पूर्वजन्म के कर्मों के द्वारा ही होता है।
२. मनुष्य की उन्नति, सुखादि में कुल, शील, विद्या, सेवा और सुन्दर आकृति आदि का कोई महत्त्व नहीं है।
३. कर्मफल के सिद्धान्त को वृक्ष का दृष्टान्त देकर समझाया गया है। अतः दृष्टान्त अलंकार—

दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।

४. समय से पूर्व किसी भी कार्य का होना सम्भव नहीं है।
५. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. आ + √कृ + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) आकृतिः
२. यत्नेन कृता, यत्नकृता (तृतीया तत्पुरुष) √यत् + नङ् = यत्न
३. पूर्वेण तपसा पूर्वतपसा (तृतीया तत्पुरुष)
४. सम् + √चि + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) संचितानि
५. √फल् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) फलन्ति
६. √विद् + क्यप् + टाप् = विद्या
७. न + एव + आकृतिः (वृद्धिरेचि, अकः सवर्णे दीर्घः)
८. यथा + एव= यथैव (वृद्धिरेचि) (आ + ए = ऐ)
९. √व्रंश्च् + क्सु = वृक्षः
१०. √भज् + ण्यत् = भाग्यम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) भाग्यानि

नीतिशतकम्१५५

मज्जत्वम्भसि यातु मेरुशिखरं शत्रूञ्जयत्वाहवे,
वाणिज्यं कृषिसेवनादि सकलाः विद्याः कला शिक्षतु।
आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत् कृत्वा प्रयत्नं परः,
नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्य नाशः कुतः।॥११७॥

अन्वय- (मनुष्यः) अम्भसि मज्जतु, मेरु-शिखरम् यातु, आहवे शत्रून् जयतु, वाणिज्यम् कृषि- सेवनादिसकलाः विद्याः कलाः शिक्षतु, परः प्रयत्नम् कृत्वा खगवत् विपुलम् आकाशम् प्रयातु, इह कर्मवशतः अभाव्यम् न भवति, भाव्यस्य नाशः कुतः।

अनुवाद- (मनुष्य) जल में डूब जाए, मेरु की चोटी पर चलां जाए, युद्ध में शत्रुओं को जीत ले, व्यापार, कृषि, सेवा आदि सभी विद्याएँ (एवं) कलाएँ सीख ले, अत्यधिक प्रयत्न करके पक्षी के समान् विस्तृत आकाश में चला जाए, इस (संसार) में कर्म के वशीभूत अनहोनी नहीं होती, (तो फिर) होनी का नाश कैसे (सम्भव है)।

व्याख्या- कर्म फल पर आधारित होनहार होकर रहती है, उसे कोई भी रोकने में समर्थ नहीं है, ठीक इसी प्रकार अनहोनी किसी भी स्थिति में नहीं हो सकती, भले में व्यक्ति जल में समा जाए अथवा सुमेरु पर्वत की चोटी पर भी क्यों न चढ़ जाए। युद्ध स्थल पर शत्रुओं पर प्राप्त विजय भी तभी सम्भव है जब वह होनहार हो, व्यापार, खेती अथवा सेवाकार्य आदि सभी कलाओं में निपुणता क्यों न प्राप्त कर ले। प्रयत्नपूर्वक पक्षी के समान आकाश में भी क्यों न उड़ने लगे, किन्तु इन सब बातों को देखकर इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि होता वही है जो होनहार होती है, जिसे होनी भी कहते हैं।

जो अनहोनी है, उसका किसी भी काल अथवा परिस्थिति में होना सम्भव नहीं होता।

विशेष-

१. यहाँ अभाव्य से अभिप्राय अनहोनी से है तथा भाव्य से अभिप्राय होनी से है।

२. मनुष्य को इस संसार में जो भी सुख अथवा दुःख प्राप्त होता है, वह उसके पूर्वजन्म में किए गए कर्मों द्वारा प्राप्त भवितव्यता के सिद्धान्त के आधार पर ही होता है।

३. मनुष्य कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य क्यों न कर ले, किन्तु भाग्य के सामने (जिसका निर्माण उसी द्वारा किए गए पूर्वजन्म के कर्मों से होता है), उसकी एक नहीं चलती। अतः व्यक्ति को सदैव श्रेष्ठ कार्य करने चाहिएँ।

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

५. यमक तथा दीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

१५६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √मज्ज् + तिप्( लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) मज्जतु २. मेरोः शिखरम् मेरुशिखरम् (षष्ठी तत्पुरुष) ३. √शिक्ष + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शिक्षतु ४. √नश् + घञ् = नाशः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √भू + ण्यत् = भाव्यम् ६. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) नाशः ७. किम् + तसिल् = कुतः ८. वणिज् + ष्यञ् = वाणिज्यम् ९. √सेव् + ल्युट् = सेवनम् १०. न भाव्यम् इति अभाव्यम् (नञ् समास) ११. खग + वतुप् = खगवत् १२. √कृ + क्त्वा = कृत्वा १३. मज्जतु + अम्भसि (इकोयणचि) (उ— व्) १४. न + अभाव्यम् (अकः सवर्णे दीर्घः) अ + अ = आ)

वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये,
महार्णवे पर्वतमस्तके वा।
सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा,
रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कृतानि॥१९८॥

अन्वय- पुरा कृतानि पुण्यानि सुप्तम्, प्रमत्तम्, विषमस्थितम्, वा (नरम्) वने, रणे, शत्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे, पर्वतमस्तके वा रक्षन्ति।

अनुवाद- पूर्व (जन्म) में किए गए पुण्य (कर्म) सोए हुए, असावधान अवस्था वाले अथवा विषम स्थिति वाले (मनुष्य की) वन में, युद्ध में, शत्रु, जल और अग्नि के बीच में, महासमुद्र में अथवा पर्वत की चोटी पर (भी) रक्षा करते हैं।

व्याख्या- मनुष्यों के पूर्वजन्म में किए गए पुण्य कर्मों से ही व्यक्ति के भाग्य का निर्माण होता है और वे पुण्य ही व्यक्ति की किसी भी कठिन परिस्थिति में सर्वत्र रक्षा करते हैं। भले ही व्यक्ति गहरी निद्रा में सोया हुआ हो, सावधान न हो अथवा किसी भी आपत्ति में क्यों न फँस गया हो, वन में जंगली जानवरों के बीच में भी क्यों न हो, शत्रुओं के बीच युद्ध स्थल पर ही क्यों न हो, गहरी नदी या समुद्र के जल में क्यों न खड़ा हो अथवा अग्नि के बीच ही क्यों न फँस गया हो, पर्वत की चोटी पर ही क्यों न स्थित हो, सर्वत्र उसके द्वारा किए गए पुण्य कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं।

नीतिशतकम् | १५७

विशेष- १. पुण्य कर्म अप्रत्याशित ढंग से कठिन से कठिन परिस्थिति में भी व्यक्ति की रक्षा करते हैं। इसका प्रतिपादन बहुत सुन्दर ढंग से किया गया है। २. सदैव व्यक्ति को पुण्य कर्म करने चाहिएँ, पाप कर्म नहीं। ३. कर्मफल के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। ४. उपेन्द्रवज्रा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ। ५. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. शत्रुश्च जलं च अग्निश्च शत्रुजलाग्नयः तेषां मध्ये शत्रुजलाग्निमध्ये (द्वन्द्व समास) २. महति अर्णवे = महार्णवे (सप्तमी तत्पुरुष) महान् अर्णवः तस्मिन् (कर्मधारय) = महार्णवे ३. पर्वतस्य मस्तके (षष्ठी तत्पुरुष) पर्वतमस्तके ४. √स्वप् + क्त = सुप्तम् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) ५. प्र + √मद् + क्त (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रमत्तम् ६. विषम + √स्था + क्त (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विषमास्थितम् ७. वि + सम, विगतो विरुद्धो वा समः (प्रादि समास) ८. √रक्ष् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) रक्षन्ति ९. √कृ + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) कृतानि १०. महा + अर्णवे (अकः सवर्णे दीर्घः, आ + अ = आ) महार्णवे ११. अर्णांसि सन्ति यस्मिन् = अर्णस् + व (सलोप) = अर्णवः

भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं,
सर्वे¹ जनाः सुजनतामुपयान्ति तस्य।
कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा,
यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य॥११९॥

अन्वय- यस्य नरस्य विपुलम् पूर्वसुकृतम् अस्ति, तस्य भीमम् वनम् (अपि) प्रधानम् पुरम् भवति, सर्वे जनाः तस्य सुजनताम् उपयान्ति, कृत्स्नाः च भूः सन्निधिरत्नपूर्णा भवति।

अनुवाद- जिस मनुष्य का अत्यधिक पूर्व (जन्म) का पुण्य है, उसके (लिए)


१. सर्वे जनाः (सभी लोग)

१५८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

भयंकर जंगल (भी) प्रमुख नगर हो जाता है, सभी लोग उसके (लिए) सज्जन हो जाते हैं और सम्पूर्ण पृथिवी समृद्धि और रत्नों से परिपूर्ण हो जाती है।

व्याख्या- जिस व्यक्ति ने पूर्व जन्म में श्रेष्ठ कर्म किए हैं, ऐसे पुण्यात्मा व्यक्ति के लिए कितना भी भयानक से भयानक वन क्यों न हो, उसके पुण्यों के प्रताप से वह भी उत्तम सुविधासम्पन्न महानगर बन जाता है। उनके प्रभाव से सभी लोग उसके लिए हितकर बन जाते हैं, इतना ही नहीं, अपितु वह जहाँ भी जाता है, समृद्धियाँ, ऐश्वर्य उसके साथ-साथ चलते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि व्यक्ति अच्छे कार्य करता है, तो उनसे उसे सदैव अच्छे फल की ही प्राप्ति होती है। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में उसे कष्ट प्राप्त नहीं होता।

विशेष- १. व्यक्ति के अच्छे कर्मों से पुण्यों की तथा बुरे कर्मों से पापों की प्राप्ति होती है। अतः व्यक्ति को सदैव अच्छे कर्म करने चाहिएँ। २. सुकर्मों के प्रताप से विपरीत परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं। काव्यलिंगं अलंकार का प्रयोग हुआ है। ३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सन्तः निधयः सन्निधयः, रत्नैः पूर्णा रत्नपूर्णा सन्निधिरत्नपूर्णा २. √अस् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = अस्ति ३. उप + √इण् (गतौ) + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) उपयान्ति

कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधिया भाव्यं सुविचार्यैव कुर्वता॥१२०॥

अन्वय- पुंसाम् फलम् कर्मायत्तम्, बुद्धिः कर्मानुसारिणी, तथापि, सुधिया सुविचार्य एव कुर्वता भाव्यम्।

अनुवाद- मनुष्यों को (प्राप्य) फल कर्म के अधीन है, बुद्धि (भी) कर्म का अनुसरण करने वाली है, फिर भी श्रेष्ठ बुद्धि वाले व्यक्ति को भली प्रकार विचार कर ही करते हुए होना चाहिए।

व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसे वैसे ही फल की प्राप्ति होती है, ठीक इसी प्रकार व्यक्ति जैसे काम करता है, उसकी बुद्धि भी उसी प्रकार का चिंतन करके वैसी ही हो जाती है।

इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति को सदैव भली प्रकार सोचविचार कर ही अर्थात् औचित्य, अनौचित्य आदि का चिंतन करके ही सद्बुद्धिपूर्वक ही कोई कार्य करना चाहिए।

श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।

नीतिशतकम् १५९

विशेष– १. कर्म की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। अतः व्यक्ति को सदा अच्छे कार्य करने चाहिएँ। २. अच्छे काम करने से व्यक्ति की बुद्धि अच्छा विचार करेगी, जिससे उस व्यक्ति का व्यक्तित्व भी अच्छा बनेगा, क्योंकि व्यक्ति जैसा विचार करता है उसका व्यक्तित्व वैसा ही बनता है। ३. अनुष्टुप् छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. कर्मणाम् आयत्तम्, कर्मायत्तम् (षष्ठी तत्पुरुष)
२. कर्म अनुसरति इति कर्मानुसारिणी
३. अनु + √सृ + णिनि + ङीप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अनुसारिणी
४. सु + वि + √चर् + ल्यप् = सुविचार्य
५. भू + ण्यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) भाव्यम्
६. √कृ + शतृ = कुर्वत् (पुल्लिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) कुर्वता
७. सुधीः यस्य सः सुधी तेन सुधिया (बहुव्रीहि)
८. तथा + अपि (अकः सवर्णे दीर्घः, आ + अ = आ)
९. सुविचार्य + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः यं^१कृत्वा नावसीदति॥१२१॥

अन्वय– आलस्यम् हि मनुष्याणाम् शरीरस्थः महान् रिपुः, उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यम् कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।

अनुवाद– आलस्य मनुष्यों का शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान (कोई) बन्धु नहीं है, जिसे करके (मनुष्य) दुःखी नहीं होता है।

व्याख्या– मनुष्य के शरीर में ही स्थित आलस्य उसका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान मनुष्य का अन्य कोई श्रेष्ठ बन्धु नहीं है, यदि व्यक्ति परिश्रम करता है तो उसके बाद उसे कार्य की सफलता असफलता दोनों ही स्थितियों में दुःख नहीं होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि सामान्यतः शत्रु हानिकर होता है, किन्तु यदि वह शत्रु उसके अपने घर में ही बैठा हो तब तो बात ही क्या ? वस्तुतः आलस्य मनुष्य के अपने


१. यत् कृत्वा

१६० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

घर रूपी शरीर में ही बैठा हुआ भयानक शत्रु है, जिससे सर्वाधिक हानि की सम्भावना है।

इसके विपरीत जो व्यक्ति परिश्रमशील है, उनका सबसे अधिक हित करने वाला, उनका अपना भाई उनके पास ही है। यदि व्यक्ति परिश्रम करता है और उसे सफलता नहीं मिलती है। तो मनुष्य को कम से कम यह पश्चाताप तो नहीं होता कि मैंने परिश्रम नहीं किया था।

विशेष- १. मनुष्य को कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए और सदैव परिश्रमशील बनना चाहिए। २. आलस्य को मनुष्य का शत्रु और परिश्रम को मनुष्य का श्रेष्ठ बन्धु बताया गया है। ३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. शरीरे तिष्ठति इति शरीरस्थः २. उद्यमेन समः उद्यमसमः ३. अव + √सद् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अवसीदति ४. न + अस्ति + उद्यमसमः + बन्धुः (अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि, हशिच)

नीतिशतकम् १६१

परिशिष्ट

(क) संस्कृत व्याख्या

१. आद्यन्त:-
शिरः...........................................................................शतमुखः।

२. संदर्भ:-
प्रस्तुतभावपूर्णः श्लोकः महाकविभर्तृहरिविरचितात् 'नीतिशतकम्' नाम गीतिकाव्यात् उद्धृतोऽस्ति।

३. प्रसङ्ग:-
श्लोकेऽस्मिन् महाकविना विवेकभ्रष्टानां पतनं अनेकप्रकारेण भवति, इति सोदाहरणं प्रतिपादितम्।

४. अन्वय:-
इयम् गंगा स्वर्गात् शार्वम् शिरः, पशुपति शिरस्तः क्षितिधरम्, उत्तुंगात् महीध्रात् अवनिम्, अवनेः च अपि जलधिम् (एवम् क्रमशः) अधः अधः स्तोकम् पदम् उपगता अथवा विवेकभ्रष्टानाम् विनिपातः शतमुखः भवति।

५. संस्कृत व्याख्या-
संसारेऽस्मिन् यदा मनुष्यः विवेकभ्रष्टः भवति तस्य पतनस्य तदानीं नैव काऽपि सीमा भवति विषयेऽस्मिन् गंगायाः उदाहरणमस्ति। एषा आरम्भे स्वर्गे वसति स्म सुखपूर्वकम्, किन्तु यदा एषा विवेकरहिता सञ्जाता तदा अस्याः पतनं कैलाशपर्वते विराजमानस्य शिवस्य शिरसि अभवत्, तस्मात् अपि स्थानात् हिमालये, किन्तु तत्रापि अस्याः स्थैर्यं सम्भवं न जातम्, तस्मात् उत्तुंगात्, स्थानात् सा पृथिव्यां पतिता। पुनः सा निम्नतमे स्थाने समुद्रे पतिता। यत्र सा अस्तित्वहीना सञ्जाता।
एवम् यः जनः विवेकरहितः भवति तस्य एतादृशी शोचनीया स्थितिरेव भवति। अतः जनः कदापि स्व विवेकं न परित्यजेत्।

७. विशेष:-
१. अस्य श्लोकस्य भाषा अतिसरला, भावबोधगम्या च वर्तते।
२. अत्र गंगायाः उपमा विवेकरहितेन जनेन सह प्रदत्ता।
३. शिखरिणी छन्दोऽत्र वर्तते, लक्षणमिदम्—

१६२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।

७. व्याकरणात्मक टिप्पणयः- १. शतम् मुखानि यस्य सः, शतमुखः (बहुव्रीहि) २. वि + नि + पत् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) • २. उप + √गम् + क्त + टाप् = उपगता ३. विवेकात् भ्रष्टः, विवेकभ्रष्टः, तेषां विवेकभ्रष्टानां (पञ्चमी तत्पुरुष)

(ख) हिन्दी व्याख्या

१. आद्यन्त-
यद्धात्रा....................................................................जलम्।

२. संदर्भ-
प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र महाकवि भर्तृहरि द्वारा विरचित गीतिकाव्यों में अग्रणी ‘नीतिशतकम्’ नामक काव्य से अवतरित है।

३. प्रसङ्ग-
व्यक्ति को कभी भी धनवानों के सामने दीनहीन नहीं बनना चाहिए, अपितु धैर्य को धारण करना चाहिए। इसी बात को सोदाहरण समझाते हुए कवि कहता है कि—

शेष व्याख्या श्लोक संख्या के अनुसार अन्वय हिन्दी अनुवाद, व्याख्या, विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणी आदि शीर्षकों के अन्तर्गत करनी चाहिए।

इस विषय में एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छात्रों को व्याख्या में विस्तार उतना ही देना चाहिए जितने विस्तार की उन्हें समय अनुमति प्रदान करे। यदि उन्हें ऐसा प्रतीत हो कि समय कम है तो उन्हें हिन्दी अनुवाद लिखने की आवश्यकता नहीं है। विशेष और व्याकरणात्मक टिप्पणियों में भी अपेक्षाकृत कम लिखा जा सकता है। ध्यान रहे परीक्षा में निर्धारित समय के अन्तर्गत सम्पूर्ण प्रश्न-पत्र का हल करना अधिक महत्त्वपूर्ण है।

(ग) विद्वत्पद्धति का सारांश

नीतिशतकम् में कवि ने एक ही विषय को लेकर कुछ श्लोकों की संरचना की है तथा उन्हें एक साथ संग्रह कर दिया गया। ये संग्रहित श्लोक ही तत्तत् पद्धति के नाम से कहे गये हैं। यहाँ हम विद्वत्पद्धति का संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। छात्रों को इसी प्रकार अन्य पद्धतियों का सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।

नीतिशतकम्१६३

जिस राजा के राज्य में शिष्यों को देने योग्य शास्त्रों से सम्पन्न, उत्कृष्ट काव्य निर्माण में निपुण, विद्वान्, कवि निर्धन अवस्था में रहते हैं। यह तो उस राजा की ही मूर्खता कही जाएगी, क्योंकि कवि तो बिना धन के भी ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। कवि जैसी मणियों को न पहचानने के लिए राजा जैसे जौहरी ही दोषी माने जाने चाहिएँ।

ऐश्वर्य सम्पन्न लोगों को विद्वानों का आदर करना चाहिए, क्योंकि उनके पास तो विद्या नामक अद्भुत गुप्त धन है और इस धन की विशेषता है कि यह सदा कल्याणों को ही देता है और साथ ही अधिकाधिक दान देने पर यह बढ़ता ही है।

कवि ने परिष्कृत वाणी को ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण बताया है—

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥

विद्याविहीन व्यक्ति तो पशु ही होता है। इसलिए व्यक्ति को सदैव विद्या अध्ययन करना चाहिए। विद्या में अनेक विशेषताएँ हैं। यह मनुष्य का छिपा हुआ खजाना है। यह यश, सुख और भोगों को देने वाली है। राजा भी विद्या की ही पूजा करते हैं धन की नहीं।

इसी प्रकार यदि व्यक्ति में श्रेष्ठ कविता बनाने की सामर्थ्य है तो उसके लिए राज्य भी बेकार है।

सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम्?

मनुष्य को यदि इस संसार में सफलता प्राप्त करनी है तो उसे कुछ बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए जैसे— दुष्टों से सदैव दुष्टतापूर्वक, सेवकों के साथ दयापूर्वक, विद्वानों के साथ सरलतापूर्वक तथा बंधुजनों के प्रति उदारतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए।

इसी प्रकार व्यक्ति को सदैव अच्छे लोगों की संगति ही करनी चाहिए, क्योंकि सत्संगति से व्यक्ति सत्य बोलना सीखता है, पापों से दूर रहता है तथा उसका सर्वत्र यश प्रसारित होता है—

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥२४॥

१६४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

जिन लोगों के पास विद्या नहीं है, दान नहीं करते, तपस्या का आचरण नहीं करते उन्हें कवि ने मनुष्य रूप में विचरण करते हुए पशु ही बर्ताया है। ठीक इसी प्रकार साहित्य, संगीत और कला से रहित व्यक्ति भी पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु ही है—

साहित्य-संगीत-कला-विहीनः,
साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानः,
तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥१३॥

इसी प्रकार राजाओं को कभी भी विद्वानों का अपमान नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी तो ऐसे पण्डितों के लिए तिनके का समान है। राजा यदि क्रोधित भी होता है तो अधिक से अधिक विद्वान् को अपने राज्य से निष्कासित कर सकता है, किन्तु उसकी योग्यता, क्षमता, विद्वत्ता आदि को तो किसी भी स्थिति में उससे नहीं ले सकता है। रससिद्ध कवियों के यशः शरीर में वृद्धावस्था और मरणादि से उत्पन्न भय नहीं होता है। अतः वे श्लाघनीय हैं।

(घ) शब्दार्थ

अंकितः = चिह्नित, अकरुणत्वम् = निर्दयता, अकारणविग्रहः = बिना कारण झगड़ा, अखिलाः = सम्पूर्ण, अज्ञः = न जानने वाला, अज्ञतायाः = मूर्खता का, अतिरभसा = अत्यन्त वेग से, अत्ति = खाता है, अथ = इसके पश्चात्, और अधः = नीचे, अधिगतपरमार्थान् = प्राप्त कर लिया है परमतत्त्व को जिसने, अनक्षरम् = विद्या रहित, अनवच्छिन्न = आच्छादित न किए जा सकने वाले, अनवद्या = प्रशंसनीय, अन्वेक्षणात् = बिना देखभाल से, अनिशम् = निरन्तर, अनुत्सेकः = अभिमान न होना, अनुपहतविधिः = जिसके विधान का खण्डन नहीं किया जा सकता, अनुयाहि = अनुसरण करो, अनुव्रताः = अनुकूल क्रिया, अनैकान्त्यात् = अनेक अवस्था वाला होने से, अन्तर्धनम् = गुप्तधन, अपहर्तुम् = अपहरण करने के लिए, अपाकरोति = दूर करती है।

अप्रगल्भः = असहासी, अप्रतिहताः = न रुकने वाली, अभिजनः = उत्तम कुल में उत्पन्न, अभिजातः = कुलीन, अभियोगः = परिश्रम, अभ्यर्चनीया = पूजनीय, अभ्युदये = उन्नति में, अम्भोद वर = श्रेष्ठ बादल, अम्भसि = जल में, अम्भोजिनी = कमलिनी, अर्घतः = मूल्य से, अर्थपरा = धन प्रदान करने वाली, अर्थिभ्यः = याचकों को, अर्थिसु = याचकों में, अर्थोष्मणा = धन की गर्मी के द्वारा, अवगतम् = जाना, अवञ्चकः = धोखा न देने वाला, अवदात् = उज्ज्वल, स्वच्छ, अवधार्या = विचार की जानी चाहिए,