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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 194 में से

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पृष्ठ 168

१४६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे,
विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटको भिक्षाटनं कारितः^१,
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥१११॥

अन्वय- येन (कर्मणा) ब्रह्मा (अपि) कुलालवत् ब्रह्माण्ड भाण्डोदरे नियमितः, येन विष्णुः (अपि) दशावतार- गहने महासंकटे क्षिप्तः, येन कपालपाणिपुटकः रुद्रः (अपि) भिक्षाटनम् कारितः, (येन) सूर्यः गगने नित्यम् एव भ्राम्यति, तस्मै कर्मणे नमः।

अनुवाद- जिस (कर्म) के द्वारा ब्रह्मा (भी) कुम्हार के समान, ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के अन्दर नियन्त्रित कर दिया गया, जिसके द्वारा विष्णु (भी) दस अवतार रूपी गम्भीर (और) महान् संकट में डाल दिया गया। जिसके द्वारा कपाल रूपी दोने को हाथ में लिए हुए शिव से (भी) भिक्षावृत्ति करा दी गई। (जिसके द्वारा) सूर्य (भी) आकाश में नित्य ही घूमाया जा रहा है, उस कर्म को नमस्कार है।

व्याख्या- कर्म के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं, इसका प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में करते हुए कवि कहता है कि— कर्म की सामर्थ्य के कारण ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण करने वाला ब्रह्मा भी ब्रह्माण्ड रूपी बर्तन के भीतर बन्द होकर, कुम्हार जिस प्रकार बर्तन बनाने में लगा रहता है, ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि का निर्माण करने में दिन-रात बिना विश्राम किए लगा हुआ है।

इसी प्रकार यह कर्म का ही प्रभाव है कि उसने सामर्थ्यशाली संसार का पालन करने वाले भगवान् विष्णु को भी एक दो नहीं, अपितु पूरे दस-दस अवतार लेने के लिए बाध्य कर दिया तथा उनमें उन्हें अनेकों कष्टों का भी सामना करना पड़ा।

इतना ही नहीं उसी शक्तिशाली एवं प्रभावशाली कर्म ने सम्पूर्ण संसार का विनाश करने वाले, भयंकर प्रलयकारी देवता भगवान् रुद्र को भी मृत मनुष्य की खोपड़ी का भिक्षा पात्र हाथ में लेकर भिक्षावृत्ति के लिए बाध्य कर दिया।

इतना ही नहीं सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाला, तेजस्वी सूर्य भी जिसके आदेश एवं प्रभाव के कारण आकाश में एक दो दिन से नहीं, अपितु अनन्त काल से चक्कर लगाने के लिए बाध्य है। ऐसे प्रभावशाली उस कर्म को प्रणाम हैं अर्थात् अन्त में कवि कर्म की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार कर नमन करता है।

विशेष- १. ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली देवता भी कर्म के द्वारा नियन्त्रित हैं। अतः कर्म की सर्वोच्चसत्ता स्वतः सिद्ध है।


१. कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं सेवते।

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