नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- सामर्थ्यशाली विधाता के द्वारा संसार में स्वयं जिसका जो निश्चित कर दिया, वह (स्वयं ही) उसके पास आ जायेगा। महान् आश्रय (इसमें) थोड़ा भी कारण नहीं (होता है)। सभी दिशाओं में भरपूर बरसने वाले मेघ के प्रतिदिन बरसने पर भी चातक के मुँह में मुश्किल से दो तीन जल की बूँदे (ही) गिरती हैं।
व्याख्या- पूर्णतया समर्थ भाग्य के द्वारा ही संसार के प्रत्येक प्राणी के हिस्से का स्वयं निर्धारण कर दिया जाता है। भाग्य की प्रबलता के कारण यह हिस्सा उसके पास स्वतः ही आ जाता है अर्थात् उसके लिए उसे चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है और इस विषय में ऐसा भी नहीं है कि प्रभावशाली व्यक्ति को यह अधिक प्राप्त हो जाएगा।
इस विषय में चातक और मेघ का उदाहरण द्रष्टव्य है। मेघ अपना जल सभी दिशाओं में पूरी सामर्थ्य के साथ रोजाना बरसाता है, किन्तु फिर भी चातक के मुँह में बड़ी मुश्किल से दो तीन बूँदें ही गिर पाती हैं। इसका प्रमुख कारण भाग्य ही है, जिसके कारण उसके हिस्से में बादल के रोजाना मूसलाधार बरसने पर भी दो तीन बूँदें ही निर्धारित होने के कारण, उससे अधिक प्राप्त नहीं हो पाती हैं।
विशेष- १. भाग्य की प्रबलता एवं सामर्थ्य का अत्यन्त सुन्दरतापूर्वक निदर्शन सहित प्रतिपादन किया गया है। २. इसी प्रकार के भावों की अभिव्यक्ति 'यद् धात्रा निजभालपट्ट्¹......इत्यादि श्लोक में भी की गई है। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरबः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. सर्वाशा का अर्थ विद्वानों ने 'सभी लोगों की आशाओं को पूरा करने वाले', भी किया है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्रमाण + च्वि + √कृ + क्त = प्रमाणीकृतम्
२. उप + √नम् + तिप् (विधिलिंग लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपनमेत्
३. परि + √पूर् + ण्वुल् = परिपूरके (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
४. जल + √धृ + अच् = जलधरः, तस्मिन् जलधरे (सप्तमी विभक्ति, एकवचन)
५. अहनि अहनि इति प्रत्यहम् (अव्ययीभाव)
६. √पत् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) पतन्ति
७. पयसां बिन्दुः पयोबिन्दुः (षष्ठी तत्पुरुष) ते पयोबिन्दवः
८. √वृष् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वर्षति
९. वर्षति + अपि = वर्षत्यपि (इकोयणचि) (इ— य्)
१. द्रष्टव्य श्लोक संख्या- ४९