नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १११
२. यहाँ मलयाचल सज्जन व्यक्ति का प्रतीक है जो अपने गुण दूसरों में संक्रमित कर देता है।
३. उपमान स्वर्ण एवं रजत पर्वत की अपेक्षा उपमेय मलय पर्वत की प्रशंसा करने तथा उसे श्रेष्ठ बताने के कारण व्यतिरेक अलंकार— लक्षण—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
५. किम् अव्यय यहाँ ‘क्या लाभ’ इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. हेम्नः गिरिः, हेमगिरिः तेन, हेमगिरिणा (षष्ठी तत्पुरुष)
२. रजतस्य अद्रिः रजताद्रिः, तेन रजताद्रिणा (षष्ठी तत्पुरुष)
३. कङ्कोलाश्च निम्बाश्च कुटजाश्च (द्वन्द्व समास) कङ्कोलनिम्बकुटजाः
४. यत्र + आश्रिताः (अ + आ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः)
५. यत् + आश्रयेण (त्— द्, झलां जशोऽन्ते)
६. तरवः + तरवः + ते + एव (विसर्जनीयस्य सः :— स्)
७. √मन् + महिङ् (आत्मने पद, लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) मन्यामहे
धैर्य-पद्धतिः
रत्नैर्महार्हैः¹ स्तुतुषुर्न देवाः,
न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्।
सुधां विना न प्रययुर्विरामं,
न निश्चिताथार्द्विरमन्ति धीराः॥८५॥
अन्वय— देवाः महार्हैः रत्नैः न तुतुषुः, भीमविषेण भीतिम् भेजिरे न, सुधाम् विना विरामम् न प्रययुः, धीराः निश्चितार्थात् न विरमन्ति।
अनुवाद— देवता अत्यधिक मूल्यवान् रत्नों से (भी) संतुष्ट नहीं हुए, भयानक विष से (भी) भय को प्राप्त नहीं हुए, अमृत के बिना विराम को प्राप्त नहीं हुए, धैर्यशाली निश्चित विषय से रुकते नहीं हैं।
व्याख्या— देवताओं ने समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय किया, आरम्भ में उन्हें समुद्र से बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति हुई, किन्तु उन्हें प्राप्त करके संतुष्ट नहीं हुए और अमृत प्राप्ति की लिए प्रयासरत रहे।
१. महार्घैः