भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 194 में से

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११० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

३. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
४. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पुण्यं एव पीयूषं पुण्यपीयूषम्, तेन पूर्णाः पुण्यपीयूषपूर्णा
२. उपकाराणां श्रेणिभिः = उपकारश्रेणिभिः (षष्ठी तत्पुरुष)
३. त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनम् (द्विगु समास)
४. √प्रीञ् + णिच् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रीणयन्तः
५. पर्वत + च्वि +√ कृ + ल्यप् = पर्वतीकृत्य (अपर्वतान् पर्वतान् कृत्य)
६. निजस्य हृदि (षष्ठी तत्पुरुष) निजहृदि
७. वि + √कस् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विकसन्तः
८. √पृ + क्त (पूर्णः)

किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा,
यत्राश्रिता हि तरवस्तरवस्त एव।
मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण,
कङ्कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः॥८४॥

अन्वय- तेन हेम-गिरिणा रजताद्रिणा वा किम्, यत्र आश्रिताः हि ते तरवः, तरवः एव। (वयम् तु) मलयम् एव मन्यामहे, यत् आश्रयेण कङ्कोल-निम्ब-कुटजाः अपि चन्दनाः (स्युः)।

अनुवाद- उस स्वर्ण पर्वत अथवा चाँदी के पर्वत से क्या (लाभ) जिस पर आश्रित वे वृक्ष, वृक्ष ही (हैं)। (हम तो) मलय (पर्वत) को ही (श्रेष्ठ) मानते हैं, जिसके आश्रय से कङ्कोल, नीम और कुटज (के वृक्ष) भी चन्दन (हो जाते हैं)।

व्याख्या- स्वर्ण पर्वत एवं चाँदी के पर्वत की अपेक्षा मलयपर्वत को कवि श्रेष्ठ बताता हुआ कहता है कि सोने के पर्वत पर तथा चाँदी के पर्वत पर जो वृक्ष उगते हैं। उनमें न तो सोने की पत्तियाँ आती न चाँदी के फल अर्थात् वृक्षों में उनकी संगति का कोई असर दिखाई नहीं देता, वे ज्यों के त्यों बने रहते हैं।

इसके विपरीत मलयाचल पर जो भी वृक्ष चाहे वे कङ्कोल के हों या नीम के अथवा फिर कुटज जैसे तुच्छ ही क्यों न हो, ये सभी चन्दन के सान्निध्य में रहने से चंदन के समान ही सुगन्धि वाले हो जाते हैं। अतः वस्तुतः मलयाचल ही प्रशंसनीय है। स्वर्ण अथवा रजत पर्वत नहीं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में स्वर्ण पर्वत एवं रजत पर्वत की अपेक्षा मलयाचल को अधिक श्रेष्ठ बताया है।