नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १०९
५. √पाल् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पालय
६. दुःख + इतच् (पुंल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) दुःखिते
७. √हन् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
८. √मान् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) मानय
९. प्र + √श्रि + अच् = प्रश्रयः, तम् प्रश्रयम्
१०. प्र + √ख्या + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रख्यापय
११. ब्रूहि + अनुयाहि (यण् – इ– य् – इकोयणचि)
१२. विद्विषः + अपि + अनुनय (अतो रोरप्लुतादप्लुते :— उ— ओ (इकोयणचि इ— य्)
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा-
स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,
निज हृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥८३॥
अन्वय- मनसि वचसि काये पुण्य-पीयूष-पूर्णाः, उपकार-श्रेणिभिः त्रिभुवनम् प्रीणयन्तः, पर-गुण-परमाणून् पर्वतीकृत्य निज हृदि नित्यम् विकसन्तः, सन्तः कियन्तः सन्ति।
अनुवाद- मन, वाणी और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से परिपूर्ण, उपकार परम्परा से तीनों लोकों को प्रसन्न करते हुए, दूसरों के परमाणु के समान (छोटे) गुणों को पर्वत के समान बनाकर, अपने में ही सदैव आनन्दित होते हुए सज्जन लोग (इस संसार में) कितने हैं।
व्याख्या- जो लोग सदैव मन, वाणी और कर्म के द्वारा पुण्यशाली कार्य ही करते हैं अर्थात् मनसा, वाचा, कर्मणा जिनकी भूल से भी पापपूर्ण कार्यों में गति नहीं रहती, सदैव ही परोपकारपूर्ण कार्यों के द्वारा तीनों लोकों को प्रसन्न करते रहते हैं अर्थात् जिनकी परोपकारपूर्ण कार्यों में ही रुचि रहती है, स्वार्थपूर्ण कार्यों में नहीं। यदि कोई अन्य व्यक्ति अत्यन्त छोटा-सा भी उपकार उनके ऊपर कर देता है अथवा उसमें यदि छोटे से छोटा भी कोई गुण होता है तो उसे सदा ही अत्यन्त बढ़ा चढ़ा कर सम्मानपूर्वक दूसरों के सामने उसका कथन करते हैं तथा आत्मानन्द में सदैव लीन रहते हैं अथवा आत्मालोचन में ही सदा संलग्न रहते हैं, परनिन्दा आदि नहीं करते। इस प्रकार के सज्जन लोग इस संसार में कितने से है अर्थात् इस प्रकार की विशेषता वाले सज्जन यहाँ केवल अंगुलिगण्य ही हैं। उनकी संख्या अधिक नहीं है।
विशेष-
१. सज्जनों की संख्या इस संसार में अत्यल्प ही होती है।
२. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त संक्षेप में मनोहर शैली में कथन किया गया है!