नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
तृष्णां छिन्धि¹ भज क्षमां जहि मदं पापे रतिं मा कृथाः,
सत्यं ब्रूह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम्।
मान्यान् मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रच्छादय² स्वान्गुणान्,
कीर्तिं पालय दुःखिते कुरु दयामेतत् सतां लक्षणम्॥८२॥
अन्वय- तृष्णाम् छिन्धि, क्षमाम् भज, मदम् जहि, पापे रतिम् मा कृथाः, सत्यम् ब्रूहि, साधु-पदवीम् अनुयाहि, विद्वज्जनम्, सेवस्व, मान्यान् मानय, विद्विषः अपि अनुनय, स्वान् गुणान् प्रच्छादय, कीर्तिम् पालय, दुःखिते दयाम् कुरु, सताम् एतत् लक्षणम्।
अनुवाद- लोभ का नाश करो, क्षमा का पालन करो, अहंकार का त्याग करो, पाप में प्रेम मत करो, सत्य बोलो, सज्जनों के मार्ग का अनुसरण करो, विद्वज्जनों की सेवा करो, सम्माननीय (लोगों) का सम्मान करो, शत्रुओं को भी प्रसन्न करो, अपने गुणों को छिपाओ, यश का पालन करो, दुःखी पर दया करो, सज्जनों के यह लक्षण हैं।
व्याख्या- सज्जन बनने के लिए हमें किस प्रकार का आचरण करना चाहिए, इसी बात का प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में किया गया है— हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए, सदैव क्षमा का पालन करना चाहिए, कभी भी किसी भी बात का अहंकार नहीं करना चाहिए, पापपूर्ण कार्यों मे कभी भी अनुराग नहीं करना चाहिए, सदैव सत्यभाषण करना चाहिए, सज्जनों द्वारा बताए गए मार्ग पर ही सदैव चलना चाहिए, विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जो सम्मान एवं आदर के पात्र हैं, ऐसे लोगों का सदैव सम्मान करना चाहिए, अपने शत्रुओं को भी सदैव प्रसन्न करने के प्रयास करने चाहिएँ, स्वयं के गुणों का प्रख्यापन नहीं करना चाहिए अर्थात् आत्मप्रशंसा नहीं करनी चाहिए। ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे हम यश के भागी बने, दुःखियों पर सदैव दया करनी चाहिए, इस प्रकार का आचरण करने से ही व्यक्ति सज्जन कहलाता है।
विशेष-
१. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
२. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √हा + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
२. √मन् + ण्यत् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) मान्यान्
३. वि + √द्विष् + क्विप् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) विद्विषः
४. प्र + √छद् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रच्छादय
१. छिन्दि
२. प्राख्यापय (प्रकट करो)