नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १०७
भ्रमण कर पाते हैं अर्थात् एक मात्र ध्रुव के आधार पर ही तेजस्वी ग्रहों का समूह जीवित है, अस्तित्व बनाए हुए है।
इसके विपरीत परोपकार पूर्ण कार्यों में जिनकी लेशमात्र भी रुचि (पक्ष) नहीं है, ऐसे दूसरे अनेक प्राणी न तो उच्च पदों पर स्थित होकर ही कुछ कर पाते हैं और न ही किसी नीचे पद पर आसीन होकर ही कुछ करते हैं।
इस प्रकार के प्राणी वस्तुतः गूलर नामक फल के अन्दर स्थित उन मच्छरों के समान होते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में पैदा होकर निरर्थक ही आते हैं और चले जाते हैं। वास्तव में उनका जीवन निरर्थक होता है।
विशेष- १. परोपकार पूर्ण कार्यों से ही जीवन की सार्थकता है, इसका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन उदाहरण सहित किया गया है।
२. ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में अभेद की स्थापना की गई है, अतः रूपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।
३. अन्तरिक्षमण्डल में स्थित ध्रुव को सम्पूर्ण तारामण्डल का केन्द्र माना गया है, उसी के चारों ओर सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं।
४. पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण भुवनों के भार को कच्छपावतार अपनी पीठ पर धारण किए हुए हैं।
५. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण, त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।
६. उदुम्बर गूलर को कहते हैं, पकने पर उसमें बहुत से छोटे-छोटे मच्छर हो जाते हैं। स्वाद मीठा होता है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √जन् + क्त = जातः
२. √श्लाघ् + ण्यत् = श्लाघ्यम्
३. सम् + √जन् + क्त = संजातः
४. परेषां हितं परहितं तेषां, करणे, परहितकरणे
५. पृथुभुवनं तस्य भरः तस्मै= पृथुभुवनभराय
६. ब्रह्मणः अण्डं ब्रह्माण्डम्, ब्रह्माण्डम् एव उदरं तस्य, अन्तः तत्र मशकाः ब्रह्माण्डोडुम्बराान्तमशकाः तद्वत्।
७. √भ्रम् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = भ्रमति
८. न + उपरिष्टात् + न (गुण - आद् गुणः, व्यञ्जन)
९. नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)