भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 194 में से

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१०६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. इदम् + तसिल् = इतः २. शिखर + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) शिखरिणाम् ३. समस्तैः संवर्तकैः (अव्ययीभाव) समस्तसंवर्तकैः ४. वि + √तन् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विततम् ५. ऊर्जा + इतच् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ऊर्जितम् ६. भरं सहते इति, भरसहम् ७. द्विष् + आम् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) द्विषाम् ८. शरण + अर्थ + णिनि = शरणार्थिन् तेषाम्, शरणार्थिनाम् ९. बलं वाति इति, बल + वा + क + टाप् = वडवा (डलयोरैक्यात् लस्य डत्वम्) वडवायाः अनलः = वडवानलः।

जातः कूर्म स एकः पृथुभुवनभरायार्पितं येन पृष्ठं, श्लाघ्यं जन्म ध्रुवस्य भ्रमति नियमितं यत्र तेजस्विचक्रम्। संजातव्यर्थपक्षाः परहितकरणे नोपरिष्टान्न चाधो, ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवदपरे जन्तवो जातनष्टाः॥८१॥

अन्वय- सः एकः कूर्मः जातः, येन पृथुभुवनभराय पृष्ठम् अर्पितम्, ध्रुवस्य जन्म (अपि) श्लाघ्यम्, यत्र तेजस्विचक्रम् नियमितम् (भूत्वा) भ्रमति। परहितकरणे संजातव्यर्थपक्षाः अपरेजन्तवः न उपरिष्टात् न च अधः (किमपि कुर्वन्ति), (अपितु) ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवत् जातनष्टाः (भवन्ति)।

अनुवाद- वह अकेला कछुआ पैदा हुआ, जिसने विशाल भुवनों के भार के लिए (अपनी) पीठ को अर्पित कर दिया। ध्रुव का जन्म (भी) प्रशंसनीय है, जहाँ तेजस्वी चक्र नियमित रूप से भ्रमण करता है। परोपकार में जिनके पक्ष व्यर्थ ही उत्पन्न हुए हैं (ऐसे) अन्य प्राणी न ऊपर और न ही नीचे (कुछ करते हैं, अपितु) ब्रह्माण्ड रूपी गूलर के भीतर मच्छरों के समान उत्पन्न होकर नष्ट (होते रहते हैं)।

व्याख्या- परोपकार करने से ही मनुष्य के जीवन की सार्थकता है, इस बात को एक पाताल में स्थित कच्छपराज का और दूसरा अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का उदाहरण देकर समझाते हुए कवि कहता है कि—

उस कछुवे का जन्म सार्थक है भले ही वह पाताल में स्थित क्यों न हो, क्योंकि उसने सम्पूर्ण भुवनों के गुरुतर भार को वहन करने के लिए स्वेच्छा से अपनी पीठ को समर्पित कर दिया। साथ ही अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का जन्म भी प्रशंसनीय है, क्योंकि सम्पूर्ण अन्तरिक्षमण्डल में स्थित तेजस्वी ग्रह उसी को केन्द्र बनाकर नियमित रूप से