नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १०५
अनुवाद- इधर विष्णु सो रहे हैं, इधर उनके शत्रुओं का समूह (सो रहा है) और इधर शरणार्थी पर्वतों के समूह सो रहे हैं, और इधर सभी (प्रलयकालीन बादल) संवर्तकादि के साथ वडवानल (सो रहा है), आश्चर्य है, समुद्र का शरीर (कितना) विस्तृत, शक्तिशाली और भार को सहन करने वाला है।
व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं होती, इस बात का कथन समुद्र का उदाहरण देकर बताया गया है कि इसमें एक कोने में समस्त संसार के पालक भगवान् विष्णु शयन कर रहे हैं और इसी में दूसरी ओर देवों के शत्रु राक्षस, वह भी एक दो नहीं, अपितु पूरा समूह ही शयन कर रहा है, इतना ही नहीं, इसी में एक ओर इन्द्र के वज्र से बचने के लिए भाग कर शरण में आए हुए मैनाक आदि पर्वतों का समूह शयन कर रहा है।
इतना ही नहीं इसी विशाल सामर्थ्य वाले समुद्र में प्रलयकाल में भयंकर विनाश करने वाले, शक्तिशाली, संवर्तक आदि बादलों के साथ समुद्र की आग वडवानल भी विराजमान है।
इस सबको देखकर अत्यन्त आश्चर्य होता हैं कि इस समुद्र की शक्ति, सामर्थ्य और विशालता अत्यन्त अद्भुत एवं वाङ्मनस् अगोचर है।
विशेष-
१. महापुरुषों की सामर्थ्य को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है, वे निस्सीम होती हैं।
२. यहाँ समुद्र महापुरुष का प्रतीक है, अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
३. प्रस्तुत श्लोक में राक्षसादि सभी के शयन की बात कही गयी है, इससे भी समुद्र की विशालता का अतिरेक अभिव्यञ्जित हो रहा है, क्योंकि ये सभी समुद्र में कष्ट से एक दूसरे के ऊपर पड़े हुए नहीं है, अपितु आराम से शयन कर रहे हैं।
४. समुद्र की शरणागतवत्सलता की भी अभिव्यक्ति हो रही है।
५. अग्नि तीन प्रकार की होती है— वन की आग–दावानल, पेट की आग–जठरानल और समुद्र की आग–वडवानल। इस वडवानल के ही कारण समुद्र में बादल बनते हैं।
६. अग्नि से उत्पन्न बादलों का समूह संवर्तक नाम से जाना जाता है, यह प्रलयकाल में अत्यन्त विध्वंस करता है।
७. पुराणों में कथा आती है कि जब इन्द्र पर्वतों के पंख काट रहा था तो कुछ मैनाकादि पर्वत स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गए थे।
८. पृथ्वी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः।
९. ‘सहयुक्तेऽप्रधाने’ सूत्र से ‘संवर्तकैः’ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
१०. अहो यहाँ आश्चर्यातिरेक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।