नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
नीतिशतकम् १०५
अनुवाद- इधर विष्णु सो रहे हैं, इधर उनके शत्रुओं का समूह (सो रहा है) और इधर शरणार्थी पर्वतों के समूह सो रहे हैं, और इधर सभी (प्रलयकालीन बादल) संवर्तकादि के साथ वडवानल (सो रहा है), आश्चर्य है, समुद्र का शरीर (कितना) विस्तृत, शक्तिशाली और भार को सहन करने वाला है।
व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं होती, इस बात का कथन समुद्र का उदाहरण देकर बताया गया है कि इसमें एक कोने में समस्त संसार के पालक भगवान् विष्णु शयन कर रहे हैं और इसी में दूसरी ओर देवों के शत्रु राक्षस, वह भी एक दो नहीं, अपितु पूरा समूह ही शयन कर रहा है, इतना ही नहीं, इसी में एक ओर इन्द्र के वज्र से बचने के लिए भाग कर शरण में आए हुए मैनाक आदि पर्वतों का समूह शयन कर रहा है।
इतना ही नहीं इसी विशाल सामर्थ्य वाले समुद्र में प्रलयकाल में भयंकर विनाश करने वाले, शक्तिशाली, संवर्तक आदि बादलों के साथ समुद्र की आग वडवानल भी विराजमान है।
इस सबको देखकर अत्यन्त आश्चर्य होता हैं कि इस समुद्र की शक्ति, सामर्थ्य और विशालता अत्यन्त अद्भुत एवं वाङ्मनस् अगोचर है।
विशेष-
१. महापुरुषों की सामर्थ्य को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है, वे निस्सीम होती हैं।
२. यहाँ समुद्र महापुरुष का प्रतीक है, अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
३. प्रस्तुत श्लोक में राक्षसादि सभी के शयन की बात कही गयी है, इससे भी समुद्र की विशालता का अतिरेक अभिव्यञ्जित हो रहा है, क्योंकि ये सभी समुद्र में कष्ट से एक दूसरे के ऊपर पड़े हुए नहीं है, अपितु आराम से शयन कर रहे हैं।
४. समुद्र की शरणागतवत्सलता की भी अभिव्यक्ति हो रही है।
५. अग्नि तीन प्रकार की होती है— वन की आग–दावानल, पेट की आग–जठरानल और समुद्र की आग–वडवानल। इस वडवानल के ही कारण समुद्र में बादल बनते हैं।
६. अग्नि से उत्पन्न बादलों का समूह संवर्तक नाम से जाना जाता है, यह प्रलयकाल में अत्यन्त विध्वंस करता है।
७. पुराणों में कथा आती है कि जब इन्द्र पर्वतों के पंख काट रहा था तो कुछ मैनाकादि पर्वत स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गए थे।
८. पृथ्वी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः।
९. ‘सहयुक्तेऽप्रधाने’ सूत्र से ‘संवर्तकैः’ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
१०. अहो यहाँ आश्चर्यातिरेक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।
१०६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. इदम् + तसिल् = इतः २. शिखर + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) शिखरिणाम् ३. समस्तैः संवर्तकैः (अव्ययीभाव) समस्तसंवर्तकैः ४. वि + √तन् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विततम् ५. ऊर्जा + इतच् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ऊर्जितम् ६. भरं सहते इति, भरसहम् ७. द्विष् + आम् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) द्विषाम् ८. शरण + अर्थ + णिनि = शरणार्थिन् तेषाम्, शरणार्थिनाम् ९. बलं वाति इति, बल + वा + क + टाप् = वडवा (डलयोरैक्यात् लस्य डत्वम्) वडवायाः अनलः = वडवानलः।
जातः कूर्म स एकः पृथुभुवनभरायार्पितं येन पृष्ठं, श्लाघ्यं जन्म ध्रुवस्य भ्रमति नियमितं यत्र तेजस्विचक्रम्। संजातव्यर्थपक्षाः परहितकरणे नोपरिष्टान्न चाधो, ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवदपरे जन्तवो जातनष्टाः॥८१॥
अन्वय- सः एकः कूर्मः जातः, येन पृथुभुवनभराय पृष्ठम् अर्पितम्, ध्रुवस्य जन्म (अपि) श्लाघ्यम्, यत्र तेजस्विचक्रम् नियमितम् (भूत्वा) भ्रमति। परहितकरणे संजातव्यर्थपक्षाः अपरेजन्तवः न उपरिष्टात् न च अधः (किमपि कुर्वन्ति), (अपितु) ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवत् जातनष्टाः (भवन्ति)।
अनुवाद- वह अकेला कछुआ पैदा हुआ, जिसने विशाल भुवनों के भार के लिए (अपनी) पीठ को अर्पित कर दिया। ध्रुव का जन्म (भी) प्रशंसनीय है, जहाँ तेजस्वी चक्र नियमित रूप से भ्रमण करता है। परोपकार में जिनके पक्ष व्यर्थ ही उत्पन्न हुए हैं (ऐसे) अन्य प्राणी न ऊपर और न ही नीचे (कुछ करते हैं, अपितु) ब्रह्माण्ड रूपी गूलर के भीतर मच्छरों के समान उत्पन्न होकर नष्ट (होते रहते हैं)।
व्याख्या- परोपकार करने से ही मनुष्य के जीवन की सार्थकता है, इस बात को एक पाताल में स्थित कच्छपराज का और दूसरा अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का उदाहरण देकर समझाते हुए कवि कहता है कि—
उस कछुवे का जन्म सार्थक है भले ही वह पाताल में स्थित क्यों न हो, क्योंकि उसने सम्पूर्ण भुवनों के गुरुतर भार को वहन करने के लिए स्वेच्छा से अपनी पीठ को समर्पित कर दिया। साथ ही अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का जन्म भी प्रशंसनीय है, क्योंकि सम्पूर्ण अन्तरिक्षमण्डल में स्थित तेजस्वी ग्रह उसी को केन्द्र बनाकर नियमित रूप से
नीतिशतकम् १०७
भ्रमण कर पाते हैं अर्थात् एक मात्र ध्रुव के आधार पर ही तेजस्वी ग्रहों का समूह जीवित है, अस्तित्व बनाए हुए है।
इसके विपरीत परोपकार पूर्ण कार्यों में जिनकी लेशमात्र भी रुचि (पक्ष) नहीं है, ऐसे दूसरे अनेक प्राणी न तो उच्च पदों पर स्थित होकर ही कुछ कर पाते हैं और न ही किसी नीचे पद पर आसीन होकर ही कुछ करते हैं।
इस प्रकार के प्राणी वस्तुतः गूलर नामक फल के अन्दर स्थित उन मच्छरों के समान होते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में पैदा होकर निरर्थक ही आते हैं और चले जाते हैं। वास्तव में उनका जीवन निरर्थक होता है।
विशेष- १. परोपकार पूर्ण कार्यों से ही जीवन की सार्थकता है, इसका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन उदाहरण सहित किया गया है।
२. ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में अभेद की स्थापना की गई है, अतः रूपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।
३. अन्तरिक्षमण्डल में स्थित ध्रुव को सम्पूर्ण तारामण्डल का केन्द्र माना गया है, उसी के चारों ओर सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं।
४. पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण भुवनों के भार को कच्छपावतार अपनी पीठ पर धारण किए हुए हैं।
५. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण, त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।
६. उदुम्बर गूलर को कहते हैं, पकने पर उसमें बहुत से छोटे-छोटे मच्छर हो जाते हैं। स्वाद मीठा होता है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √जन् + क्त = जातः
२. √श्लाघ् + ण्यत् = श्लाघ्यम्
३. सम् + √जन् + क्त = संजातः
४. परेषां हितं परहितं तेषां, करणे, परहितकरणे
५. पृथुभुवनं तस्य भरः तस्मै= पृथुभुवनभराय
६. ब्रह्मणः अण्डं ब्रह्माण्डम्, ब्रह्माण्डम् एव उदरं तस्य, अन्तः तत्र मशकाः ब्रह्माण्डोडुम्बराान्तमशकाः तद्वत्।
७. √भ्रम् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = भ्रमति
८. न + उपरिष्टात् + न (गुण - आद् गुणः, व्यञ्जन)
९. नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
तृष्णां छिन्धि¹ भज क्षमां जहि मदं पापे रतिं मा कृथाः,
सत्यं ब्रूह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम्।
मान्यान् मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रच्छादय² स्वान्गुणान्,
कीर्तिं पालय दुःखिते कुरु दयामेतत् सतां लक्षणम्॥८२॥
अन्वय- तृष्णाम् छिन्धि, क्षमाम् भज, मदम् जहि, पापे रतिम् मा कृथाः, सत्यम् ब्रूहि, साधु-पदवीम् अनुयाहि, विद्वज्जनम्, सेवस्व, मान्यान् मानय, विद्विषः अपि अनुनय, स्वान् गुणान् प्रच्छादय, कीर्तिम् पालय, दुःखिते दयाम् कुरु, सताम् एतत् लक्षणम्।
अनुवाद- लोभ का नाश करो, क्षमा का पालन करो, अहंकार का त्याग करो, पाप में प्रेम मत करो, सत्य बोलो, सज्जनों के मार्ग का अनुसरण करो, विद्वज्जनों की सेवा करो, सम्माननीय (लोगों) का सम्मान करो, शत्रुओं को भी प्रसन्न करो, अपने गुणों को छिपाओ, यश का पालन करो, दुःखी पर दया करो, सज्जनों के यह लक्षण हैं।
व्याख्या- सज्जन बनने के लिए हमें किस प्रकार का आचरण करना चाहिए, इसी बात का प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में किया गया है— हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए, सदैव क्षमा का पालन करना चाहिए, कभी भी किसी भी बात का अहंकार नहीं करना चाहिए, पापपूर्ण कार्यों मे कभी भी अनुराग नहीं करना चाहिए, सदैव सत्यभाषण करना चाहिए, सज्जनों द्वारा बताए गए मार्ग पर ही सदैव चलना चाहिए, विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जो सम्मान एवं आदर के पात्र हैं, ऐसे लोगों का सदैव सम्मान करना चाहिए, अपने शत्रुओं को भी सदैव प्रसन्न करने के प्रयास करने चाहिएँ, स्वयं के गुणों का प्रख्यापन नहीं करना चाहिए अर्थात् आत्मप्रशंसा नहीं करनी चाहिए। ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे हम यश के भागी बने, दुःखियों पर सदैव दया करनी चाहिए, इस प्रकार का आचरण करने से ही व्यक्ति सज्जन कहलाता है।
विशेष-
१. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
२. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √हा + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
२. √मन् + ण्यत् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) मान्यान्
३. वि + √द्विष् + क्विप् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) विद्विषः
४. प्र + √छद् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रच्छादय
१. छिन्दि
२. प्राख्यापय (प्रकट करो)
नीतिशतकम् १०९
५. √पाल् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पालय
६. दुःख + इतच् (पुंल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) दुःखिते
७. √हन् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
८. √मान् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) मानय
९. प्र + √श्रि + अच् = प्रश्रयः, तम् प्रश्रयम्
१०. प्र + √ख्या + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रख्यापय
११. ब्रूहि + अनुयाहि (यण् – इ– य् – इकोयणचि)
१२. विद्विषः + अपि + अनुनय (अतो रोरप्लुतादप्लुते :— उ— ओ (इकोयणचि इ— य्)
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा-
स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,
निज हृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥८३॥
अन्वय- मनसि वचसि काये पुण्य-पीयूष-पूर्णाः, उपकार-श्रेणिभिः त्रिभुवनम् प्रीणयन्तः, पर-गुण-परमाणून् पर्वतीकृत्य निज हृदि नित्यम् विकसन्तः, सन्तः कियन्तः सन्ति।
अनुवाद- मन, वाणी और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से परिपूर्ण, उपकार परम्परा से तीनों लोकों को प्रसन्न करते हुए, दूसरों के परमाणु के समान (छोटे) गुणों को पर्वत के समान बनाकर, अपने में ही सदैव आनन्दित होते हुए सज्जन लोग (इस संसार में) कितने हैं।
व्याख्या- जो लोग सदैव मन, वाणी और कर्म के द्वारा पुण्यशाली कार्य ही करते हैं अर्थात् मनसा, वाचा, कर्मणा जिनकी भूल से भी पापपूर्ण कार्यों में गति नहीं रहती, सदैव ही परोपकारपूर्ण कार्यों के द्वारा तीनों लोकों को प्रसन्न करते रहते हैं अर्थात् जिनकी परोपकारपूर्ण कार्यों में ही रुचि रहती है, स्वार्थपूर्ण कार्यों में नहीं। यदि कोई अन्य व्यक्ति अत्यन्त छोटा-सा भी उपकार उनके ऊपर कर देता है अथवा उसमें यदि छोटे से छोटा भी कोई गुण होता है तो उसे सदा ही अत्यन्त बढ़ा चढ़ा कर सम्मानपूर्वक दूसरों के सामने उसका कथन करते हैं तथा आत्मानन्द में सदैव लीन रहते हैं अथवा आत्मालोचन में ही सदा संलग्न रहते हैं, परनिन्दा आदि नहीं करते। इस प्रकार के सज्जन लोग इस संसार में कितने से है अर्थात् इस प्रकार की विशेषता वाले सज्जन यहाँ केवल अंगुलिगण्य ही हैं। उनकी संख्या अधिक नहीं है।
विशेष-
१. सज्जनों की संख्या इस संसार में अत्यल्प ही होती है।
२. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त संक्षेप में मनोहर शैली में कथन किया गया है!
११० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
३. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
४. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पुण्यं एव पीयूषं पुण्यपीयूषम्, तेन पूर्णाः पुण्यपीयूषपूर्णा
२. उपकाराणां श्रेणिभिः = उपकारश्रेणिभिः (षष्ठी तत्पुरुष)
३. त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनम् (द्विगु समास)
४. √प्रीञ् + णिच् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रीणयन्तः
५. पर्वत + च्वि +√ कृ + ल्यप् = पर्वतीकृत्य (अपर्वतान् पर्वतान् कृत्य)
६. निजस्य हृदि (षष्ठी तत्पुरुष) निजहृदि
७. वि + √कस् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विकसन्तः
८. √पृ + क्त (पूर्णः)
किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा,
यत्राश्रिता हि तरवस्तरवस्त एव।
मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण,
कङ्कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः॥८४॥
अन्वय- तेन हेम-गिरिणा रजताद्रिणा वा किम्, यत्र आश्रिताः हि ते तरवः, तरवः एव। (वयम् तु) मलयम् एव मन्यामहे, यत् आश्रयेण कङ्कोल-निम्ब-कुटजाः अपि चन्दनाः (स्युः)।
अनुवाद- उस स्वर्ण पर्वत अथवा चाँदी के पर्वत से क्या (लाभ) जिस पर आश्रित वे वृक्ष, वृक्ष ही (हैं)। (हम तो) मलय (पर्वत) को ही (श्रेष्ठ) मानते हैं, जिसके आश्रय से कङ्कोल, नीम और कुटज (के वृक्ष) भी चन्दन (हो जाते हैं)।
व्याख्या- स्वर्ण पर्वत एवं चाँदी के पर्वत की अपेक्षा मलयपर्वत को कवि श्रेष्ठ बताता हुआ कहता है कि सोने के पर्वत पर तथा चाँदी के पर्वत पर जो वृक्ष उगते हैं। उनमें न तो सोने की पत्तियाँ आती न चाँदी के फल अर्थात् वृक्षों में उनकी संगति का कोई असर दिखाई नहीं देता, वे ज्यों के त्यों बने रहते हैं।
इसके विपरीत मलयाचल पर जो भी वृक्ष चाहे वे कङ्कोल के हों या नीम के अथवा फिर कुटज जैसे तुच्छ ही क्यों न हो, ये सभी चन्दन के सान्निध्य में रहने से चंदन के समान ही सुगन्धि वाले हो जाते हैं। अतः वस्तुतः मलयाचल ही प्रशंसनीय है। स्वर्ण अथवा रजत पर्वत नहीं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में स्वर्ण पर्वत एवं रजत पर्वत की अपेक्षा मलयाचल को अधिक श्रेष्ठ बताया है।
नीतिशतकम् १११
२. यहाँ मलयाचल सज्जन व्यक्ति का प्रतीक है जो अपने गुण दूसरों में संक्रमित कर देता है।
३. उपमान स्वर्ण एवं रजत पर्वत की अपेक्षा उपमेय मलय पर्वत की प्रशंसा करने तथा उसे श्रेष्ठ बताने के कारण व्यतिरेक अलंकार— लक्षण—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
५. किम् अव्यय यहाँ ‘क्या लाभ’ इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. हेम्नः गिरिः, हेमगिरिः तेन, हेमगिरिणा (षष्ठी तत्पुरुष)
२. रजतस्य अद्रिः रजताद्रिः, तेन रजताद्रिणा (षष्ठी तत्पुरुष)
३. कङ्कोलाश्च निम्बाश्च कुटजाश्च (द्वन्द्व समास) कङ्कोलनिम्बकुटजाः
४. यत्र + आश्रिताः (अ + आ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः)
५. यत् + आश्रयेण (त्— द्, झलां जशोऽन्ते)
६. तरवः + तरवः + ते + एव (विसर्जनीयस्य सः :— स्)
७. √मन् + महिङ् (आत्मने पद, लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) मन्यामहे
धैर्य-पद्धतिः
रत्नैर्महार्हैः¹ स्तुतुषुर्न देवाः,
न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्।
सुधां विना न प्रययुर्विरामं,
न निश्चिताथार्द्विरमन्ति धीराः॥८५॥
अन्वय— देवाः महार्हैः रत्नैः न तुतुषुः, भीमविषेण भीतिम् भेजिरे न, सुधाम् विना विरामम् न प्रययुः, धीराः निश्चितार्थात् न विरमन्ति।
अनुवाद— देवता अत्यधिक मूल्यवान् रत्नों से (भी) संतुष्ट नहीं हुए, भयानक विष से (भी) भय को प्राप्त नहीं हुए, अमृत के बिना विराम को प्राप्त नहीं हुए, धैर्यशाली निश्चित विषय से रुकते नहीं हैं।
व्याख्या— देवताओं ने समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय किया, आरम्भ में उन्हें समुद्र से बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति हुई, किन्तु उन्हें प्राप्त करके संतुष्ट नहीं हुए और अमृत प्राप्ति की लिए प्रयासरत रहे।
१. महार्घैः
११२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
इसी क्रम में भयानक हलाहल विष भी निकला, किन्तु उससे भी वे विचलित नहीं हुए और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे और अन्त में उन्होंने अमृत प्राप्त करके ही विराम लिया।
इसी प्रकार जो धैर्यवान् लोग होते हैं वे एक बार निश्चय किए गए अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना संतुष्ट नहीं होते हैं और अपने प्रयासों को रोकते नहीं हैं।
विशेष– १. धैर्यशाली लोगों के स्वभाव का उल्लेख किया है।
२. पौराणिक कथा है कि देवों और दैत्यों ने मिलकर अमृत-प्राप्ति के लिए मन्दराचल को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बना कर समुद्र मंथन किया था। जिससे उन्हें १४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी।
३. इसी क्रम में भयानक हलाहल भी प्राप्त हुआ, जिसे बाद में भगवान् शिव ने अपने कण्ठ में धारण किया। इसी से वे नीलकण्ठ कहलाए।
४. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
५. 'विना' के योग में 'सुधाम्' में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
६. उपसर्ग का प्रयोग होने से आत्मनेपदी 'रम्' धातु परस्मैपद के रूप में प्रयुक्त हुई है।
७. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।
८. लिट् लकार का प्रयोग ऐतिहासिक तथ्य का कथन करने के लिए किया जाता है। इसीलिए तुतुषुः, भेजिरे, प्रययुः में लिट् लकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. महान्ति अर्हाणि महार्हाणि तैः, महार्हैः (कर्मधारय)
२. √तुष् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) तुतुषुः
३. √भी + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भीतिम्
४. √भज् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) भेजिरे
५. वि + √रम् + घञ् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विरामम्
६. प्र + √या + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रययुः
७. निश्चितात् अर्थात् निश्चितार्थात् (अव्ययीभाव)
८. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति
९. भीमं विषम् भीमविषम्, तेन (कर्मधारय) भीमविषेण
१०. रत्नैः + महा + अर्हैः + तुतुषुः + न + देवाः + न (ससजुषो रुः, अकः सवर्णे दीर्घः, ससजुषो रुः)
११. √दिव् + अच् = देवः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) देवाः
नीतिशतकम् ११३
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः,
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः,
प्रारभ्य चोत्तमजना¹ न परित्यजन्ति॥८६॥
अन्वय- नीचैः विघ्नभयेन खलु (कार्यम्) न प्रारभ्यते। मध्याः (कार्यम्) प्रारभ्य विघ्नविहताः विरमन्ति, उत्तमजनाः च (कार्यम्) प्रारभ्य, विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः अपि न परित्यजन्ति।
अनुवाद- निम्न (श्रेणी के व्यक्ति) विघ्नों के भय से निश्चय ही (कार्य को) प्रारम्भ नहीं करते हैं। मध्यम (स्वभाव वाले) (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से आहत होने पर रुक जाते हैं और उत्तम लोग (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से बार-बार आहत होते हुए भी नहीं छोड़ते हैं।
व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक के अनुसार इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं, 'उत्तम, मध्यम और अधम। इनमें अधम अर्थात् निम्न श्रेणी के लोग किसी काम को केवल विघ्नों से डरकर शुरु ही नहीं करते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ मध्यम श्रेणी के लोग काम को उत्साहवश प्रारम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्नों के आने पर घबराकर उनका धैर्य जवाब दे देता है और वे कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं।
इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों के विपरीत उत्तम श्रेणी के लोग जब किसी कार्य को हाथ में लेते हैं तो चाहे उनके मार्ग में कितनी ही विघ्नबाधाएँ क्यों न आएँ, वे तनिक भी विचलित नहीं होते और अपने द्वारा प्रारम्भ किए कार्य को समाप्त करके ही छोड़ते हैं।
विशेष-
१. वास्तव में प्रथम दो प्रकार के लोगों की अपेक्षा उत्तम श्रेणी के लोग ही प्रशंसनीय होते हैं।
२. सम्पूर्ण जन समूह को उक्त दृष्टि से तीन श्रेणियों में अत्यन्त सुन्दर ढंग से विभाजित किया गया है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
‘‘उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।’’
४. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्र + आ + √रभ् + ल्यप् = प्रारभ्य
२. विघ्नैः विहताः , विघ्नविहताः (तृतीया तत्पुरुष)
३. वि + √हन् + क = विघ्न। वि + √हन् + क्त = विहतः
१. प्रारब्धं उत्तमजनाः।(आरम्भ को उत्तम लोग)
| ११४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
४. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति
५. प्रति + √हन् + शानच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रतिहन्यमानाः
६. परि + √त्यज् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) परित्यजन्ति
७. च + उत्तमजनाः (गुण, आद् गुणः)
८. प्र + आ + √रभ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रारब्धम्
९. विघ्नानां भयेन विघ्नभयेन (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √भी + अच् = भयम्
११. उत्तमाः जनाः उत्तमजनाः (कर्मधारय समास)
१२. प्र + आ + √रभ् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचनं)
१३. मुहुः + अपि = मुहुरपि (विसर्ग)
कान्ताकटाक्षविशिखाः न लुनन्ति² यस्य,
चित्तं न निर्दहति कोपकृशानुतापः।
कर्षन्ति भूरि विषयाश्च न लोभपाशैः,
लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः॥८७॥
अन्वय- यस्य चित्तम् कान्ता-कटाक्ष-विशिखाः न लुनन्ति, कोपकृशानुतापः न निर्दहति, भूरिविषयाः लोभ-पाशैः च न कर्षन्ति, सः धीरः इदम् कृत्स्नम् लोकत्रयम् जयति।
अनुवाद- जिसके मन को स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बाण छेदते नहीं हैं, क्रोध रूपी अग्नि का संताप जलाता नहीं है और अनेक विषय रूपी लोभ के पाश (अपनी ओर) खींचते नहीं हैं। वह धीर (पुरुष) इन सम्पूर्ण तीनों लोकों को जीत लेता है।
व्याख्या- धीर गम्भीर व्यक्ति ही तीनों लोकों को जीतने में समर्थ होते हैं, किन्तु उसके लिए कवि कहता है कि जिनके मन के ऊपर सुन्दर स्त्रियों की दृष्टि प्रभावशाली नहीं होती अर्थात् जो कामदेव द्वारा प्रभावित नहीं होते, जिन्हें कभी क्रोध रूपी अग्नि संतप्त नहीं करता, जो कभी क्रोध के वशीभूत नहीं होते, तथा जिन्हें इन्द्रियों के विषय-भोग प्रभावित नहीं करते अर्थात् जो जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही मनस्वी और धैर्यशाली लोग तीनों लोकों को जीतने में समर्थ हैं।
विशेष-
१. तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से पूर्णतया मुक्त हो जाए।
२. कटाक्ष रूपी बाण, विषय भोग रूपी पाश, कोप रूपी अग्नि स्थलों पर उपमान और उपमेय में अभेद का आरोप करने से रूपक अलंकार— लक्षण—
२. दहन्ति
नीतिशतकम् ११५
'तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः'।
३. वसन्ततिलका छन्द प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
४. प्रथम चरण में दहन्ति पाठ भी मिलता है, जो अर्थ की दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. √दह् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = दहन्ति
२. √कुप् + घञ् = कोपः। √तप् + घञ् = तापः। √लुभ् + घञ् = लोभः
३. लोकानाम् त्रयम् लोकत्रयम् (षष्ठी तत्पुरुष)
क्वचित् भूमौ शय्या१, क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः१,
क्वचिच्छाकाहारी२ क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो,
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥८८॥
अन्वय— कार्यार्थी मनस्वी क्वचित् भूमौ शय्या, क्वचित् अपि च पर्यङ्कशयनः क्वचित् शाकाहारी, क्वचित्, अपि च शाल्योदन रुचिः, क्वचित् कन्थाधारी, क्वचित् अपि च दिव्याम्बरधरः, न दुःखम्, न च सुखम् गणयति।
अनुवाद— कार्य करने का इच्छुक मनस्वी (व्यक्ति) कहीं भूमि पर शय्या वाला और कहीं पलंग पर भी सोने वाला, कहीं शाक खाने वाला और कहीं (उत्तम) शाली भात को भी (खाने की) रुचि वाला, कहीं गूदड़ी धारण करने वाला और कहीं सुन्दर वस्त्रों को भी धारण करने वाला, न (तो) दुःख को और न सुख को (ही) गिनता है।
व्याख्या— जो स्वाभिमानी, मनस्वी लोग कार्य करने को ही महत्त्व प्रदान करते हैं, उन्हें भले ही कहीं भूमि पर ही सोना पड़े अथवा कहीं संयोगवश सोने के लिए आरामदायक पलंग मिल जाए, कहीं पत्ते खाकर ही अपनी उदरपूर्ति करनी पड़े, या फिर भाग्यवश कहीं शाली नामक उत्तम धान निर्मित स्वादिष्ट भात भी मिल जाए, कहीं जीर्णशीर्ण वस्त्रों को सीं कर बनाई गई गूदड़ी से ही अपने शरीर को ढकना पड़े या फिर दिव्य वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा करने वाले सुन्दर वस्त्र ही कहीं पहनने को क्यों न मिल जाए।
कार्य की सम्पन्नता के क्रम में उनके लिए इन वस्तुओं से प्राप्त होने वाले सुख
१. पृथिवी शय्यः (पृथ्वी पर शय्या)
१. शाकहरः (शाक खाने वाला)
२. पर्यङ्कशयनम् (पलंग पर सोना)
११६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अथवा दुःख का महत्त्व नहीं होता, क्योंकि उनका पूरा ध्यान कार्य की पूर्णता पर रहता है। शरीर के सुख अथवा कष्ट उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखते हैं।
विशेष- १. कार्यसिद्धि मनस्वी लोगों का प्रमुख लक्ष्य होता है। उस क्रम में आने वाले सुख, दुःखों की वे परवाह नहीं करते हैं।
२. व्यक्ति का कर्तव्य है कि चिड़िया की आँख पर स्थित अर्जुन के लक्ष्य के समान, अपने लक्ष्य पर ही अपनी ध्यान पूर्णतया एकाग्र करके कार्य करे, तभी उसे सिद्धि प्राप्त होती है।
३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √शीङ् + क्यप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) शय्या २. पर्यङ्कं शयनं यस्य सः (बहुव्रीहि) पर्यंकशयनः ३. पर्यङ्के शयनम् (सप्तमी तत्पुरुष) पर्यंकशयनम् ४. √शीङ् + ल्युट् = शयनम्। आ + √हृ + घञ् = आहारः ५. शाकस्य आहारः = शाकाहरः। शाल्याः ओदनः शाल्योदनः (षष्ठी तत्पुरुष) ६. शाल्योदने रुचिः यस्य सः (बहुव्रीहि) शाल्योदनरुचिः ७. कन्था + √धृ + णिनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कन्थाधारी ८. कन्थम् धारयति इति = कन्थाधारी ९. दिव्यम् अम्बरम् दिव्याम्बरं, तं धरति इति दिव्याम्बरधरः १०. √धृ + अच् = धरः। कार्य + अर्थ + इनि = कार्यार्थिन् ११. कार्यस्य अर्थी, कार्यार्थी (षष्ठी तत्पुरुष) १२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मनस्वी १३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति १४. शाक + आ + √हृ + णिनि = शाकाहारिन् (प्रथम विभक्ति, एकवचन) शाकाहारी
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥८९॥
नीतिशतकम् ११७
अन्वय- यदि नीतिनिपुणाः निन्दन्तु वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु वा यथेष्टम् गच्छतु, अद्य एव मरणम् अस्तु, वा युगान्तरे (मरणम् अस्तु) धीराः पदम् न्यायात् पथः न प्रविचलन्ति।
अनुवाद- भले ही नीति में निपुण (लोग) निन्दा करें या स्तुति, लक्ष्मी आ जाए या इच्छानुसार चली जाए, आज ही मरण हो या युगों के बाद (मरें), धैर्यशाली (लोगों) के पैर न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं।
व्याख्या- धैर्यवान् लोग किसी भी परिस्थिति में न्यायोचित मार्ग से हटते नहीं हैं, इसी बात का अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादन करते हुए कवि कहता है कि—
नीतिज्ञ लोग भले ही उनके कार्यों की आलोचना करें अथवा प्रशंसा करें, वे संयोगवश धनवान् हो जाए अथवा पूर्णतया दरिद्र ही क्यों न हो जाएँ, अल्पायु में ही उनकी मृत्यु भी क्यों न हो जाए अथवा भले ही बहुत वर्षों तक जीवित क्यों न रहें। धैर्य को धारण करने वाले व्यक्ति न्याय के मार्ग का परित्याग किसी भी परिस्थिति में नहीं करते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि धैर्यवान् लोगों की विशेषता है कि न्याय के मार्ग का एक बार अवलम्बन करने के बाद लोगों की निन्दा अथवा प्रशंसा का, धन की हानि अथवा लाभ का, जीवन अथवा मृत्यु का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, वे बेझिझक निडर होकर अपने द्वारा भली प्रकार विचार कर स्वीकार की गई न्यायोचित कार्य प्रणाली एवं सिद्धान्तों का परित्याग नहीं करते हैं। स्थिर चित्तता ही उनकी विशेषता है।
विशेष- १. धैर्यवान् लोगों की विशेषता का कथन किया गया है। २. उदात्त अलंकार का प्रयोग हुआ है। ३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
४. यदि पद का प्रयोग यहाँ ‘भले ही’ अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. नीतिषु निपुणः = नीतिनिपुणः २. √निन्द् + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) निन्दन्तु ३. √स्तु + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) स्तुवन्तु ४. सम् + आ + √विश् + झि (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) समाविशतु ५. यथा + √इष् + क्त = यथेष्टम् ६. अन्यत् युगं इति युगान्तरम् तस्मिन् युगान्तरे ७. न्याय + यत् (पुल्लिंग, पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) न्यायात् ८. प्र + वि + √चल् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रविचलन्ति
११८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
९. √मृ + ल्युट् = मरणम्
१०. अद्य + एव (वृद्धिरेचि— अ + ए = ऐ)
११. √अस् + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) अस्तु
कदर्थितस्यापि हि धैर्यवृत्ते-
र्न शक्यते धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम्।
अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्ने-
र्नाधःशिखा याति कदाचिदेव॥९०॥
अन्वय- कदर्थितस्य अपि धैर्यवृत्तेः, धैर्यगुणाः प्रमाष्टुम् न हि शक्यते। अधः मुखस्य कृतस्य अपि वह्नेः शिखा कदाचित् एव अधः न याति।
अनुवाद- पीड़ित किए जाते हुए भी धैर्यशाली (व्यक्ति) के धैर्य के गुणों को नष्ट नहीं किया जा सकता है। नीचे की ओर मुख की गई भी अग्नि की ज्वाला भी कभी नीचे की ओर नहीं जाती है।
व्याख्या- धैर्य को धारण करने वाले व्यक्तियों को कितना भी कष्ट क्यों न दिया जाए वे अपने प्रशंसनीय धैर्य के गुणों का परित्याग नहीं करते हैं। इसी कथन को कवि अग्नि के उदाहरण द्वारा समझते हुए कहते हैं कि धैर्यशाली लोग अग्नि के समान होते हैं, अग्नि की ज्वालाओं को भी कितना ही नीचे की ओर गति वाला क्यों न किया जाए वे ऊपर की ओर ही उठती हैं। ठीक इसी प्रकार धैर्यवान् अपने धैर्य का परित्याग नहीं करते, भले ही उन्हें कितना ही पीड़ित क्यों न किया जाए।
विशेष-
१. धैर्यशाली लोगों का स्वभाव अग्नि के समान तेजस्वी और स्वाभिमानी, कभी न झुकने वाला होता है।
२. अग्नि शिखा की विशेषता होती है कि वह सदैव ऊपर की ओर ही जाती है।
३. दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।
४. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कदर्थ + इतच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) कदर्थितस्य
२. धीर + ण्यत् = धैर्य। √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः
३. प्र + √मृज् + तुमुन् = प्रमाष्टुम्
४. अधः मुखं यस्य सः, अधोमुखः, तस्य अधोमुखस्य (बहुव्रीहि)
५. √शक् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शक्यते
वरं शृङ्गोत्सङ्गाद् गुरुशिखरिणः क्वापि विषमे,
पतित्वाय कायः कठिनदृषदन्ते विगलितः।
नीतिशतकम् १११९
वरं न्यस्तो हस्तः फणिपतिमुखे तीक्ष्ण दशने.
वरं वह्नौ पातस्तदपि न कृतः शीलविलयः॥१९१॥
अन्वय- गुरुशिखरिणः शृङ्गोत्सङ्गात् क्व अपि विषमे कठिनदृषदन्ते पतित्वा अयम् कायः विगलितः वरम्।
तीक्ष्णदशने फणपतिमुखे हस्तः न्यस्तः वरम्। वह्नौ पातः (अपि) वरम्। तदपि शीलविलयः कृतः वरम् न।
अनुवाद- विशाल पर्वत की चोटी के अग्रभाग से कहीं भी विषम और कठोर पत्थरों के बीच में गिरकर यह शरीर नष्ट हो जाए (तो) अच्छा है। तीखे दांतों वाले नागराज के मुख में हाथ रख दें (वह भी) अच्छा है। आग में गिर पड़ना (भी) अच्छा है। तो भी श्रेष्ठ स्वभाव का त्याग करना अच्छा नहीं है।
व्याख्या- विकटतम परिस्थितियों में भी मनुष्य को शील का परित्याग नहीं करना चाहिए, इसका प्रतिपादन करते हुए कवि ने सर्वाधिक ऊँचे पर्वत की चोटी से उबड़-खाबड़ तथा कठोर पत्थरों पर गिरकर शरीर का टुकड़े-टुकड़े हो जाना ठीक माना। इसके अतिरिक्त अत्यन्त विषैले महासर्प के मुख में स्थित तीक्ष्ण दाढ़ों में भले ही हाथ भी क्यों न रखना पड़े। वह भी बुरी बात नहीं है। इतना ही नहीं, यदि किन्हीं परिस्थितियों में अपने शरीर को आग में भी क्यों न जलाना पड़े, तो भी मनुष्य को अपने शील का परित्याग नहीं करना चाहिए।
कहने का तात्पर्य है कि शरीर के कष्टों की परवाह न करते हुए, प्राणों की भी उपेक्षा करते हुए व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपने शील की अत्यन्त सचेष्ट होकर रक्षा करे।
विशेष-
१. प्राणों का परित्याग करके भी अपने शील की रक्षा करनी चाहिए।
२. इसी प्रकार के भाव अन्यत्र भी अभिव्यक्त हुए हैं—
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्तस्तु हतो हतः॥
३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में यह श्लोक उपलब्ध नहीं होता।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √गल् + क्त = विगलितः
२. तीक्ष्णानि दशनानि यस्य सः, तीक्ष्णदशनः तस्मिन्, तीक्ष्णदशने
३. नि + √अस् + क्त = न्यस्तः
४. √पत् + घञ् = पातः
५. √पत् + क्त्वा = पतित्वा
| १२० | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
६. फणिनां पतिः, फणिपतिः, तस्य मुखे, फणिपतिमुखे
७. शीलस्य विलयः (षष्ठी तत्पुरुष) शीलविलयः
८. √कृ + क्त = कृतः
९. शृंगस्य उत्संगः, शृंगोत्संगः तस्मात् = शृंगोत्संगात्
वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणान्
मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्य कुरङ्गायते।
व्यालः माल्यगुणायते विषरसः पीयूष वर्षायते,
यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति॥९२॥
अन्वय- यस्य अङ्गे अखिललोकवल्लभतमम् शीलम् समुन्मीलति, तस्य वह्नि जलायते, जलनिधिः तत्क्षणात् कुल्यायते, मेरुः स्वल्पशिलायते, मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते, व्यालः माल्यगुणायते, विषरसः पीयूष वर्षायते।
अनुवाद- जिसके अङ्ग में सम्पूर्ण संसार का सर्वाधिक प्रिय चरित्र प्रकट होता है, उसके (लिए) अग्नि जल बन जाती है, समुद्र उसी क्षण छोटी सी नदी बन जाता है, मेरु (पर्वत) छोटी सी शिला बन जाता है, शेर तुरन्त (ही) हिरण बन जाता है, सर्प पुष्पमाला बन जाता है (और) विष का रस (भी) अमृत वर्षा करने वाला हो जाता है।
व्याख्या- जिस व्यक्ति के शरीर में, इस संसार में सभी लोगों को अच्छा लगने वाला सत् स्वभाव, सदाचार विद्यमान है, उसके लिए अग्नि के समान विनाशकारी एवं पीड़ा पहुँचाने वाले लोग भी जल के समान शीतल स्वभाव वाले हो जाते हैं। समुद्र के समान गम्भीर समस्याएँ भी छिछली नदी के समान सुगम हो जाती हैं, मेरुपर्वत के समान विशालाकार वाली कठिनाइयाँ भी शिला के समान छोटे आकार को धारण कर लेती हैं। शेर जैसा भयावह शक्तिशाली शत्रु भी हिरण के समान सीधा और विनम्र हो जाता है; सर्प के समान अहित करने वाले भयंकर दुष्ट पुष्पमाला के समान उनकी शोभा बनकर अनुकूल आचरण करने वाले हो जाते हैं। गरल जैसे भयानक विष का रस भी अमृत की बूँदों की वर्षा करने वाला हो जाता है।
विशेष-
१. सच्चरित्र की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। अतः व्यक्ति को अपने जीवन में शील का सदैव संरक्षण करना चाहिए।
२. अन्यत्र भी कहा गया है- "वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्" शील की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए।
३. 'जलायते' आदि क्रिया पदों में क्यङ् प्रत्यय का प्रयोग 'इव आचरति' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
४. यहाँ सर्वत्र अन्योक्तिपरक अर्थ करना उचित है जैसे- सर्प यहाँ जहर उगलने वाले दुष्ट लोगों का प्रतीक है, इसी प्रकार शेर शक्ति के कारण अहंकारी लोगों का।
नीतिशतकम् १२१
५. शीलवान् व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी दुःसाध्य नहीं है।
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
७. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. अखिलाः लोकाः, अखिललोकाः (कर्मधारय) तेषां बल्लभतमम् अखिल-लोकबल्लभतमम् (षष्ठी तत्पुरुष) बल्लभ + तमप्
२. कुल्या + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) कुल्यायते
३. जल + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जलायते
४. कुरङ्ग + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) कुरङ्गायते
५. माल्यगुण + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) माल्यगुणायते
६. स्वल्पशिला + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) स्वल्पशिलायते
७. पीयूषवर्षा + क्यङ् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) पीयूषवर्षायते
८. पीयूषस्य वर्षा (षष्ठी तत्पुरुष) पीयूषवर्षा
९. विषस्य रसः (षष्ठी तत्पुरुष) विषरसः
१०. जलानां निधिः (षष्ठी तत्पुरुष) जलनिधिः
११. कुल्यायते-कुल्या इव आचरति, जलमिव आचरति, जलायते, कुरङ्ग इव आचरति = कुरङ्गायते, माल्यगुणमिव आचरति, माल्यगुणायते, पीयूष वर्षा इव आचरति, पीयूष वर्षायते
१२. सम् + उत् + √मील् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) समुन्मीलति
१३. मृगाणां पतिः, मृगपतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
१४. यस्य + अङ्गे (अकः सवर्णे दीर्घः) (अ + अ = आ)
छिन्नोऽपि रोहति तरुः, क्षीणोऽप्युपचीयते पुनश्चन्द्रः।
इति विमृशन्तः सन्तः, सन्तप्यन्ते न ते विपदा¹॥९३॥
अन्वय- तरुः छिन्नः अपि रोहति, चन्द्रः क्षीणः अपि पुनः उपचीयते, इति विमृशन्तः ते सन्तः विपदा न सन्तप्यन्ते।
१. विश्लथेषु लोकेषु (संसार में स्फूर्तिहीन होने पर)
१२२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- वृक्ष, कटा हुआ भी बढ़ जाता है, चन्द्रमा, क्षीण हुआ भी वृद्धि को प्राप्त हो जाता है, ऐसा सोचते हुए वे सज्जन विपत्ति से संतप्त नहीं होते हैं।
व्याख्या- मनुष्य को कभी भी विपत्तियों के आने पर दुःखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति का शाश्वत् नियम है कि कभी भी एक जैसी स्थिति नहीं रहती। आप ही देखिए पेड़ को काटने का बाद भी वह फिर से उग आता है। ठीक इसी प्रकार चाँद भी एक बार धीरे-धीरे क्षीण होता है, किन्तु फिर से बढ़ जाता है, हमेशा एक सा नहीं रहता है। अतः सम्पत्ति और विपत्ति प्रकृति का नियम है।
विशेष- १. सुख और दुःख संसार का नियम है, अतः दुःख से व्यक्ति को घबराना नहीं चाहिए। २. व्यक्ति को धैर्य का आचरण करना चाहिए। ३. अन्यत्र भी कहा गया है- 'चक्रवत् परिवर्तन्ते सुखानि च दुःखानि च' ४. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है- लक्षण इस प्रकार है— यस्याः पादे प्रथमे, द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥ ५. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √सम् + √तप् + झ (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) सन्तप्यन्ते २. √छिद् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) छिन्नः ३. √रुह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) रोहति ४. √क्षै + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षीणः ५. उप + √ची + त (लट् लकार, आत्मने पद, प्रथम पुरुष, एकवचन) उपचीयते ६. वि + √मृश् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विमृशन्तः ७. वि + √पद् + क्विप् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) विपदा
ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक् संयमो,
ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस्य निर्व्याजता,
सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम्॥९४॥
अन्वय- सुजनता ऐश्वर्यस्य, वाक्-संयमः शौर्यस्य, उपशमः ज्ञानस्य, विनयः श्रुतस्य, पात्रे व्ययः वित्तस्य, अक्रोधः तपसः, क्षमा प्रभवितुः, निर्व्याजता धर्मस्य भूषणम् (अस्ति)। (किन्तु) सर्वकारणम् अपि इदम् शीलम् सर्वेषाम् परम् भूषणम् (अस्ति)।
नीतिशतकम् १२३
अनुवाद- सज्जनता ऐश्वर्य का, वाणी पर नियन्त्रण वीरता का, शान्ति ज्ञान का, विनम्रता शास्त्र (ज्ञान) का, सत्पात्र में खर्च धन का, क्रोध न करना तप का, क्षमा प्रभावशाली का, निश्छलता धर्म का आभूषण (हैं), (किन्तु) सभी का कारण यह सत्स्वभाव (शील) सर्वश्रेष्ठ आभूषण (है)।
व्याख्या- व्यक्ति के अन्यान्य गुणों की चर्चा करते हुए कवि श्रेष्ठ स्वभाव की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करते हुए कहता है कि, यदि व्यक्ति ऐश्वर्य सम्पन्न है और साथ ही सज्जन भी है तो यह गुण आभूषण के समान है।
इसी प्रकार यदि व्यक्ति शूरवीर है साथ ही अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखने वाला भी है तो यह गुण उसके लिए आभूषण के समान है। व्यक्ति ज्ञानवान् भी है साथ ही शान्त प्रकृति भी है तो यह उसके लिए अलंकरण ही है।
ठीक इसी प्रकार व्यक्ति अपने धन का खर्च सत्पात्र पर करता है, व्यर्थ ही लुटाता नहीं है तो यह बात उसकी शोभा को बढ़ाने वाली है। तपस्वी होते हुए भी व्यक्ति यदि क्रोधी नहीं है तो यह उसके लिए आभूषण ही है।
प्रभावशाली होते हुए भी यदि व्यक्ति क्षमा धारण करता है तो यह उसकी शोभा में वृद्धि करने वाला है। धार्मिक प्रवृत्ति वाला होते हुए भी व्यक्ति का निष्कपट होना, उसके लिए आभूषण है।
किन्तु इन सभी बातों से अलग और सभी का कारण रूप एवं सर्वोत्कृष्ट गुण, शील अर्थात् श्रेष्ठ स्वभाव व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण है। कहने का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति का श्रेष्ठ स्वभाव है तो समझना चाहिए कि उसके पास सबसे बड़ा आभूषण है।
विशेष- १. शील की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित की है। २. व्यक्ति को अच्छे गुणों के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इसका अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादन किया गया है। ३. स्वर्णादि से निर्मित आभूषणों की निस्सारता का प्रतिपादन किया गया है। ४. मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ आभूषण तो उसके गुण हैं। ५. अन्यत्र कवि ने एकमात्र मधुर वाणी को ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण प्रतिपादित किया है— ‘‘वाग्भूषणं भूषणम्’’। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सुजन + तल् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सुजनता २. ईश्वरस्य भावः ऐश्वर्यः, तस्य ऐश्वर्यस्य ३. ईश + वरच् = ईश्वर + ष्यञ् = ऐश्वर्यः, तस्य ईश्वरस्य ४. वि + √भूष् + ल्युट् = विभूषणम्
१२४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
५. वाचाम् संयमः, वाक् संयमः (षष्ठी तत्पुरुष) सम् + √यम् + अप् = संयमः ६. शूरस्यभावः, शौर्यः, तस्य, शूर + ष्यञ् (नपुं., षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ७. उप + √शम् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उपशमः ८. वि + √नी + अच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विनयः ९. √श्रु + क्त = श्रुतः, तस्य श्रुतस्य १०. प्र + √भू + तृच् = प्रभवितृ - तस्य, प्रभवितुः (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) ११. निर् + व्याज + तल् + टाप् = निर्व्याजता १२. सर्वेषाम् कारणम्, सर्वकारणम् (षष्ठी तत्पुरुष) १३. ज्ञानस्य + उपशमः (गुण् - आद् गुणः) (अ + उ = ओ) १४. विनयः + वित्तस्य (विसर्ग - हशि च) (:— उ— ओ)
रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयतां, अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा, यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥९५॥
अन्वय- रे रे मित्र चातक! सावधान मनसा क्षणम् श्रूयताम्। गगने बहवः अम्भोदाः सन्ति, हि सर्वे अपि एतादृशाः न। केचित् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचित् वृथा गर्जन्ति (इत्यर्थम् त्वम्) यम् यम् पश्यसि, तस्य तस्य पुरतः दीनम् वचः मा ब्रूहि।
अनुवाद- हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षण भर के लिए सुनो। आकाश में बहुत से बादल हैं, किन्तु सभी एक जैसे नहीं (हैं)। कुछ वर्षा के द्वारा पृथिवी को गीला करते हैं, (परन्तु) कुछ व्यर्थ (ही) गरजते हैं। (इसलिए तुम) जिस-जिसको देखते हो, उस-उस के सामने दीन वचन मत कहो।
व्याख्या- चातक को सम्बोधित करके कवि कहता है कि हे चातक, तुम मेरी बात जरा ध्यान लगाकर क्षणभर के लिए सुनो, आकाश में तुम्हें अनेक बादल दिखाई दे रहे हैं, किन्तु वे सभी एक जैसे नहीं हैं। उनमें कुछ तो जल-वर्षा करके पृथिवी की प्यास बुझाते हैं, किन्तु कुछ तो व्यर्थ ही गर्जन करते हैं अर्थात् बरसते नहीं हैं।
इसलिए तुम जिसे भी देखते हो अपनी दीनवाणी को उस-उसके सामने मत कहो। प्रत्येक के सामने अपनी दीनता प्रकट करना उचित नहीं है।
यहाँ चातक, याचक का प्रतीक है तथा बादल धनवानों का। सभी धनवान् दानदाता नहीं होते, उदार हृदय नहीं होते। अतः याचकों को प्रत्येक के सामने स्वयं की दीनता प्रकट नहीं करनी चाहिए। जो धनवान् वस्तुतः दान देने वाले, दयालु हृदय हैं, उन्हीं के सामने याचना करना उचित है।