भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 194 में से

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नीतिशतकम्

से किसी मदमस्त हाथी को बाँधना। शिरीष पुष्प की कोमल पंखुड़ियों के किनारे से वज्र के समान कठोर मणि, हीरे आदि को काटना तथा शहद की एक बूँद के द्वारा विशाल खारे समुद्र को मीठा करना।

कहने का तात्पर्य यह है कि मदमस्त हाथी को बड़ी-बड़ी जंजीरों के द्वारा ही बाँधा जा सकता है। कमलनाल के धागों से बाँधने का प्रयास पूर्णतया मूर्खतापूर्ण एवं असम्भव है— ठीक इसी प्रकार हीरे आदि कठोर मणि को किसी भी कठोरतम पुष्प की पंखुड़ियों से काटना एकदम असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। ठीक वैसे ही एक शहद की बूँद से अथाह जलराशि वाले समुद्र के जल को मीठा करने का प्रयास भी मूर्खतापूर्ण एवं असम्भव है— वैसा ही मूर्खतापूर्ण कार्य अच्छी-अच्छी अमृतवर्षी बातों को सुना-सुनाकर मूर्खों को सज्जनों के मार्ग पर लाने का भी है। अर्थात् जिस प्रकार उपर्युक्त तीनों कार्य असम्भव हैं, ठीक उसी प्रकार दुष्टों को अच्छी-अच्छी बातों का उपदेश देकर सज्जन नहीं बनाया जा सकता।

विशेष- १. सदुपदेश से किसी भी स्थिति में दुष्ट स्वभाव को सज्जनता में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, इसका प्रतिपादन अत्यन्त सुन्दर ढंग से यहाँ किया गया है। २. उत्तम शिक्षा के लिए सत्पात्र होना प्रथम अनिवार्य आवश्यकता है। ३. प्रस्तुत श्लोक में निदर्शना अलंकार है, जिसका लक्षण इस प्रकार है—

अभवन् वस्तु सम्बन्धः उपमा परिकल्पकः। निदर्शना॥

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

सूर्याश्वै र्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. बालमृणालतन्तुभिः— बालाःमृणालाःबालमृणालाः,तैःतन्तुभिःबालमृणालतन्तुभिः २. रोद्धुम् = √रुध् + तुमुन्। समुज्जृम्भते = सम् + उत् + √जृम्भ् + तिप् (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) मधुबिन्दुना = मधुनः बिन्दुना (षष्ठी तत्पुरुष) ३. छेत्तुम् = √छिद् + तुमुन्। नेतुम् = √नी + तुमुन्। रचयितुम् = √रच् + तुमुन्। ईहते = √ईह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन, आत्मने पद) ४. सन्नह्यते = सम् √नह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन आ.) ५. स्यन्दिभिः = √स्यन्द् + णिनि + भिस् (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)। सूक्तैः = सु + √वच् + क्त + भिस् (तृतीया विभक्ति, बहुवचन)। वाञ्छति = √वाञ्छ् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)। ६. क्षाराम्बुधेः = क्षार अम्बुधिः क्षाराम्बुधिः तस्य।

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