भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् ११

इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा को मिलाकर उपजाति छन्द बनाता है।

६. मौन रूप आभूषण की दो विशेषताओं का यहाँ उल्लेख किया है। प्रथम इसके लिए व्यक्ति पूर्णतया स्वाधीन होता है। द्वितीय इसमें लाभ ही लाभ है, हानि की कोई सम्भावना ही नहीं है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

  • विधात्रा = वि + √धा + तृच् (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
  • छादनम् = √छद् + णिच् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
  • विनिर्मितम् = वि + निर् + √मा + क्त (नपु. , प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
  • विभूषणम् = वि + √भूष् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
  • अपण्डितानाम् = न पण्डितः इति अपण्डितः, तेषाम् (नञ् समास)

यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवं,
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।
यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतं,
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः॥९॥

अन्वय- यदा अहम् किञ्चित् ज्ञः (आसम्) द्विपः इव मदान्धः समभवम्, तदा मम मनः सर्वज्ञः अस्मि इति अवलिप्तम् अभवत्। यदा बुधजनसकाशात् किञ्चित् किञ्चित् अवगतम्, तदा मूर्खः अस्मि इति मे मदः ज्वरः इव व्यपगतः।

अनुवाद- जब मैं थोडा सा जानता (था तो मैं) हाथी के समान मद से अंधा हो गया था, तब मेरा मन (मैं) सर्वज्ञ हूँ, इस प्रकार (सोचकर) अहंकारयुक्त हो गया था। जब विद्वानों के सन्निध्य से (मैंने) कुछ-कुछ समझा, तब '(मैं) मूर्ख हूँ', इस प्रकार मेरा मद ज्वर के समान दूर हो गया।

व्याख्या- कवि कहता है कि जिस समय मैंने अत्यल्प जाना था तो मैं अपने को सर्वज्ञ मानता था और जिस प्रकार हाथी मद में अंधा रहता है तथा उचित अनुचित का ध्यान नहीं रखता। अपने सामने अन्य किसी को सामर्थ्यशाली नहीं मानता, ठीक उसी प्रकार मुझे भी अहंकार हो गया था कि मैं ही सबसे अधिक विद्वान् हूँ। मैं ही सब कुछ जानता हूँ, अन्य सब लोग मेरी अपेक्षा अल्पज्ञ हैं।

किन्तु जब मैं ईशकृपा से विद्वानों के सम्पर्क में आया तथा मैंने उनके अथाह ज्ञान का दर्शन किया तो मैंने स्वयं को उनके सामने एकदम मूर्ख माना और मेरा अहंकार, जो स्वयं को सर्वज्ञ मानते हुए मुझे हो गया था, ठीक उसी प्रकार क्षणभर में दूर हो गया, जिस प्रकार औषधि लेने से बुखार दूर हो जाता है।

कहने का तात्पर्य है कि प्रथम तो व्यक्ति को अपने ज्ञान को कभी भी सम्पूर्ण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती तथा ज्ञानी मानकर कभी भी स्वयं

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