नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
की योग्यता पर अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार व्यक्ति के नाश का द्योतक होता है। सत्पुरुषों, विद्वानों की सदैव खोज करनी चाहिए और उससे कुछ न कुछ सीखने का विनम्र प्रयास करना चाहिए।
विशेष- १. आधा भरा घड़ा शब्द करता है, इस कहावत के अनुसार अल्पज्ञता व्यक्ति को अहंकारी बना देती है। २. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने अल्पज्ञ की स्थिति का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है। ३. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमा इत्यभिधीयते। यहाँ अहंकार की मद से उपमा दी गई है। ४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ५. काव्यलिंग अलंकार-लक्षण-हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगमुदाहृतम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- किञ्चिज्ज्ञः = किञ्चिद् जानाति इति, किञ्चित् √ज्ञा + क + पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। द्विपः = द्वाभ्यां पिबति इति, द्वि + √पा + क। सर्वज्ञः = सर्वं जानाति इति। सर्व + √ज्ञा + क। मदान्धः = मदेन अन्धः (तृतीया तत्पुरुष), अवलिप्तम् = अव + √लिप् + क्त। अवगतम् = अव + √गम् + क्त। व्यपगतः = वि + अप + √गम् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)। सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तम् = सर्वज्ञः + अस्मि + इति + अभवत् + अवलिप्तम् (विसर्ग, दीर्घ, यण्, व्यञ्जन)।
कृमिकुलचितं लालाक्लिन्नं विगन्धि¹ जुगुप्सितं, निरुपमरसं प्रीत्या खादन्खरास्थि² निरामिषम्। सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्थं विलोक्य न शङ्कते, न हि गणयति क्षुद्रो जन्तु परिग्रहफल्गुताम्॥१०॥
अन्वय- श्वा कृमिकुलचितम्, लालाक्लिन्नम्, विगन्धि, जुगुप्सितम्, निरुपमरसम्, निरामिषम्, खरास्थि प्रीत्या खादन् पार्श्वस्थम् सुरपतिम् अपि विलोक्य न शङ्कते, (वस्तुतः) क्षुद्रः जन्तुः परिग्रहफल्गुताम् न हि गणयति।
अनुवाद- कुत्ता कीड़ों के समूह से भरे हुए, लार से भीगे हुए, दुर्गन्धित, घृणा को योग्य, अनुपम (बुरे) रस वाली, माँसरहित गदहे की हड्डी को प्रेमपूर्वक खाता हुआ,
१. विगर्हि २. नरास्थि