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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् १३

पास में खड़े हुए इन्द्र को भी देखकर शंकित नहीं होता है (वास्तव में) तुच्छ प्राणी ग्रहण की गई (वस्तु की) तुच्छता को नहीं गिनता है।

व्याख्या- कुत्ता यदि उसे किसी हड्डी का टुकड़ा मिल जाए चाहे, उसमें कीड़े क्यों न भरे हुए हों, उसके मुख से निकलने वाली लार से भीगने के कारण कितना भी घृणित क्यों न हो, अत्यन्त दुर्गन्ध आ रही हो तथा उसमें स्वाद भी ऐसा क्यों न हो जिसकी कोई उपमा ही न दी जा सके, उसमें लेशमात्र भी माँस नहीं हो, फिर भी वह अत्यन्त प्रेमपूर्वक उसे चबाते हुए एक असीम आनन्द का अनुभव करता है। उस समय उसे आसपास की भी खबर नहीं रहती, भले ही स्वयं इन्द्र भी उसके पास क्यों न खड़ा हो, उसे कुछ भी देने का इच्छुक क्यों न हो, वह उसकी भी परवाह नहीं करता, न ही उससे तनिक भी भयभीत ही होता है।

वास्तव में नीच स्वभाव वाले प्राणी अपने स्वभाव के कारण खराब से खराब वस्तु की निःसारता को नहीं समझ पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि निकृष्ट स्वभाव वाला प्राणी तुच्छ से तुच्छ वस्तु को अपनाने के बाद बिना किसी की परवाह के उसी में आनन्द का अनुभव करता है।

ठीक इसी प्रकार इस संसार में नीच स्वभाव वाले लोग भी बुरे से बुरे काम में लिप्त हो. जाते हैं तथा किसी की भी परवाह किए बिना, लेशमात्र भी लज्जित नहीं होते। उनके लिए उसी में असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, उन्हें न तो लोकनिन्दा की परवाह होती हैं और न ही उन्हें ईश्वर से ही डर लगता है।

विशेष- १. नीच स्वभाव वाले व्यक्ति की तुलना कुत्ते से दी गई है।

२. हड्डी चबाते हुए कुत्ते का स्वाभाविक वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलंकार का प्रयोग।

३. अप्रस्तुत कुत्ते के वर्णन द्वारा प्रस्तुत नीच व्यक्ति का वर्णन होने से अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है, लक्षण इस प्रकार है–

अप्रस्तुतस्य कथनात् प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुत प्रशंसेयं सारूप्यादि नियन्त्रिता।।

४. प्रस्तुत श्लोक में विगन्धि के स्थान पर विगर्हि तथा खरास्थि के स्थान पर नरास्थि पाठभेद भी प्राप्त होता है, तब निन्दित एवं मनुष्य की हड्डी अनुवाद करना होगा।

५. नरास्थि के स्थान पर अर्थौचित्य की दृष्टि से खरास्थि पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि मनुष्य की हड्डी की इस प्रकार उपलब्धि सहज नहीं होती।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

कृमिकुलचितं = कृमीणां कुलं— कृमिकुलं तैः चितम्, √चि + क्त। लालाक्लिन्नम् = लालाभिः क्लिन्नम् √क्लिद् + क्त। विगन्धि = वि √गन्ध् + इनि (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)। विगर्हि = वि + √गर्ह् + इनि (नपु., द्वितीया विभक्ति, एकवचन)।