भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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१४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

निरुपमरसम् = निर्गता उपमा यस्य सः निरुपमः, निरुपमः रसः यस्मिन्। प्रीत्या = √प्रीञ् + क्तिन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन)।

खादन् = √खाद् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)। पार्श्वस्थम् = पार्श्वे तिष्ठति इति पार्श्वस्थः तम्। सुरपतिम् = सुराणां पतिः सुरपतिः तम्। विलोक्य = वि + √लोक् + ल्यप्। परिग्रहस्य फल्गुताम् = परिग्रहफल्गुताम्।

शिरः शार्वं स्वर्गात् पशुपतिशिरस्तः १ क्षितिधरं,
महीध्रादुत्तुंगादवनिमवनेश्चापि जलधिम्।
अधोधो गङ्गेयं पदमुपगता स्तोकमथवा,
विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः॥१९॥

अन्वय- इयम् गंगा स्वर्गात् शार्वम् शिरः, पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरम्, उत्तुंगात् महीध्रात् अवनिम्, अवनेः च अपि जलधिम् (एवम् क्रमशः) अधः अधः स्तोकम् पदम् उपगता अथवा विवेकभ्रष्टानाम् विनिपातः शतमुखः भवति।

अनुवाद- इस गंगा ने, स्वर्ग से शिव के सिर को, शिव के सिर से पर्वत (हिमालय) को, ऊँचे पर्वत से पृथिवी को और पृथ्वी से भी समुद्र को (इस प्रकार क्रमशः) नीचे-नीचे स्थान को प्राप्त किया अथवा विवेक से भ्रष्ट हुए लोगों का पतन सैकड़ों प्रकार से होता है।

व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति जब विवेक भ्रष्ट होता है तो उसके पतन की कोई सीमा नहीं होती, इसी विचार को प्रतिपादित करते हुए कवि यहाँ गंगा का उदाहरण देते हुए कहता है कि यह गंगा प्रारम्भ में स्वर्ग जैसे ऊँचे एवं श्रेष्ठ स्थान पर विराजमान थी, किन्तु जब इसका पतन होना प्रारम्भ हुआ तो यह स्वर्ग से कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव के सिर पर गिरी, वहाँ भी यह स्थिर नहीं रह सकी तथा वहाँ से इसका पतन हिमालय पर्वत पर हुआ। हिमालय पर्वत जैसे उत्तुंग स्थल पर भी यह नहीं टिक सकी, अपितु इसका वहाँ से पृथ्वी पर पतन हुआ और पृथ्वी से अन्त में सर्वाधिक नीचे स्थान समुद्र को प्राप्त करके ही इसने विराम लिया। जहाँ इसका अपना अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

इस प्रकार जब व्यक्ति विवेकरहित होता है तो उसका इतना आधिक पतन होता है कि अन्त में वह गंगा के समान ही अस्तित्वहीन हो जाता है। अतः व्यक्ति को अपना विवेक कभी भी नहीं त्यागना चाहिए। किसी भी कार्य को करने से पूर्व कर्तव्य अकर्तव्य का विचार अवश्य करना चाहिए।

विशेष- १. व्यक्ति को कोई भी कार्य भलीभाँति विचार कर, विवेकपूर्वक ही करना चाहिए।


१. पतति शिरस्तत्