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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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१६श्रीभर्तृहरिविरचितम्

हाथी को तेज धार वाले अंकुश से वश में किया जा सकता है, सांड या बैल को दण्डे के द्वारा वश में किया जा सकता है। इसी प्रकार औषधियों को इकट्ठा करके उनके प्रयोग से सभी प्रकार के रोगों का उपचार सम्भव है एवं किसी व्यक्ति पर विष के प्रभाव को अनेक प्रकार के मन्त्रों के प्रयोग से दूर करना भी सम्भव है।

इस प्रकार हमारे शास्त्रों में प्रत्येक कठिनाई के उपस्थित होने या कष्ट को दूर करने का कोई न कोई उपाय बताया गया है, किन्तु एक मात्र मूर्खता ही एक ऐसा कारण है कि उसका कोई उपचार नहीं है अर्थात् मूर्ख व्यक्ति की मूर्खता को दूर करने का कोई भी उपाय कारगर सिद्ध नहीं होता।

विशेष- १. मूर्खता को यहाँ पूर्णतया असाध्य माना गया है। वस्तुतः मूर्खता एक असाध्य रोग है। २. यहाँ मूर्ख से अभिप्राय उसकी मूर्खता से ही है। ३. इस श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

४. इसी प्रकार के विचार कवि ने पूर्व श्लोकों में भी व्यक्त किए हैं—

न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।

५. एक अन्य स्थल पर भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए गये हैं—

इत्थं तद् भुवि नास्ति यस्य विधिना नोपायचिन्ताकृता।
मन्ये दुर्जनचित्तवृत्ति हरणे धातापि भग्नोद्यमः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. हुतम् भुङ्क्ते इति हुतभुक्। हुत + √भुज् + क्विप् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
२. √वृ + णिच् + तुमुन् = वारयितुम्
३. √शक् + यत् = शक्यः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. सूर्यस्य आतपः = सूर्यातपः (षष्ठी तत्पुरुष)
५. मदेन सह = समदः (अव्ययीभाव)
६. नगानाम् इन्द्रः = नगेन्द्रः (षष्ठी तत्पुरुष)
७. निशितेन अंकुशेन (कर्मधारय)
८. गोश्च गर्दभश्च गोगर्दभौ (द्वन्द्व समास)
९. वि + √धा + क्त = विहितम्
१०. भेषजानां संग्रहैः = भेदजसंग्रहैः (षष्ठी तत्पुरुष)
११. शास्त्रैः विहितम् = शास्त्रविहितम् (तृतीया तत्पुरुष)
१२. ओषः पाकः धीयते अस्याम् = औषधम्– ओष + √धा + कि