नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १७
साहित्य-सङ्गीत-कलाविहीनः, साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः। तृणं न खादन्नपि जीवमानः, तद् भागधेयं परमं पशूनाम्॥१३॥
अन्वय- साहित्य-संगीत-कला-विहीनः (मनुष्यः) पुच्छ विषाणहीनः साक्षात् पशुः (एव अस्ति) तृणम् न खादन् अपि (सः) जीवमानः तत् पशूनाम् परमम् भागधेयम् (वर्तते)।
अनुवाद- साहित्य संगीत और कला से रहित (व्यक्ति) पूँछ, सींग से रहित साक्षात् पशु (ही है)। तिनके न खाता हुआ भी (वह) जीवित रहता है, वह पशुओं का परम सौभाग्य (ही है)।
व्याख्या- इस संसार में जिस व्यक्ति ने न तो साहित्य का अध्ययन किया, न ही संगीत की शिक्षा प्राप्त की और न ही कला को समझने का प्रयास किया अर्थात् साहित्य, संगीत अथवा कला इन तीनों में से किसी की भी शिक्षा प्राप्त नहीं की। ऐसा व्यक्ति इस संसार में बिना पूँछ एवं बिना सींग का पशु ही है।
और जो यह मनुष्य रूपी पशु बिना तिनके खाए भी जीवित रहता है, वह तो पशुओं का परम सौभाग्य ही है, क्योंकि यदि यह मनुष्य रूपी पशु भी तिनके खाने लग जाता तो निश्चय ही पशुओं के लिए खाद्य पदार्थों का अभाव हो जाता।
विशेष- १. यहाँ साहित्य, संगीत एवं कला को न जानने वाले मनुष्य को पशु के समान बताया है। २. इस संसार में आकर व्यक्ति को इन तीनों में से कम से कम किसी एक का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए अन्यथा उसका मनुष्य जीवन निरर्थक है। ३. नीतिशतकम् की कुछ प्रतियों में यह श्लोक प्राप्त नहीं होता है। ४. यहाँ उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है लक्षण पूर्व श्लोक में दिया हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. सहित + ष्यञ् = साहित्य। सम् + √गै + क्त = संगीत। वि + √हा + क्त- विहीनः। साहित्यञ्च संगीतञ्च कलां च ताभिः विहीनः = साहित्यसंगीतकलाविहीनः (द्वन्द्व समास) २. पुच्छञ्च विषाणौ च पुच्छविषाणाः तैः हीनः = पुच्छविषाणहीनः। ३. √खाद् + शतृ = खादन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ४. √जीव् + शानच् = जीवमानः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
यहाँ शानच् प्रत्यय के स्थान पर शतृ प्रत्यय का प्रयोग करके जीवन् प्रयोग उचित था, क्योंकि जीव् धातु परस्मैपदी है।