नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥१४॥
अन्वय- येषाम् (जनानाम् समीपे) न विद्या, न तपः, न दानम् (न) ज्ञानम्, न शीलम्, न गुणः, न धर्मः (वर्तते) ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः (सन्ति) मनुष्यरूपेण (च) मृगाः चरन्ति।
अनुवाद- जिन (लोगों के पास) न विद्या (है), न तप (है) न दान (है), न ज्ञान (है) न सदाचार (है), न गुण है (और) न धर्म (है) वे (इस) मृत्युलोक में पृथिवी पर भारस्वरूप हैं (और) मनुष्य रूप में पशु (ही) घूम रहे हैं।
व्याख्या- इस संसार में जिन लोगों ने विद्या का अध्ययन नहीं किया अथवा तपस्या का आचरण भी नहीं किया, किसी भी प्राणी को कुछ भी दान नहीं दिया, ज्ञान का अर्जन भी अपने जीवन में नहीं किया, दैनिक जीवन में जो सदाचार का भी पालन नहीं करता है यहाँ तक कि उसके पास कोई गुण भी नहीं है, न ही वह धर्म का ही पालन करता है। ऐसा व्यक्ति इस मृत्युलोक में पृथिवी के ऊपर भार के समान निरर्थक है और ऐसे व्यक्तियों के लिए यदि हम कहें कि वे इस पृथिवी पर पशु ही घूम रहे हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि जिस प्रकार इस संसार में पशु का जीवन निरर्थक है, वैसा ही उस व्यक्ति का जीवन है।
विशेष-
१. व्यक्ति को अपना जीवन सार्थक करने के लिए उपरोक्त गुणों में से किसी भी एक को अपने आचरण में लाना चाहिए।
२. जिसके पास उपरोक्त विशेषताओं में से कोई विशेषता नहीं है, उसमें और पशु में कोई भी अन्तर नहीं है, अतः उनका जीवन पूर्णरूपेण निरर्थक है।
३. यहाँ विद्या का प्रथम उल्लेख के कारण उसकी सर्वाधिक महत्ता का कवि का अभिप्राय है।
४. प्रस्तुत श्लोक में प्रथम तीन चरणों में इन्द्रवज्रा तथा चतुर्थ में उपेन्द्रवज्रा होने से उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √दा + ल्युट् = दानम्
२. मर्त्यानां लोके मर्त्यलोके (षष्ठी तत्पुरुष)
३. भारः इव भूताः भारभूताः (कर्मधारय)
४. मनुष्यस्य रूपेण मनुष्यरूपेण (षष्ठी तत्पुरुष)