नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १९
५. √चर् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन)
६. √ज्ञा + ल्युट् = ज्ञानम्
वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह।
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि॥१५॥
अन्वय- वनचरैः सह पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तम् वरम् (अस्ति), (किन्तु) मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेषु अपि वरम् न (वर्तते)।
अनुवाद- वनवासियों के साथ दुर्गम पर्वतों में विचरण करना श्रेष्ठ (है, किन्तु) मूर्ख लोगों के साथ इन्द्र के भवनों में भी (रहना) ठीक नहीं (है)।
व्याख्या- यदि व्यक्ति को किसी विशेष परिस्थिति में मूर्ख लोगों के साथ पूर्णतया ऐश्वर्य सम्पन्न सुख सुविधायुक्त स्थानों पर भी रहना पड़े तो व्यक्ति को कभी भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि मूर्खों के साथ रहने से व्यक्ति का किसी भी दृष्टि से भला नहीं हो सकता, किन्तु कुसंगति के कारण हानि की ही अधिक सम्भावना रहेगी।
इसलिए व्यक्ति को भले ही कितनी भी कठिनाइयों का सामना करते हुए, कष्ट का अनुभव करते हुए, दुर्गम पर्वत कन्दराओं में पूर्ण अविकसित भीलों के साथ भी क्यों न रहना पड़े, किन्तु उसे मूर्ख लोगों के साथ किसी भी स्थिति में निवास को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
विशेष-
१. यहाँ मूर्ख व्यक्ति की संगति की अपेक्षा अधिक से अधिक कष्ट उठाते हुए वनवासियों की संगति को भी श्रेष्ठ बताया है।
२. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयो ह्र्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र के अनुसार सह के योग में वनचरैः पद में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
२. वने चरन्ति इति वनेचराः, तैः वनचरैः (सप्तमी तत्पुरुष)
३. पर्वतानां दुर्गेशु, पर्वतदुर्गेषु (षष्ठी तत्पुरुष)
४. सुराणाम् इन्द्रः सुरेन्द्रः तस्य भवनेषु (षष्ठी तत्पुरुष)
विद्वत्पद्धतिः
शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः शिष्यप्रदेयागमाः,
विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभोर्निर्धनाः।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य, कवयस्त्वर्थं विनापीश्वराः,