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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

नीतिशतकम् १९

५. √चर् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन)
६. √ज्ञा + ल्युट् = ज्ञानम्

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह।
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि॥१५॥

अन्वय- वनचरैः सह पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तम् वरम् (अस्ति), (किन्तु) मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेषु अपि वरम् न (वर्तते)।

अनुवाद- वनवासियों के साथ दुर्गम पर्वतों में विचरण करना श्रेष्ठ (है, किन्तु) मूर्ख लोगों के साथ इन्द्र के भवनों में भी (रहना) ठीक नहीं (है)।

व्याख्या- यदि व्यक्ति को किसी विशेष परिस्थिति में मूर्ख लोगों के साथ पूर्णतया ऐश्वर्य सम्पन्न सुख सुविधायुक्त स्थानों पर भी रहना पड़े तो व्यक्ति को कभी भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि मूर्खों के साथ रहने से व्यक्ति का किसी भी दृष्टि से भला नहीं हो सकता, किन्तु कुसंगति के कारण हानि की ही अधिक सम्भावना रहेगी।

इसलिए व्यक्ति को भले ही कितनी भी कठिनाइयों का सामना करते हुए, कष्ट का अनुभव करते हुए, दुर्गम पर्वत कन्दराओं में पूर्ण अविकसित भीलों के साथ भी क्यों न रहना पड़े, किन्तु उसे मूर्ख लोगों के साथ किसी भी स्थिति में निवास को स्वीकार नहीं करना चाहिए।

विशेष- १. यहाँ मूर्ख व्यक्ति की संगति की अपेक्षा अधिक से अधिक कष्ट उठाते हुए वनवासियों की संगति को भी श्रेष्ठ बताया है।
२. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—

श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयो ह्र्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र के अनुसार सह के योग में वनचरैः पद में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
२. वने चरन्ति इति वनेचराः, तैः वनचरैः (सप्तमी तत्पुरुष)
३. पर्वतानां दुर्गेशु, पर्वतदुर्गेषु (षष्ठी तत्पुरुष)
४. सुराणाम् इन्द्रः सुरेन्द्रः तस्य भवनेषु (षष्ठी तत्पुरुष)

विद्वत्पद्धतिः

शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः शिष्यप्रदेयागमाः,
विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभोर्निर्धनाः।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य, कवयस्त्वर्थं विनापीश्वराः,

२० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः॥१६॥

अन्वय- शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः, शिष्यप्रदेयागमाः, विख्याताः कवयः यस्य प्रभोः विषये निर्धनाः वसन्ति। तत् वसुधाधिपस्य जाड्यम् (एव)। कवयः तु अर्थम् विना अपि ईश्वराः (सन्ति)। यैः मणयः अर्घतः पातिताः ते कुपरीक्षकाः हि कुत्स्याः स्युः।

अनुवाद- शास्त्रपरिष्कृत शब्दों से सुन्दर वाणी से युक्त, शिष्यों को देने योग्य विद्या से युक्त, प्रसिद्ध कवि जिस राजा के राज्य में निर्धन होकर रहते हैं। वह (तो वस्तुतः) राजा की मूर्खता (ही है) कवि तो धन के बिना भी ऐश्वर्यसम्पन्न (हैं)। जिन (परीक्षकों द्वारा) मणियाँ मूल्य से गिरा दी गईं, वे बुरे परीक्षक ही (वस्तुतः) निन्दनीय हैं (न कि मणियाँ)।

व्याख्या- जिन कवियों के पास व्याकरण सम्मत, मनोरम वाणी है तथा जिनकी अथाह ज्ञानराशि शिष्यों को देने योग्य है अर्थात् जिनमें ज्ञान के साथ-साथ अभिव्यक्ति की सामर्थ्य भी है। इन विशेषताओं से युक्त दूर-दूर प्रदेशों में अपनी योग्यता के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध भी कवि यदि किसी राजा के राज्य में निर्धनता की अवस्था में निवास करते हैं, तो यह उस राजा की ही मूर्खता मानी जाएगी कवियों का इसमें कोई दोष नहीं है।

क्योंकि कवि तो धन के अभाव में भी राजाओं के समान ऐश्वर्य से युक्त हैं, उनका ज्ञान उनका सबसे बड़ा धन है कहा भी गया है- ‘विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्।' इसी प्रसंग में कवि एक उदाहरण देते हुए कहता है कि यदि राजा अपने राज्य में रहने वाले विद्वानों का सम्मान नहीं करता, उन्हें राजाश्रय प्रदान नहीं करता, तो इसके लिए निश्चय ही वह राजा ही ठीक उसी प्रकार दोषी है जैसे यदि कोई जौहरी मूल्यवान् मणियों को काँच करार दे दे, तो इसमें दोष जौहरी का माना जाएगा न कि मणियों का। मणियों में तो अपना गुण है ही उसकी परख करने वाले, वस्तुतः जौहरी कहलाने योग्य नहीं हैं, क्योंकि यदि उनमें सही परख की सामर्थ्य होती तो वे निश्चय ही मूल्यवान् मणियों को मूल्य-रहित करार नहीं देते।

विशेष- १. राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में स्थित विद्वानों को यथोचित सम्मान प्रदान करे, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें।

२. यदि कोई अज्ञानी हीरे को पत्थर समझ कर उसको उपेक्षापूर्वक कूड़े में फेंक देता है तो इसके लिए हीरा दोषी नहीं हो सकता।

३. यहाँ कवि से अभिप्राय अपने विषय के विशिष्ट विद्वान् एवं अभिव्यक्ति की सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति से है, कविता करने वाले व्यक्ति से नहीं।

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग है—

नीतिशतकम् २१

सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः: शार्दूलविक्रीडितम्।
५. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगमुदाहृतम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. शास्त्रैः उपस्कृतः शास्त्रोपस्कृतः, तैः शब्दैः सुन्दर्यः गिरः येषां
२. शिष्येभ्यः प्रदेयाः आगमाः येषां, ते
३. प्र + √दा + यत् = प्रदेयाः
४. वसुधायाः अधिपः, वसुधाधिपः (षष्ठी तत्पुरुष)
५. अर्ध + तसिल् = अर्धतः
६. √पत् + णिच् + क्त = पातित + टाप् = पातिता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)
७. स्युः = लट् लकार के अर्थ में यहाँ विधिलिङ् लकार का प्रयोग है।
८. उप + √कृ + क्त (सुट् का आगम)
९. √कुत्स् + ण्यत् = कुत्स्याः

हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा
ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम्।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं
येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते॥१७॥

अन्वय- हे! नृपाः, तान् प्रति मानम् उज्झत, येषाम् (समीपे) विद्याख्यम् अन्तःधनम् (अस्ति) यत् हर्तुः गोचरम् न याति, सर्वदा किम् अपि शम् पुष्णाति, अर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानम् अनिशम् हि पराम् वृद्धिम् प्राप्नोति, कल्पान्तेषु अपि निधनम् न प्रयाति, तैः सह कः स्पर्धते।

अनुवाद- हे राजाओं!, उन (लोगों) के प्रति अभिमान छोड़ दो, जिनके (पास) विद्या नामक गुप्त धन (है) जो चोर की इन्द्रियों का विषय नहीं होता, सदा ही किसी न किसी कल्याण को ही पुष्ट करता है, याचकों को दिया जाता हुआ (भी) निरन्तर अत्यधिक बढ़ता ही है, कल्पों के अन्त में भी विनष्ट नहीं होता है, (भला) उनके साथ कौन स्पर्धा कर सकता है?

व्याख्या- राजाओं को सम्बोधित करते हुए कवि विद्वानों के प्रति विनम्र व्यवहार करने का सुझाव देते हुए कहता है कि हे राजाओं! तुम इस प्रकार के विद्वानों के प्रति अपने अहंकार का परित्याग कर दो, जिनके पास विद्या नामक अत्यन्त अद्भुत एवं गुप्त धन है, जो चोरों की इन्द्रियों का विषय भी नहीं होता अर्थात् चोर इस धन को चुराने में समर्थ नहीं होते। इस धन के द्वारा किसी न किसी प्रकार के कल्याणों की ही प्राप्ति होती

२२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

है अर्थात् विद्या के द्वारा कभी भी अकल्याण की सम्भावना ही नहीं है। यह विद्या नामक गुप्त धन यदि याचकों को दिया जाए तो निरन्तर बढ़ता ही है। भले ही कल्प का अन्त क्यों न आ जाए, किन्तु इस धन के विनाश की कोई सम्भावना ही नहीं रहती। इस प्रकार के धनों से युक्त धनवानों के अर्थात् विद्वानों के साथ भला किसकी स्पर्धा करने की सामर्थ्य है। अतः हे राजाओं! तुम कभी भी इनके साथ बराबरी नहीं कर सकते हो। इसलिए इनके साथ अभिमान का त्याग कर विनम्रतापूर्वक व्यवहार करो।

विशेष- १. विद्वत्त्वं नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। इस भावना को अभिव्यक्त करते हुए यहाँ विद्वान् की उत्कृष्टता प्रतिपादित की गई है।
२. विद्या रूपी धन की चार विशेषताओं का यहाँ उल्लेख किया गया है।
३. प्रस्तुत श्लोक में उपमेय विद्या रूपी धन की, उपमान सामान्य लोक प्रसिद्ध धन से उत्कृष्टता प्रतिपादित करने से व्यतिरेक अलंकार है, लक्षण इस प्रकार है—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः॥
४. राजाओं का कर्तव्य है कि वे विद्वानों का सम्मान करें।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं, जो मनुष्यों के ४३२००००००० वर्षों के बराबर होता है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. हर्तुः + याति (विसर्ग संधि)
२. सर्वदा + अपि + अर्थिभ्यः (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि)
३. कल्प + अन्तेषु + अपि (दीर्घ, यण्)
४. कः + तैः = (विसर्ग— विसर्जनीयस्य सः)
५. √हृ + तृच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन)
६. गावः (इन्द्रियाणि) चरन्ति अस्मिन् इति, गोचरःतम्
७. अर्थ + इनि (पुल्लिंग, चतुर्थ विभक्ति, बहुवचन)
८. प्रति + √पद् + शानच् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
९. √उज्झ + सिप् (लोट् लकार, म.पु., एकवचन)
१०. प्रति के योग में तान् में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
११. ‘‘सहयुक्तेऽप्रधाने’’ सूत्र से सह के योग में तैः में तृतीया विभक्ति।
१२. √स्पर्ध् + तिप् (आत्मनेपद, लट्लकार (प्रथम पुरुष, एकवचन)

अधिगतपरमार्थान् पण्डितान् माऽवमंस्थाः,
तृणमिव लघु लक्ष्मीनैव तान् संरुणद्धि।

नीतिशतकम् २३

अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानां,
न भवति बिसतन्तुर्वारणं वारणानाम्॥१८॥

अन्वय- अधिगत परमार्थान् पण्डितान् अवमंस्थाः मा, तृणम् इव लघु लक्ष्मीः तान् न एव संरुणद्धि। अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानाम् वारणानाम् बिसतन्तुः वारणम् न भवति।

अनुवाद- परमतत्त्व प्राप्त किए हुए पण्डितों का अपमान मत (करो)। तिनके के समान तुच्छ लक्ष्मी उनको नहीं रोक सकती। ताजे मद की धाराओं से काले गण्डस्थलों वाले हाथियों को कमलनाल का तन्तु रोकने में (समर्थ) नहीं होता।

व्याख्या- जिन विद्वानों ने परमतत्त्व अर्थात् परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे ब्रह्मज्ञानियों का अपमान करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि ये लोग सांसारिक ऐश्वर्य से ऊपर उठ गए है, सांसारिक वैभव अब उनके सामने तिनके के समान हैं। परमात्मतत्त्व में लीन उनके समक्ष इस संसार का राजा अथवा बड़े से बड़ा धनवान् कोई अर्थ नहीं रखता है। अतः ऐसे तत्त्व ज्ञानियों का अपमान करना उचित नहीं है।

इसी विषय को समझाते हुए कवि हाथी और कमलनाल के तन्तुओं का उदाहरण देते हुए कहता है कि जिसके गण्डस्थलों से मद बह रहा हो जो अत्यधिक शक्तिशाली हो, ऐसे पूर्णतया युवक हाथी को क्या आप कमलनाल के तन्तुओं के द्वारा बांधकर रोकने में समर्थ हो सकते हैं अर्थात् कभी नहीं।

इसलिए जिस प्रकार बिसतन्तुओं के द्वारा किसी मदमस्त हाथी को रोकना असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। उसी प्रकार परमतत्त्व ज्ञानी पण्डितों को धन और ऐश्वर्य का लोभ दिखाकर अपने वश में करना असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। अतः ऐसे विद्वानों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।

विशेष- १. परमतत्त्व को प्राप्त करने वाले तत्त्वज्ञानी के लिए यह सम्पूर्ण संसार ही नश्वर है। अतः त्याज्य है।
२. धन का लोभ सामान्य व्यक्ति को प्रभावित करता है, तत्त्वज्ञानी को नहीं।
३. यहाँ तत्त्वज्ञानी की उपमा मदमस्त हाथी से तथा लक्ष्मी की कमलनाल के नाजुक रेशों से दी गई है।
४. उत्कृष्ट श्रेणी के हाथी की यह विशेषता है कि उसकी कनपटियों से सुगन्धित द्रव पदार्थ बहता रहता है, जिसके कारण उसके गण्डस्थल काले रहते हैं। इसी को गजमद कहा जाता है।
५. यहाँ दो वाक्यों में बिम्ब प्रतिबिम्बभाव होने के कारण दृष्टान्त अलंकार प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्॥

२४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

६. प्रस्तुत श्लोक में मालिनी छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण— ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. अधिगतः परमार्थः यैः अधिगतपरमार्थः तान् = अधिगतपरमार्थान्। अधि + √गम् + क्त = अधिगत २. अव + √मन् + थास् (लुङ् लकार, म.पु., एकवचन) ३. सम् + √रुध् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) ४. बिसानाम् तन्तुः = बिसतन्तुः (षष्ठी तत्पुरुष) ५. √वृ + णिच् + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ६. अभिनवाभिः मदलेखाभिः श्यामानि गण्डस्थलानि येषाम्, तेषाम् = अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानाम्। ७. न + एव = नैव (वृद्धिः -वृद्धिरेचि) ८. बिसतन्तुर्वारणम् = बिसतन्तुः + वारणम् (विसर्ग संधि)

अम्भोजिनीवनविहार विलासमेव,
हंसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता।
न त्वस्य दुग्धजलभेदविधौ प्रसिद्धां,
वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ समर्थः॥१९॥

अन्वय- नितराम् कुपितः विधाता हंसस्य अम्भोजिनी वन-विहार-विलासम् एव हन्ति, तु असौ अस्य दुग्ध-जलभेदविधौ प्रसिद्धां वैदग्ध्यकीर्तिम् अपहर्तुम् समर्थः न (अस्ति)।

अनुवाद- अत्यधिक क्रोधित हुआ विधाता हंस के कमल वन में विहरण के आनन्द को ही नष्ट कर सकता है, किन्तु वह इसके दूध और जल को अलग-अलग करने सम्बन्धी प्रसिद्ध निपुणता विषयक यश को छीनने में समर्थ नहीं (है)।

व्याख्या- ब्रह्मा यदि किसी कारणवश अपने वाहन हंस पर अत्यधिक नाराज़ हो जाए तो अधिक से अधिक वह इसे कमल-वन में जाने से रोककर इसके सुख अथवा आनन्द को कम कर सकता है, किन्तु वह किसी भी स्थिति में हंस के पास जो दूध और पानी को अलग-अलग करने की सामर्थ्य अथवा योग्यता है, उसे उससे नहीं छीन सकता है।

कहने का तात्पर्य है कि यदि कोई धनवान् स्वामी अथवा राजा अपने आश्रित सेवक के प्रति किसी कारणवश नाराज हो जाए तो अधिक से अधिक वह उसे अपनी नौकरी से हटा सकता है अथवा उसकी सम्पत्ति छीन कर उसे देश निकाला दे सकता है, किन्तु

नीतिशतकम् २५

किसी भी स्थिति में वह उस व्यक्ति की योग्यता क्षमता अथवा निपुणता, विद्या आदि को नहीं छीन सकता है। अपनी उस योग्यता के कारण तो वह जगत् में निश्चय ही प्रसिद्धि को प्राप्त करेगा।

विशेष- १. व्यक्ति के अपने गुणों के कारण प्राप्त कीर्ति स्थायी होती है, उसका कोई भी हननं करने में समर्थ नहीं है। अतः व्यक्ति को सदैव अपनी योग्यता में वृद्धि करनी चाहिए।

२. यहाँ ब्रह्मा से सामर्थ्यशाली राजा तथा हंस से लब्धकीर्ति विद्वान् के अर्थों की भी व्यंग्यार्थ से प्रतीति हो रही है।

३. यहाँ अप्रस्तुत विधाता और हंस के कथन द्वारा प्रस्तुत राजा और विद्वान् के अर्थ की अभिव्यक्ति होने का कारण अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-

अप्रस्तुतस्य कथनात् प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुतप्रशंसेयं सारूप्यादि नियन्त्रिता॥

४. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है- लक्षण इस प्रकार है-

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

५. विद्वान् वस्तुतः राजा से भी बढ़कर है- 'स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते', इसी भाव की इस श्लोक में अभिव्यक्ति हो रही है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. वि + √धा + तृच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = विधाता
२. वि + √लस् + घञ् = विलासः
३. √दुह् + क्त = दुग्ध
४. √भिद् + घञ् = भेदः
५. वि + √दह् + क्त = विदग्ध + ष्यञ् = वैदग्ध्य
६. √कृत् + इन् = कीर्तिः
७. अप + √हृ + तुमुन् = अपहर्तुम्
८. कुपितः + विधाता = कुपितो विधाता (विसर्गः संधि-हशि च)
९. त्वस्य = तु + अस्य = (यण्, इकोयणचि)
१०. अम्भोजिनीनाम् वने विहारस्य विलासम् = अम्भोजिनीवनविहारविलासम्
११. दुग्धं च जलं च दुग्धजले (द्वन्द्व समास) तयोः भेदस्य विधौ दुग्धजलभेदविधौ

केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।

२६

श्रीभर्तृहरिविरचितम्

वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु^१ भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥२०॥

अन्वय- पुरुषम् न केयूराणि भूषयन्ति, न चन्द्रोज्ज्वलाः हाराः, न स्नानम्, न विलेपनम्, न कुसुमम्, न अलङ्कृताः मूर्धजाः, या संस्कृताः धार्यते (एतादृशी) एका वाणी पुरुषम् समलंकरोति, खलु भूषणानि क्षीयन्ते, वाक् भूषणम् सततम् भूषणम् भवति।

अनुवाद- मनुष्य को न केयूर सुशोभित करते हैं, न चन्द्रमा के समान चमचमाते हार, न स्नान, न उबटन (आदि) न पुष्प (और) न (ही) सज्जित केश। जो परिष्कृत रूप में धारण की जाती है (ऐसी) एक मात्र वाणी ही पुरुष को सुशोभित करती है। निश्चय ही (सब प्रकार के) आभूषण नष्ट हो जाते हैं, वाणी रूपी आभूषण ही हमेशा (रहने वाला) आभूषण होता है।

व्याख्या- मनुष्य का एक स्वभाव है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री वह दूसरों को सुन्दर दिखाई देना चाहता है, इसके लिए वह अनेकों उपचार करता है, किन्तु कवि उन सभी उपचारों की निरर्थकता प्रतिपादित करते हुए, एकमात्र संस्कारयुक्त विनम्र वाणी धारण करने का सुझाव देते हुए कहता है कि—

मनुष्य की सुन्दरता बाजूबन्द आदि धारण करने से नहीं बढ़ती, न ही चन्द्रमा के समान चमचमाते हुए सुन्दर हारों से ही उसकी शोभा बढ़ती है, इसके अतिरिक्त बहुत अच्छी प्रकार से रगड़-रगड़ कर स्नान करने से भी वह सुन्दर प्रतीत नहीं होता है। चन्दन, हल्दी आदि के उबटन का प्रयोग भी उसकी सुन्दरता में वृद्धि करने वाला नहीं होता। शरीर पर पुष्प धारण करने से, अपने सिर के बालों को अत्यधिक सजाने से भी वह सुन्दर नहीं लगता। यद्यपि इन सबसे सजने संवरने का व्यक्ति प्रायः प्रयास करता है, किन्तु ये सभी साधन उसे सुन्दर बनाने में अस्थायी रूप से ही सहायक होते हैं।

किन्तु संस्कारयुक्त वाणी को धारण करने वाला व्यक्ति ही वस्तुतः सदैव सुशोभित होता है। सुन्दर लगता है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में संस्कारित वाणी को ही व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ एवं हमेशा रहने वाला आभूषण बताया गया है।

२. श्लोक के चतुर्थ चरण में प्रयुक्त 'खलु' के स्थान पर 'अखिल' पाठभेद भी मिलता है जिसका अर्थ होगा "सभी आभूषण"।

३. उपमान हारादि की अपेक्षा उपमेय संस्कारित वाणी को श्रेष्ठ बताया गया है। अतः व्यतिरेक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है—


१. अखिल

नीतिशतकम् २७

उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः॥ ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण सूर्याश्वैर्मसजा स्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥ ५. यहाँ संस्कारित वाणी से अभिप्राय व्याकरण आदि की दृष्टि से शुद्ध, शिष्ट एवं विनम्रता से युक्त वाणी से है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. चन्द्र इव उज्ज्वलाः (कर्मधारय) चन्द्र + उज्ज्वलाः = चन्द्रोज्ज्वलाः (गुण, आद्गुणः) २. न + अलंकृता = नालंकृता (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) ३. वाणी + एका = वाण्येका (यण्, इकोयणचि) ४. वाक् + भूषणम् = वाग्भूषणम् (व्यंजन, झलांजशोऽन्ते) ५. वि + √लिप् + ल्युट् = विलेपनम् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ६. मूर्धनि जायन्ते इति मूर्धजाः, मूर्धन् + √जन् + ड (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) ७. सम् + √कृ + क्त + टाप् = संस्कृता ८. वाक् एव भूषणम्, वाग्भूषणम् (कर्मधारय) ९. √भूष् + ल्युट् = भूषणम् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १०. अलम् + √कृ + क्त = अलंकृताः (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) ११. √भूष् + णिच् + झि = भूषयन्ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन)

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं,
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतं, १
विद्या राजसु पूजिता न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥२१॥

अन्वय- विद्या नाम नरस्य अधिकम् रूपम्, प्रच्छन्न गुप्तम् धनम् (अस्ति)। विद्या भोगकरी, यशः सुखकरी, विद्या गुरूणाम् गुरुः (वर्तते)। विदेशगमने विद्या, बन्धुजनः विद्या परम् दैवतम्, विद्या (एव) राजसु पूजिता, न हि धनम्। विद्याविहीनः पशुः (अस्ति)।

अनुवाद- विद्या वस्तुतः मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ सौन्दर्य (है), छिपा हुआ गुप्त धन (है)। विद्या भोग देने वाली, यश और सुख प्रदान करने वाली (है)। विद्या गुरुओं का गुरु (है)। विदेश जाने पर विद्या आत्मीय बन्धु है, विद्या सबसे बड़ा देवता है। विद्या


१. परा देवता

२८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

(ही) राजाओं में पूजी जाती है, न कि धन। (वास्तव में) विद्या से हीन (व्यक्ति) पशु (ही है)।

व्याख्या- विद्या की प्रशंसा करते हुए कवि कहता है कि विद्या व्यक्ति का सबसे बड़ा सौन्दर्य है, वस्तुतः सुन्दरतम वही व्यक्ति है जो सर्वाधिक विद्वान् है। इसी प्रकार विद्या सर्वाधिक गोपनीय छिपा हुआ खजाना है। कौन व्यक्ति कितना ज्ञानवान् है, इसका पता तभी चलता है, जब वह बोलता है और उसका अन्य कोई मापदण्ड नहीं होता। विद्या मनुष्य को धन, ऐश्वर्य एवं भोगों को प्रदान करती है, विद्या के बल पर व्यक्ति बड़े से बड़े पद पर पहुँच जाता है, अधिक से अधिक धन कमाने में समर्थ होता है। इसी प्रकार विद्या के द्वारा व्यक्ति यशस्वी होता है वह कितना विद्वान् है, इस रूप में उसकी कीर्ति दिग्दिगन्त में फैलती है। विद्या के माध्यम से व्यक्ति सुखों को प्राप्त करता है।

वस्तुतः विद्या गुरु से भी ऊपर अर्थात् श्रेष्ठ है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति 'गुरु' विद्या के द्वारा ही बनता है। यदि मनुष्य को विदेश में जाना पड़े तो विद्या उसकी सर्वाधिक आत्मीय भाई के समान हितकारिणी होती है। इसी प्रकार विद्या सभी देवताओं में सर्वोच्च देवता है।

राजा भी विद्वानों का ही सम्मान करते हैं। हमेशा देखने में आया है कि विद्वान् का राजा लोग अपने सिंहासन से उतरकर भी सम्मान करते हैं, धनवान् का नहीं और अन्त में कवि कहता है कि यदि कोई व्यक्ति विद्या से रहित है तो वह मनुष्य कहलाने का ही अधिकारी नहीं है, वह तो वस्तुतः पशु ही है।

विशेष- १. इस संसार में विद्या को ही सर्वोच्च बताया गया है। विद्या के द्वारा व्यक्ति यहाँ सब कुछ प्राप्त कर सकता है, यहाँ तक कि परमात्मा को प्राप्त करने में भी विद्या ही सहायक होती हैं।

२. विद्या रूपी धन व्यक्ति के मस्तिष्क में रहता है, अतः उसकी थाह पाना एकदम असम्भव है। अतः इसे यह प्रच्छन्न और गुप्त बताया है।

३. विद्या के द्वारा व्यक्ति मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है, इसीलिए इसे सबसे बड़ा देवता बताया गया है।

४. विद्या का अनेक रूपों में वर्णन करने के कारण मालारूपक अलंकार - लक्षण इस प्रकार है—

श्रौता आर्थाश्च ते यस्मिन्नेकदेशविवर्ति तत्।
साङ्गमेतत् निरङ्गन्तु शुद्धं माला तु पूर्ववत्॥

५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण पूर्व श्लोक में उल्लिखित है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्रच्छन्नं च गुप्तं च तत् धनम् (द्वन्द्व समास) प्र + √छद् + क्त। √गुप् + क्त।
२. भोगं करोति इति √भुज् + घञ् = भोग + √कृ + अप् + ङीप् = भोगकरी

नीतिशतकम् २९

३. विद्यया विहीनः (पञ्चमी तत्पुरुष) = विद्याविहीनः
४. वि + √हा + क्त = विहीनः
५. √पूज् + क्त + टाप् = पूजिता
६. सुख + √कृ + अप् + ङीप् = सुखकरी
७. बन्धुजनः + विदेश गमने (विसर्ग, हशि च)

क्षान्तिश्चेत् कवचेन किं किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद् देहिनाम्,
ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद् दिव्यौषधैः किं फलम्।
किं सर्पैर्यदि दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या यदि,
व्रीडा चेत्किमु भूषणैः सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम्॥२२॥

अन्वय- देहिनाम् चेत् क्षान्तिः कवचेन किम्, चेत् क्रोधः अस्ति, अरिभिः किम्, चेत् ज्ञातिः, अनलेन किम्, यदि सुहृद् दिव्यौषधैः किम् फलम्, यदि दुर्जनाः, सर्पैः किम्, यदि अनवद्या विद्या, धनैः किमु चेत् व्रीडा भूषणैः किमु, यदि सुकविता अस्ति, राज्येन किम्।

अनुवाद- देहधारियों के (पास) यदि क्षमा है (तो) कवच से क्या (लाभ), यदि क्रोध है (तो) शत्रुओं से क्या, यदि सम्बन्धी हैं तो अग्नि से क्या, यदि मित्र है तो उत्तम औषधियों से क्या लाभ, यदि दुर्जन हैं तो सर्पों से क्या, यदि प्रशंसनीय विद्या है तो धनों से क्या और यदि लज्जा है तो आभूषणों से क्या (लाभ) और यदि सुन्दर कविता है तो राज्य से क्या (लाभ) ?

व्याख्या- यदि व्यक्ति के पास क्षमा करने का गुण विद्यमान है तो उसे किसी भी कवच को धारण करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसकी शत्रुता किसी से होगी ही नहीं, किसी भी व्यक्ति के गलती करने पर वह उसे क्षमा कर देगा।

इसी प्रकार यदि व्यक्ति क्रोधी है तो उसे शत्रुओं को अपने साथ रखने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि क्रोध ही व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु होता है, इसके कारण व्यक्ति अपने मित्रों को भी शत्रु बना लेता है।

यदि मनुष्य के पास उसके सम्बन्धी रहते हैं तो उसे आग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि सम्बन्धी लोग आपस में आग लगाने में निपुण होते हैं। आग से अभिप्राय यहाँ झगड़े से है।

और यदि व्यक्ति के पास उसके श्रेष्ठ मित्र हैं तो निश्चय ही उसे श्रेष्ठ औषधियों को इकट्ठा करने में अपना समय नहीं गँवाना चाहिए। मित्र, कष्ट में, आपत्ति पड़ने पर औषधि का ही कार्य करता है।

यदि व्यक्ति दुर्जनों से घिरा है तो उसे सर्पों की कोई आवश्यकता नहीं है। दुर्जन सर्पों के समान ही उसके लिए हानिकर सिद्ध होगें और उसके विनाश का कारण बनेंगे।

३०श्रीभर्तृहरिविरचितम्

इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति के पास प्रशंसनीय विद्या है तो उसे धनसंग्रह करने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि कहा भी है— 'विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्।' इस संसार में लज्जा सबसे बड़ा आभूषण है, यदि व्यक्ति के पास लज्जा है तो उसे किसी भी आभूषण को धारण करने की आवश्यकता नहीं हैं।

यदि व्यक्ति श्रेष्ठ कविता बनाने में समर्थ है तो उसे किसी साम्राज्य की आवश्यकता नहीं है। श्रेष्ठ कवि होना किसी भी राज्य की प्राप्ति से भी बढ़कर है।

विशेष– १. यहाँ देहधारियों से अभिप्राय मनुष्यों से है, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष।

२. प्रस्तुत श्लोक में क्षमा सर्वोत्तम कवच, क्रोध सबसे बड़ा शत्रु, सम्बन्धी अग्नि स्वरूप, मित्र सर्वोत्तम औषधि, दुर्जन भयानक सर्प, विद्या सर्वोत्तम धन, लज्जा श्रेष्ठ आभूषण, श्रेष्ठ कवित्व शक्ति राज्यप्राप्ति स्वरूप प्रतिपादित किए गए हैं।

३. यदि व्यक्ति उक्त श्लोक को व्यवहार में उतार ले तो उसे कभी किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी।

४. प्रस्तुत श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण पूर्व श्लोक में लिखा हुआ है।

५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–

१. देह + इनि = देहिन् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन)
२. √क्षम् + क्तिन् = क्षान्ति (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. √ज्ञा + क्तिन् = ज्ञातिः (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. दिव्य + ओषधैः = दिव्यौषधैः (वृद्धि, वृद्धिरेचि)
५. किम् शब्द से यहाँ फल, लाभ अथवा प्रयोजन अर्थ लेना चाहिए।
६. किम् के अन्त में प्रयुक्त उ को समुच्चयवाची मानना अधिक उपयुक्त है।
७. अनवद्या– न वद्या इति अवद्या न अवद्या इति, (नञ् समास)

दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने¹ शाठ्यं सदा दुर्जने,
प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जनेष्वार्जवम्।
शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता,
ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः॥२३॥


१. परजने

नीतिशतकम् ३१

अन्वय- स्वजने दाक्षिण्यम्, परिजने दया, दुर्जने सदा शाठ्यम् साधुजने प्रीतिः, नृपजने नयः, विद्वज्जनेषु आर्जवम्, शत्रुजने शौर्यम्, गुरुजने क्षमा, नारीजने धूर्तता च ये पुरुषाः एवं कलासु कुशलाः तेषु एव लोकस्थितिः (वर्तते)।

अनुवाद- बंधुजनों में उदारता, सेवकों पर दया, दुष्टों के प्रति सदा शठता, सज्जनों के प्रति प्रेम, राजा के प्रति नीति, विद्वज्जनों के प्रति सरलता, शत्रुओं के प्रति वीरता, गुरुओं के प्रति क्षमा और नारियों के प्रति धूर्तता (का आचरण) जो पुरुष इस प्रकार कलाओं में कुशल हैं, उनमें ही लोकमर्यादा (बनी रहती है)।

व्याख्या- यदि मनुष्य इस संसार में सफल होना चाहता है तो उसे अपना व्यवहार भिन्न-भिन्न लोगों के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार करना चाहिए, पुनः किसके साथ कैसा व्यवहार करे। इसी का कथन करते हुए कवि कहता है कि— व्यक्ति को अपने बन्धुओं, आत्मीयों के प्रति अत्यन्त उदारतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए, अपने सेवकों के प्रति दयाभाव रखते हुए आचरण करना चाहिए क्योंकि क्रूरता के आचरण से सेवकों के विरोधी होने की सम्भावना रहती है।

इसी प्रकार दुर्जनों के प्रति दुष्टतापूर्वक आचरण से ही वे नियन्त्रित रहते हैं, सज्जनों के प्रति प्रेम पूर्ण व्यवहार ही उचित है। जब भी राजा के साथ व्यवहार करना हो तो नीति के अनुसार ही करना चाहिए, विद्वानों के साथ कभी भी व्यक्ति को कुटिल आचरण नहीं करना चाहिए, अपितु सरलतापूर्वक ही बर्तना चाहिए।

शत्रुओं के साथ वीरतापूर्वक व्यवहार ही व्यक्ति को सामर्थ्यशाली बनाता है, जो हमसे विद्या में बढ़े हुए हैं अथवा आयु में बड़े हैं, उन गुरुओं के प्रति, सदैव उनके द्वारा नाराज होने पर भी क्रोधित न होते हुए क्षमापूर्वक आचरण करना चाहिए। स्त्रियों के साथ सरलता का व्यवहार व्यक्ति के नाश का कारण बनता है। अतः उनके साथ धूर्तता, अत्यन्त चालाकी-पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।

अन्त में कवि कहता है कि इस संसार में जो लोग इस प्रकार व्यवहार करने की कला में निपुण हैं, उनके कारण ही समाज में संतुलन रूप मर्यादा बनी रहती है, अन्यथा अव्यवस्था की पूरी-पूरी सम्भावना है।

विशेष- १. व्यक्ति को इस संसार में किसके साथ कैसा व्यवहार करना उचित है, इसका अत्यन्त सुन्दर चित्रण प्रस्तुत श्लोक में किया गया है।

२. स्त्रियों के प्रति धूर्तता के आचरण की बात सम्भवतः कवि ने अपनी जीवन में कटु अनुभव के कारण कही है।

३. दुर्जनों के प्रति शठता की बात "शठे शाठ्यं समाचरेत्" में भी कही गई है।

४. लोकव्यवहारकुशल बनने के लिए, जीवन में सफल होने के लिए, श्लोक के अनुसार आचरण अत्यावश्यक है।

५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है।

३२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

६ परिजन का अर्थ सेवक और सम्बन्धी दोनों किया जा सकता है। ७. काव्यलिंग अलंकार

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. दक्षिण + ष्यञ् (नपु. प्र.वि., ए.व.) दाक्षिण्यम् २. शठ + ष्यञ् (नपु., प्र.वि., ए.व.) शाठ्यम् ३. √प्रीञ् + क्तिन् (प्र.वि., ए.व.) प्रीतिः ४. √नी + अच् (पु., प्र. वि., ए.व.) नयः ५. ऋ+जु + अण् (नपु., प्र. वि., ए.व.) आर्जवम् ६. शूर + ष्यञ् (नपु., प्र. वि., ए.व.) शौर्यम् ७. धूर्त + तल् + टाप् = धूर्तता ८. लोकानाम् स्थितिः = लोकस्थितिः (षष्ठी तत्पुरुष) ९. √स्था + क्तिन् (स्त्री., प्र. वि., ए.व.) स्थितिः १०. विद्वत् + जनेषु + आर्जवम् (व्यञ्जन संधि, यण्, संधि इकोयणचि) ११. च + एवम् (वृद्धि - वृद्धिरेचि) १२. कुशलाः + तेषु + एव (विसर्गः यण् - इकोयणचि)

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥२४॥

अन्वय- (सत्संगतिः) धियः जाड्यम् हरति, वाचि सत्यम् सिञ्चति, मानोन्नतिम् दिशति, पापम् अपाकरोति, चेतः प्रसादयति, दिक्षु कीर्तिम् तनोति, कथय, सत्संगति पुंसाम् किम् न करोति।

अनुवाद- (सत्संगति मनुष्य की) बुद्धि की मन्दता का हरण करती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, सम्मान और उन्नति को बढ़ाती है, पाप को दूर करती है, मन को प्रसन्न करती है, दिशाओं में कीर्ति फैलाती है, कहो तो सत्संगति मनुष्य का क्या नहीं करती ?

व्याख्या- सज्जनों की संगति से व्यक्ति का अनेक प्रकार से उपकार होता है, इसी का कथन करते हुए कवि कहता है कि- सत्संगति से बुद्धि की अज्ञानता, जड़ता दूर होती है, वाणी सज्जनों के साथ रहकर उनका अनुकरण करते हुए सदैव सत्य भाषण ही करती है। जब व्यक्ति सज्जनों के साथ रहता है तो उसका समाज में सम्मान व प्रतिष्ठा बढ़ती है, जिससे वह उन्नति को प्राप्त करता है।

नीतिशतकम् ३३

सज्जनों के साथ रहने से व्यक्ति पापपूर्ण कार्यों से दूर ही रहता है। अनुचित कार्य न करने तथा अच्छे-अच्छे कार्यों के करने से मनुष्य का मन प्रसन्न रहता है, अच्छे-अच्छे काम करने से संसार में व्यक्ति का नाम होता है, चारों दिशाओं में उसका यश फैलता है।

इस प्रकार मुझे जरा बताओ तो सही सत्संगति से मनुष्य का क्या भला नहीं होता अर्थात् सज्जन लोगों के साथ रहने में व्यक्ति को लाभ ही लाभ है, हानि तो एक भी दिखाई नहीं देती है।

विशेष- १. सत्संगति की अत्यन्त सुन्दर शब्दों में, तर्क पद्धति के द्वारा प्रशंसा की गई है।

२. यदि व्यक्ति को इस संसार में अपना जीवन सफल बनाना है तो उसे सज्जनों की संगति ही करनी चाहिए।

३. प्रस्तुत श्लोक में सत्संगति की प्रशंसा में अनेक हेतुओं का कथन किया गया है। अतः समुच्चय अलंकार लक्षण इस प्रकार है—

तत्सिद्धिहेतावेकस्मिन् यत्रान्यत् तत्करं भवेत्। समुच्चयोऽसौ॥ (काव्य प्रकाश)

४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौगः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. धी + ङस् (षष्ठी वि., ए.व.)
२. मानस्य उन्नतिम्, मानोन्नतिम् (षष्ठी तत्पुरुष) √मन् + घञ् = मानः, उत् + √नम् + क्तिन् = उन्नतिः
३. √दिश् + तिप् = दिशति (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.)
४. संताम् संगतिः = सत्संगति (षष्ठी तत्पुरुष) सत् + √गम् + क्तिन् (प्र.वि., ए.व.)
५. धियः हरति = धियोहरति (विसर्ग - हशि च)
६. √तनु - (विस्तरणे) + तिप् = तनोति (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.)
७. जडस्य भावः, जाड्यम्, जड + ष्यञ्
८. प्र + √सद् + णिच् (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.) प्रसादयति
९. अप + च्वि + √कृ + तिप् (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.) अपाकरोति

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयम्॥२५॥

अन्वय- ते सुकृतिनः रससिद्धाः कवीश्वराः जयन्ति, येषाम् यशःकाये जरा मरणजम् भयम् न अस्ति।

३४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- वे पुण्यात्मा, रस-सिद्ध, कविश्रेष्ठ सर्वोत्कृष्ट हैं। जिनके यश रूपी शरीर में वृद्धावस्था और मरण से उत्पन्न भय नहीं है।

व्याख्या- सभी प्रकार के काव्यरसों से युक्त रचना कर्म में कुशल, कवियों में अग्रणी वे पुण्यशाली महाकवि ही वस्तुतः सर्वोत्कृष्ट एवं प्रशंसा के योग्य हैं, जिनके नश्वर शरीर के विनाश होने के बाद भी यश रूपी शरीर की स्थिति बनी रहती है और इस यशः शरीर की एक विशेषता है कि यह शरीर न तो कभी बूढ़ा ही होता है और न ही इस का कभी मरण ही होता है।

कहने का तात्पर्य है कि उत्कृष्ट काव्यरचना में कुशल महाकवि वास्तव में पुण्यात्मा है अन्यथा काव्यशक्ति इस संसार में जन्म लेने वाले सभी लोगों को प्राप्त नहीं होती है और ऐसे अँगुलीगण्य महाकवि पञ्चतत्त्वों से बने इस नश्वर शरीर के नष्ट होने पर भी अपनी कीर्ति रूपी शरीर में सदैव युवावस्था में विद्यमान होकर जीवित रहते हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में प्रयुक्त 'जयति' पद सर्वोत्कृष्टता का प्रतिपादन करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।

२. यशः काये में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

३. पुण्यात्मा ही रससिद्ध महाकवि होता है। सभी को इस सौभाग्य की प्राप्ति नहीं होती।

४. यशः शरीर सदैव अमर और जरारहित रहता है। आज भी कालिदास जैसे महाकवि यशः शरीर से हमारे मध्य विराजमान हैं।

५. प्रस्तुत श्लोक का एक अन्य अर्थ वैद्य पक्ष में भी हो सकता है जो इस प्रकार है— “वे पुण्यात्मा रस रचना में निपुण वैद्यराज सर्वोत्कृष्ट हैं। जिनके शरीर में वृद्धावस्था और मृत्यु से उत्पन्न भय नहीं होते हैं।” इसी कारण—

६. प्रस्तुत श्लोक में समासोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है—लक्षण इस प्रकार है—

यत्रोक्ताद् गम्यतेऽन्योऽर्थस्तत्समान विशेषणः।
सा समासोक्तिरुदिता संक्षेपार्थतया बुधैः।। (अग्निपुराण)

७. श्लोक का द्वितीय चरण प्रथम चरण के कथन को पुष्ट करने के लिए हेतु रूप में प्रयुक्त होने से काव्यलिंग अलंकार—

हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्।। (साहित्यदर्पण)

८. प्रस्तुत श्लोक में अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—

श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः।।

नीतिशतकम् ३५

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √जि (जये) + झि = जयन्ति (लट् लकार, प्र. पु., बहु. व.)
२. सुकृत + इनि = सुकृतिन् (पु., प्र. वि., बहु. व.)
३. रसेषु सिद्धाः, रससिद्धाः (सप्तमी तत्पुरुष)
४. कविषु ईश्वराः, कवीनाम् ईश्वराः (षष्ठी या सप्तमी तत्पुरुष)
५. यशः एव कायः, यशः कायः, तस्मिन् यशः काये
६. √भी + अच् (नपु., प्र. वि., ए.व.)
७. जरा च मरणम् च जरामरणे, ताभ्याम् जायते इति जरामरणजम्
८. न + अस्ति = नास्ति (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)
९. कवि + ईश्वराः = कवीश्वराः (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)

को लाभो गुणिसङ्गमः किमसुखं प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः,
का हानिः समयच्युतिर्निपुणता का धर्मतत्त्वे रतिः।
कः शूरो विजितेन्द्रियः प्रियतमा काऽनुव्रता किं धनं,
विद्या किं सुखमप्रवासगमनं राज्यं किमाज्ञाफलम्॥२६॥

अन्वय- लाभः कः ? गुणिसङ्गमः, असुखम् किम् ? प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः, हानिः का ? समयच्युतिः, निपुणता का ? धर्मतत्त्वे रतिः, शूरः कः ? विजितेन्द्रियः, प्रियतमा का ? अनुव्रता, दानम् किम्? विद्या, सुखम् किम्? अप्रवासगमनम्, राज्यम् किम् ? आज्ञाफलम्।

अनुवाद- लाभ क्या (है)? गुणवानों की सङ्गति। दुःख क्या (है)? मूर्खों की सङ्गति। हानि क्या (है)? अवसर खो देना। निपुणता क्या (है)? धर्मतत्त्व में अनुराग। शूर कौन (है)? इन्द्रियों को जीतने वाला। प्रियतमा कौन (है)? अनुकूल आचरण करने वाली (स्त्री)। धन क्या (है)? विद्या। सुख क्या (है)? देश से बाहर न जाना। राज्य क्या (है)? आज्ञा का पालन।

व्याख्या- कवि सुख-दुःख, लाभ-हानि आदि की भिन्न, किन्तु अत्यन्त सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहता है कि—

इस संसार में यदि व्यक्तियों को गुणवान् लोगों का सान्निध्य प्राप्त हो सके तो इसे सबसे बड़ा लाभ मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि मनुष्य को किसी भी कारण मूर्खों के साथ रहना पड़ता है तो यह उसके लिए सर्वाधिक कष्ट अथवा दुःख का विषय है।

ठीक इसी प्रकार यदि व्यक्ति किसी भी कार्य को करने का अवसर खो देता है तो यह उसके लिए सबसे बड़ी हानि है और यदि मनुष्य का धर्म के प्रति प्रेम है तो यह उसकी सबसे बड़ी निपुणता मानी जाएगी। जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया वह सबसे बड़ा शूरवीर कहलाने का अधिकारी है।

३६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

इस प्रकार ही यदि कोई स्त्री पति के अथवा अपने प्रेमी के मन, वचन और कर्म से अनुकूल आचरण करने वाली है तो वही वस्तुतः प्रियतमा कहलाने की अधिकारिणी है। इसी प्रकार इस संसार में सबसे बड़ा धन, विद्या ही है और यदि किसी व्यक्ति को किसी भी कारण अपने देश, अपनी मातृभूमि को न छोड़ना पड़े वही सबसे बड़ा सुख है और यदि व्यक्ति की सर्वत्र आज्ञा प्रभावशाली होती है तो समझना चाहिए कि उसके पास सबसे बड़ा, विशाल राज्य है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में लाभादि को आध्यात्मिक दृष्टि से अवलोकन किया गया है। २. कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। ३. विद्या को अन्यत्र भी सबसे बड़ा धन बताया गया है— विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्। ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √लभ् + घञ् = लाभः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) २. गुणिभिः सह सङ्गमः, गुणिसङ्गमः ३. न सुखम् इति असुखम् (नञ् समास) ४. प्राज्ञेभ्यः इतरैः, प्राज्ञेतरैः ५. प्र + √ज्ञा + क = प्रज्ञः । प्रज्ञ + अण् = प्राज्ञः ६. √हा + क्तिन् = हानिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ७. समयात् च्युतिः = समयच्युतिः (पञ्चमी तत्पुरुष) ८. √रम् + क्तिन् = रतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. विजितानि इन्द्रियाणि येन सः (बहुव्रीहि) विजितेन्द्रियः १०. आज्ञा एव फलम् = आज्ञाफलम् (कर्मधारय) ११. सम् + √गम् + क्तिन् = सङ्गतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन

मानशौर्य पद्धतिः

क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि शिथिलप्रायोऽपि कष्टं दशा- मापन्नोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि। मत्तेभेन्द्रविभिन्न कुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः, किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी॥२७॥

नीतिशतकम् ३७

अन्वय- मत्तेभेन्द्रविभिन्न कुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः, मानमहताम् अग्रेसरः केसरी, क्षुतक्षामः अपि, जरा- कृशः अपि, शिथिलप्रायः अपि, कष्टाम् दशाम् आपन्नः अपि, विपन्नदीधितिः अपि, प्राणेषु, नश्यत्सु अपि किम् जीर्णम् तृणम् अत्ति।

अनुवाद- मदमस्त गजराज के विदीर्ण मस्तक के कौर को खाने में बंधी हुई है एक मात्र चाह जिसकी, स्वाभिमानियों में अग्रणी केसरी, भूख से कमजोर होने पर भी, बुढ़ापे से दुर्बल होने पर भी, पूरी तरह ढीला होने पर भी, कष्टकारी दशा में पड़ने पर भी कान्ति के नष्ट होने पर भी (यहाँ तक कि) प्राणों के नष्ट होने पर भी क्या सूखे तिनके खाता है।

व्याख्या- स्वाभिमानियों में सदैव आगे रहने वाला केसरी शेर (गर्दन पर बड़े-बड़े आयालों वाला) भले ही भूख के कारण कितना भी कमजोर क्यों न हो जाए, वृद्धावस्था के कारण उठने लायक, शिकार करने योग्य भी क्यों न रहे, किसी भी रोगादि के कारण उसके अंग-अंग ढीले क्यों न पड़ जाएँ। कितनी भी कष्टकारी स्थिति में क्यों न फंस जाए। उसकी कान्ति एवं तेज पूर्णरूप से समाप्त क्यों न हो जाए। यहाँ तक कि उसके प्राण ही गले तक क्यों न आ जाएँ अर्थात् प्राण निकलने की नौबत भी क्यों न आ जाए। क्या अत्यधिक शक्तिशाली, जिसके गण्डस्थलों से मद बह रहा है ऐसे हाथी के विशाल मस्तक पर वीरतापूर्वक आक्रमण करके नोचे गए मांस के टुकड़े को खाने का इच्छुक केसरी शेर, सूखे तिनकों को खाकर अपनी भूख शान्त करता है अर्थात् नहीं।

ठीक इसी प्रकार स्वयं के परिश्रम, योग्यता एवं क्षमता से अर्जन करके खाने वाला स्वाभिमानी व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप वस्तु को ही खाता है, किसी की कृपा से अपने स्वाभिमान के विपरीत आचरण नहीं करता है, भले ही भूख से कमजोर क्यों न हो जाए, उसके अंग-अंग ढीले क्यों न हो जाएँ, यहाँ तक कि प्राण ही क्यों न निकल जाएँ।

विशेष- १. यहाँ केसरी स्वाभिमानी व्यक्ति का प्रतीत है, जो किसी भी परिस्थिति में स्वाभिमान की रक्षा करता है।
२. केसरी का यह स्वभाव है कि वह किसी अन्य द्वारा मारे हुए अथवा छोटे-मोटे प्राणियों के मांस से अपनी क्षुधा शान्त नहीं करता, अपितु वह तो प्रत्येक परिस्थिति में शक्तिशाली हाथी पर आक्रमण करके अपना शिकार करता है।
३. केसरी शेर के गर्दन पर बड़े-बड़े बाल होते हैं, जिन्हें आयाल कहते हैं।
४. उत्कृष्ट श्रेणी के शक्तिशाली हाथी की कनपटियों से सुगन्धित द्रव बहता है, जिसे मद कहते हैं।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. क्षुधया क्षामः (तृतीया तत्पुरुष) क्षुत्क्षामः + अपि = क्षुत्क्षामोऽपि
२. जरया कृशः (तृतीया तत्पुरुष) जराकृशः + अपि = जराकृशोऽपि

३८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

३. आ + √पद् + क्त (पुंल्लिग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) आपन्नः ४. विपन्ना दीधितिः यस्य सः (बहुव्रीहि) विपन्नदीधितिः। वि + √पद् + क्त = विपन्नः ५. √मद् + क्त = मत्तः ६. मत्त + इभ + इन्द्र (गुण, आद् गुणः) ग्रास + एक बद्धः (वृद्धि, वृद्धिरेचि) ७. वि + √भिद् + क्त = विभिन्नः ८. √ग्रस् + घञ् = ग्रासः ९. मानम् एव महत् येषाम् तेषाम् = मानमहताम् १०. अग्रेसरति इति अग्रेसरः ११. केसर + इनि = केसरिन् (पुंल्लिग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) केसरी १२. √जॄ + क्त (नपु. प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १३. √अद् + तिप् = अत्ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १४. √स्पृह + क्त = स्पृहः

स्वल्पस्नायुवसावशेष मलिनं¹ निर्मांसमपि अस्थिकं²,
श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये।
सिंहो जम्बुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं,
सर्वः कृच्छ्र गतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥२८॥

अन्वय- श्वा स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनम् निर्मांसम् अपि अस्थिकम् लब्ध्वा परितोषम् एति, तत् तु तस्य क्षुधाशान्तये न। सिंहः अङ्कम् आगतम् अपि जम्बुकम् त्यक्त्वा द्विपम् हन्ति। कृच्छ्रगतः अपि सर्वः जनः सत्वानुरूपम् फलम् वाञ्छति।

अनुवाद- कुत्ता, थोडे से स्नायु और चरबी के बचे हुए (भाग से) मलिन, मांस रहित भी छोटे से हड्डी के टुकड़े को प्राप्त करके संतुष्ट हो जाता है, किन्तु वह (टुकड़ा) उसकी भूख को शान्त करने के लिए नहीं होता (इसके विपरीत) शेर गोद में आए हुए भी गीदड़ को छोड़कर, हाथी को मारता है। विपत्ति में पड़े हुए भी सभी लोग (अपने) स्वाभिमान के अनुरूप ही फल चाहते हैं।

व्याख्या- इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं— प्रथम वे जो कुछ तुच्छ भी प्राप्त करके संतुष्ट होकर बैठ जाते हैं। इसके विपरीत दूसरे वे जो अपनी शक्ति एवं स्वभाव के अनुरूप ही वस्तु को प्राप्त करने पर संतुष्ट होते हैं, भले ही उसके लिए उन्हें कितना ही परिश्रम क्यों न करना पड़े।


१. स्वल्पं स्नायुवसावसेक (थोड़े से स्नायु और चर्बी से लिपटे)
२. अस्थिगोः (गाय की हड्डी)