नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
(ही) राजाओं में पूजी जाती है, न कि धन। (वास्तव में) विद्या से हीन (व्यक्ति) पशु (ही है)।
व्याख्या- विद्या की प्रशंसा करते हुए कवि कहता है कि विद्या व्यक्ति का सबसे बड़ा सौन्दर्य है, वस्तुतः सुन्दरतम वही व्यक्ति है जो सर्वाधिक विद्वान् है। इसी प्रकार विद्या सर्वाधिक गोपनीय छिपा हुआ खजाना है। कौन व्यक्ति कितना ज्ञानवान् है, इसका पता तभी चलता है, जब वह बोलता है और उसका अन्य कोई मापदण्ड नहीं होता। विद्या मनुष्य को धन, ऐश्वर्य एवं भोगों को प्रदान करती है, विद्या के बल पर व्यक्ति बड़े से बड़े पद पर पहुँच जाता है, अधिक से अधिक धन कमाने में समर्थ होता है। इसी प्रकार विद्या के द्वारा व्यक्ति यशस्वी होता है वह कितना विद्वान् है, इस रूप में उसकी कीर्ति दिग्दिगन्त में फैलती है। विद्या के माध्यम से व्यक्ति सुखों को प्राप्त करता है।
वस्तुतः विद्या गुरु से भी ऊपर अर्थात् श्रेष्ठ है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति 'गुरु' विद्या के द्वारा ही बनता है। यदि मनुष्य को विदेश में जाना पड़े तो विद्या उसकी सर्वाधिक आत्मीय भाई के समान हितकारिणी होती है। इसी प्रकार विद्या सभी देवताओं में सर्वोच्च देवता है।
राजा भी विद्वानों का ही सम्मान करते हैं। हमेशा देखने में आया है कि विद्वान् का राजा लोग अपने सिंहासन से उतरकर भी सम्मान करते हैं, धनवान् का नहीं और अन्त में कवि कहता है कि यदि कोई व्यक्ति विद्या से रहित है तो वह मनुष्य कहलाने का ही अधिकारी नहीं है, वह तो वस्तुतः पशु ही है।
विशेष- १. इस संसार में विद्या को ही सर्वोच्च बताया गया है। विद्या के द्वारा व्यक्ति यहाँ सब कुछ प्राप्त कर सकता है, यहाँ तक कि परमात्मा को प्राप्त करने में भी विद्या ही सहायक होती हैं।
२. विद्या रूपी धन व्यक्ति के मस्तिष्क में रहता है, अतः उसकी थाह पाना एकदम असम्भव है। अतः इसे यह प्रच्छन्न और गुप्त बताया है।
३. विद्या के द्वारा व्यक्ति मोक्ष को भी प्राप्त कर लेता है, इसीलिए इसे सबसे बड़ा देवता बताया गया है।
४. विद्या का अनेक रूपों में वर्णन करने के कारण मालारूपक अलंकार - लक्षण इस प्रकार है—
श्रौता आर्थाश्च ते यस्मिन्नेकदेशविवर्ति तत्।
साङ्गमेतत् निरङ्गन्तु शुद्धं माला तु पूर्ववत्॥
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण पूर्व श्लोक में उल्लिखित है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्रच्छन्नं च गुप्तं च तत् धनम् (द्वन्द्व समास) प्र + √छद् + क्त। √गुप् + क्त।
२. भोगं करोति इति √भुज् + घञ् = भोग + √कृ + अप् + ङीप् = भोगकरी