भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 194 में से

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पृष्ठ 51

नीतिशतकम् २९

३. विद्यया विहीनः (पञ्चमी तत्पुरुष) = विद्याविहीनः
४. वि + √हा + क्त = विहीनः
५. √पूज् + क्त + टाप् = पूजिता
६. सुख + √कृ + अप् + ङीप् = सुखकरी
७. बन्धुजनः + विदेश गमने (विसर्ग, हशि च)

क्षान्तिश्चेत् कवचेन किं किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद् देहिनाम्,
ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद् दिव्यौषधैः किं फलम्।
किं सर्पैर्यदि दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या यदि,
व्रीडा चेत्किमु भूषणैः सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम्॥२२॥

अन्वय- देहिनाम् चेत् क्षान्तिः कवचेन किम्, चेत् क्रोधः अस्ति, अरिभिः किम्, चेत् ज्ञातिः, अनलेन किम्, यदि सुहृद् दिव्यौषधैः किम् फलम्, यदि दुर्जनाः, सर्पैः किम्, यदि अनवद्या विद्या, धनैः किमु चेत् व्रीडा भूषणैः किमु, यदि सुकविता अस्ति, राज्येन किम्।

अनुवाद- देहधारियों के (पास) यदि क्षमा है (तो) कवच से क्या (लाभ), यदि क्रोध है (तो) शत्रुओं से क्या, यदि सम्बन्धी हैं तो अग्नि से क्या, यदि मित्र है तो उत्तम औषधियों से क्या लाभ, यदि दुर्जन हैं तो सर्पों से क्या, यदि प्रशंसनीय विद्या है तो धनों से क्या और यदि लज्जा है तो आभूषणों से क्या (लाभ) और यदि सुन्दर कविता है तो राज्य से क्या (लाभ) ?

व्याख्या- यदि व्यक्ति के पास क्षमा करने का गुण विद्यमान है तो उसे किसी भी कवच को धारण करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसकी शत्रुता किसी से होगी ही नहीं, किसी भी व्यक्ति के गलती करने पर वह उसे क्षमा कर देगा।

इसी प्रकार यदि व्यक्ति क्रोधी है तो उसे शत्रुओं को अपने साथ रखने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि क्रोध ही व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु होता है, इसके कारण व्यक्ति अपने मित्रों को भी शत्रु बना लेता है।

यदि मनुष्य के पास उसके सम्बन्धी रहते हैं तो उसे आग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि सम्बन्धी लोग आपस में आग लगाने में निपुण होते हैं। आग से अभिप्राय यहाँ झगड़े से है।

और यदि व्यक्ति के पास उसके श्रेष्ठ मित्र हैं तो निश्चय ही उसे श्रेष्ठ औषधियों को इकट्ठा करने में अपना समय नहीं गँवाना चाहिए। मित्र, कष्ट में, आपत्ति पड़ने पर औषधि का ही कार्य करता है।

यदि व्यक्ति दुर्जनों से घिरा है तो उसे सर्पों की कोई आवश्यकता नहीं है। दुर्जन सर्पों के समान ही उसके लिए हानिकर सिद्ध होगें और उसके विनाश का कारण बनेंगे।