नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३० | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति के पास प्रशंसनीय विद्या है तो उसे धनसंग्रह करने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि कहा भी है— 'विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्।' इस संसार में लज्जा सबसे बड़ा आभूषण है, यदि व्यक्ति के पास लज्जा है तो उसे किसी भी आभूषण को धारण करने की आवश्यकता नहीं हैं।
यदि व्यक्ति श्रेष्ठ कविता बनाने में समर्थ है तो उसे किसी साम्राज्य की आवश्यकता नहीं है। श्रेष्ठ कवि होना किसी भी राज्य की प्राप्ति से भी बढ़कर है।
विशेष– १. यहाँ देहधारियों से अभिप्राय मनुष्यों से है, चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष।
२. प्रस्तुत श्लोक में क्षमा सर्वोत्तम कवच, क्रोध सबसे बड़ा शत्रु, सम्बन्धी अग्नि स्वरूप, मित्र सर्वोत्तम औषधि, दुर्जन भयानक सर्प, विद्या सर्वोत्तम धन, लज्जा श्रेष्ठ आभूषण, श्रेष्ठ कवित्व शक्ति राज्यप्राप्ति स्वरूप प्रतिपादित किए गए हैं।
३. यदि व्यक्ति उक्त श्लोक को व्यवहार में उतार ले तो उसे कभी किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी।
४. प्रस्तुत श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण पूर्व श्लोक में लिखा हुआ है।
५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. देह + इनि = देहिन् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन)
२. √क्षम् + क्तिन् = क्षान्ति (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. √ज्ञा + क्तिन् = ज्ञातिः (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. दिव्य + ओषधैः = दिव्यौषधैः (वृद्धि, वृद्धिरेचि)
५. किम् शब्द से यहाँ फल, लाभ अथवा प्रयोजन अर्थ लेना चाहिए।
६. किम् के अन्त में प्रयुक्त उ को समुच्चयवाची मानना अधिक उपयुक्त है।
७. अनवद्या– न वद्या इति अवद्या न अवद्या इति, (नञ् समास)
दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने¹ शाठ्यं सदा दुर्जने,
प्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जनेष्वार्जवम्।
शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता,
ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः॥२३॥
१. परजने