नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् २५
किसी भी स्थिति में वह उस व्यक्ति की योग्यता क्षमता अथवा निपुणता, विद्या आदि को नहीं छीन सकता है। अपनी उस योग्यता के कारण तो वह जगत् में निश्चय ही प्रसिद्धि को प्राप्त करेगा।
विशेष- १. व्यक्ति के अपने गुणों के कारण प्राप्त कीर्ति स्थायी होती है, उसका कोई भी हननं करने में समर्थ नहीं है। अतः व्यक्ति को सदैव अपनी योग्यता में वृद्धि करनी चाहिए।
२. यहाँ ब्रह्मा से सामर्थ्यशाली राजा तथा हंस से लब्धकीर्ति विद्वान् के अर्थों की भी व्यंग्यार्थ से प्रतीति हो रही है।
३. यहाँ अप्रस्तुत विधाता और हंस के कथन द्वारा प्रस्तुत राजा और विद्वान् के अर्थ की अभिव्यक्ति होने का कारण अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-
अप्रस्तुतस्य कथनात् प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुतप्रशंसेयं सारूप्यादि नियन्त्रिता॥
४. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है- लक्षण इस प्रकार है-
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
५. विद्वान् वस्तुतः राजा से भी बढ़कर है- 'स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते', इसी भाव की इस श्लोक में अभिव्यक्ति हो रही है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √धा + तृच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = विधाता
२. वि + √लस् + घञ् = विलासः
३. √दुह् + क्त = दुग्ध
४. √भिद् + घञ् = भेदः
५. वि + √दह् + क्त = विदग्ध + ष्यञ् = वैदग्ध्य
६. √कृत् + इन् = कीर्तिः
७. अप + √हृ + तुमुन् = अपहर्तुम्
८. कुपितः + विधाता = कुपितो विधाता (विसर्गः संधि-हशि च)
९. त्वस्य = तु + अस्य = (यण्, इकोयणचि)
१०. अम्भोजिनीनाम् वने विहारस्य विलासम् = अम्भोजिनीवनविहारविलासम्
११. दुग्धं च जलं च दुग्धजले (द्वन्द्व समास) तयोः भेदस्य विधौ दुग्धजलभेदविधौ
केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।