भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् ३५

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √जि (जये) + झि = जयन्ति (लट् लकार, प्र. पु., बहु. व.)
२. सुकृत + इनि = सुकृतिन् (पु., प्र. वि., बहु. व.)
३. रसेषु सिद्धाः, रससिद्धाः (सप्तमी तत्पुरुष)
४. कविषु ईश्वराः, कवीनाम् ईश्वराः (षष्ठी या सप्तमी तत्पुरुष)
५. यशः एव कायः, यशः कायः, तस्मिन् यशः काये
६. √भी + अच् (नपु., प्र. वि., ए.व.)
७. जरा च मरणम् च जरामरणे, ताभ्याम् जायते इति जरामरणजम्
८. न + अस्ति = नास्ति (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)
९. कवि + ईश्वराः = कवीश्वराः (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)

को लाभो गुणिसङ्गमः किमसुखं प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः,
का हानिः समयच्युतिर्निपुणता का धर्मतत्त्वे रतिः।
कः शूरो विजितेन्द्रियः प्रियतमा काऽनुव्रता किं धनं,
विद्या किं सुखमप्रवासगमनं राज्यं किमाज्ञाफलम्॥२६॥

अन्वय- लाभः कः ? गुणिसङ्गमः, असुखम् किम् ? प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः, हानिः का ? समयच्युतिः, निपुणता का ? धर्मतत्त्वे रतिः, शूरः कः ? विजितेन्द्रियः, प्रियतमा का ? अनुव्रता, दानम् किम्? विद्या, सुखम् किम्? अप्रवासगमनम्, राज्यम् किम् ? आज्ञाफलम्।

अनुवाद- लाभ क्या (है)? गुणवानों की सङ्गति। दुःख क्या (है)? मूर्खों की सङ्गति। हानि क्या (है)? अवसर खो देना। निपुणता क्या (है)? धर्मतत्त्व में अनुराग। शूर कौन (है)? इन्द्रियों को जीतने वाला। प्रियतमा कौन (है)? अनुकूल आचरण करने वाली (स्त्री)। धन क्या (है)? विद्या। सुख क्या (है)? देश से बाहर न जाना। राज्य क्या (है)? आज्ञा का पालन।

व्याख्या- कवि सुख-दुःख, लाभ-हानि आदि की भिन्न, किन्तु अत्यन्त सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहता है कि—

इस संसार में यदि व्यक्तियों को गुणवान् लोगों का सान्निध्य प्राप्त हो सके तो इसे सबसे बड़ा लाभ मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि मनुष्य को किसी भी कारण मूर्खों के साथ रहना पड़ता है तो यह उसके लिए सर्वाधिक कष्ट अथवा दुःख का विषय है।

ठीक इसी प्रकार यदि व्यक्ति किसी भी कार्य को करने का अवसर खो देता है तो यह उसके लिए सबसे बड़ी हानि है और यदि मनुष्य का धर्म के प्रति प्रेम है तो यह उसकी सबसे बड़ी निपुणता मानी जाएगी। जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया वह सबसे बड़ा शूरवीर कहलाने का अधिकारी है।