नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- वे पुण्यात्मा, रस-सिद्ध, कविश्रेष्ठ सर्वोत्कृष्ट हैं। जिनके यश रूपी शरीर में वृद्धावस्था और मरण से उत्पन्न भय नहीं है।
व्याख्या- सभी प्रकार के काव्यरसों से युक्त रचना कर्म में कुशल, कवियों में अग्रणी वे पुण्यशाली महाकवि ही वस्तुतः सर्वोत्कृष्ट एवं प्रशंसा के योग्य हैं, जिनके नश्वर शरीर के विनाश होने के बाद भी यश रूपी शरीर की स्थिति बनी रहती है और इस यशः शरीर की एक विशेषता है कि यह शरीर न तो कभी बूढ़ा ही होता है और न ही इस का कभी मरण ही होता है।
कहने का तात्पर्य है कि उत्कृष्ट काव्यरचना में कुशल महाकवि वास्तव में पुण्यात्मा है अन्यथा काव्यशक्ति इस संसार में जन्म लेने वाले सभी लोगों को प्राप्त नहीं होती है और ऐसे अँगुलीगण्य महाकवि पञ्चतत्त्वों से बने इस नश्वर शरीर के नष्ट होने पर भी अपनी कीर्ति रूपी शरीर में सदैव युवावस्था में विद्यमान होकर जीवित रहते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में प्रयुक्त 'जयति' पद सर्वोत्कृष्टता का प्रतिपादन करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।
२. यशः काये में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।
३. पुण्यात्मा ही रससिद्ध महाकवि होता है। सभी को इस सौभाग्य की प्राप्ति नहीं होती।
४. यशः शरीर सदैव अमर और जरारहित रहता है। आज भी कालिदास जैसे महाकवि यशः शरीर से हमारे मध्य विराजमान हैं।
५. प्रस्तुत श्लोक का एक अन्य अर्थ वैद्य पक्ष में भी हो सकता है जो इस प्रकार है— “वे पुण्यात्मा रस रचना में निपुण वैद्यराज सर्वोत्कृष्ट हैं। जिनके शरीर में वृद्धावस्था और मृत्यु से उत्पन्न भय नहीं होते हैं।” इसी कारण—
६. प्रस्तुत श्लोक में समासोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है—लक्षण इस प्रकार है—
यत्रोक्ताद् गम्यतेऽन्योऽर्थस्तत्समान विशेषणः।
सा समासोक्तिरुदिता संक्षेपार्थतया बुधैः।। (अग्निपुराण)
७. श्लोक का द्वितीय चरण प्रथम चरण के कथन को पुष्ट करने के लिए हेतु रूप में प्रयुक्त होने से काव्यलिंग अलंकार—
हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्।। (साहित्यदर्पण)
८. प्रस्तुत श्लोक में अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—
श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः।।