नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
इस प्रकार ही यदि कोई स्त्री पति के अथवा अपने प्रेमी के मन, वचन और कर्म से अनुकूल आचरण करने वाली है तो वही वस्तुतः प्रियतमा कहलाने की अधिकारिणी है। इसी प्रकार इस संसार में सबसे बड़ा धन, विद्या ही है और यदि किसी व्यक्ति को किसी भी कारण अपने देश, अपनी मातृभूमि को न छोड़ना पड़े वही सबसे बड़ा सुख है और यदि व्यक्ति की सर्वत्र आज्ञा प्रभावशाली होती है तो समझना चाहिए कि उसके पास सबसे बड़ा, विशाल राज्य है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में लाभादि को आध्यात्मिक दृष्टि से अवलोकन किया गया है। २. कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। ३. विद्या को अन्यत्र भी सबसे बड़ा धन बताया गया है— विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्। ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √लभ् + घञ् = लाभः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) २. गुणिभिः सह सङ्गमः, गुणिसङ्गमः ३. न सुखम् इति असुखम् (नञ् समास) ४. प्राज्ञेभ्यः इतरैः, प्राज्ञेतरैः ५. प्र + √ज्ञा + क = प्रज्ञः । प्रज्ञ + अण् = प्राज्ञः ६. √हा + क्तिन् = हानिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ७. समयात् च्युतिः = समयच्युतिः (पञ्चमी तत्पुरुष) ८. √रम् + क्तिन् = रतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. विजितानि इन्द्रियाणि येन सः (बहुव्रीहि) विजितेन्द्रियः १०. आज्ञा एव फलम् = आज्ञाफलम् (कर्मधारय) ११. सम् + √गम् + क्तिन् = सङ्गतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन
मानशौर्य पद्धतिः
क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि शिथिलप्रायोऽपि कष्टं दशा- मापन्नोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि। मत्तेभेन्द्रविभिन्न कुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः, किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी॥२७॥