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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 194 में से

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पृष्ठ 59

नीतिशतकम् ३७

अन्वय- मत्तेभेन्द्रविभिन्न कुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः, मानमहताम् अग्रेसरः केसरी, क्षुतक्षामः अपि, जरा- कृशः अपि, शिथिलप्रायः अपि, कष्टाम् दशाम् आपन्नः अपि, विपन्नदीधितिः अपि, प्राणेषु, नश्यत्सु अपि किम् जीर्णम् तृणम् अत्ति।

अनुवाद- मदमस्त गजराज के विदीर्ण मस्तक के कौर को खाने में बंधी हुई है एक मात्र चाह जिसकी, स्वाभिमानियों में अग्रणी केसरी, भूख से कमजोर होने पर भी, बुढ़ापे से दुर्बल होने पर भी, पूरी तरह ढीला होने पर भी, कष्टकारी दशा में पड़ने पर भी कान्ति के नष्ट होने पर भी (यहाँ तक कि) प्राणों के नष्ट होने पर भी क्या सूखे तिनके खाता है।

व्याख्या- स्वाभिमानियों में सदैव आगे रहने वाला केसरी शेर (गर्दन पर बड़े-बड़े आयालों वाला) भले ही भूख के कारण कितना भी कमजोर क्यों न हो जाए, वृद्धावस्था के कारण उठने लायक, शिकार करने योग्य भी क्यों न रहे, किसी भी रोगादि के कारण उसके अंग-अंग ढीले क्यों न पड़ जाएँ। कितनी भी कष्टकारी स्थिति में क्यों न फंस जाए। उसकी कान्ति एवं तेज पूर्णरूप से समाप्त क्यों न हो जाए। यहाँ तक कि उसके प्राण ही गले तक क्यों न आ जाएँ अर्थात् प्राण निकलने की नौबत भी क्यों न आ जाए। क्या अत्यधिक शक्तिशाली, जिसके गण्डस्थलों से मद बह रहा है ऐसे हाथी के विशाल मस्तक पर वीरतापूर्वक आक्रमण करके नोचे गए मांस के टुकड़े को खाने का इच्छुक केसरी शेर, सूखे तिनकों को खाकर अपनी भूख शान्त करता है अर्थात् नहीं।

ठीक इसी प्रकार स्वयं के परिश्रम, योग्यता एवं क्षमता से अर्जन करके खाने वाला स्वाभिमानी व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप वस्तु को ही खाता है, किसी की कृपा से अपने स्वाभिमान के विपरीत आचरण नहीं करता है, भले ही भूख से कमजोर क्यों न हो जाए, उसके अंग-अंग ढीले क्यों न हो जाएँ, यहाँ तक कि प्राण ही क्यों न निकल जाएँ।

विशेष- १. यहाँ केसरी स्वाभिमानी व्यक्ति का प्रतीत है, जो किसी भी परिस्थिति में स्वाभिमान की रक्षा करता है।
२. केसरी का यह स्वभाव है कि वह किसी अन्य द्वारा मारे हुए अथवा छोटे-मोटे प्राणियों के मांस से अपनी क्षुधा शान्त नहीं करता, अपितु वह तो प्रत्येक परिस्थिति में शक्तिशाली हाथी पर आक्रमण करके अपना शिकार करता है।
३. केसरी शेर के गर्दन पर बड़े-बड़े बाल होते हैं, जिन्हें आयाल कहते हैं।
४. उत्कृष्ट श्रेणी के शक्तिशाली हाथी की कनपटियों से सुगन्धित द्रव बहता है, जिसे मद कहते हैं।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. क्षुधया क्षामः (तृतीया तत्पुरुष) क्षुत्क्षामः + अपि = क्षुत्क्षामोऽपि
२. जरया कृशः (तृतीया तत्पुरुष) जराकृशः + अपि = जराकृशोऽपि