भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 194 में से

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३८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

३. आ + √पद् + क्त (पुंल्लिग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) आपन्नः ४. विपन्ना दीधितिः यस्य सः (बहुव्रीहि) विपन्नदीधितिः। वि + √पद् + क्त = विपन्नः ५. √मद् + क्त = मत्तः ६. मत्त + इभ + इन्द्र (गुण, आद् गुणः) ग्रास + एक बद्धः (वृद्धि, वृद्धिरेचि) ७. वि + √भिद् + क्त = विभिन्नः ८. √ग्रस् + घञ् = ग्रासः ९. मानम् एव महत् येषाम् तेषाम् = मानमहताम् १०. अग्रेसरति इति अग्रेसरः ११. केसर + इनि = केसरिन् (पुंल्लिग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) केसरी १२. √जॄ + क्त (नपु. प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १३. √अद् + तिप् = अत्ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १४. √स्पृह + क्त = स्पृहः

स्वल्पस्नायुवसावशेष मलिनं¹ निर्मांसमपि अस्थिकं²,
श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये।
सिंहो जम्बुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं,
सर्वः कृच्छ्र गतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥२८॥

अन्वय- श्वा स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनम् निर्मांसम् अपि अस्थिकम् लब्ध्वा परितोषम् एति, तत् तु तस्य क्षुधाशान्तये न। सिंहः अङ्कम् आगतम् अपि जम्बुकम् त्यक्त्वा द्विपम् हन्ति। कृच्छ्रगतः अपि सर्वः जनः सत्वानुरूपम् फलम् वाञ्छति।

अनुवाद- कुत्ता, थोडे से स्नायु और चरबी के बचे हुए (भाग से) मलिन, मांस रहित भी छोटे से हड्डी के टुकड़े को प्राप्त करके संतुष्ट हो जाता है, किन्तु वह (टुकड़ा) उसकी भूख को शान्त करने के लिए नहीं होता (इसके विपरीत) शेर गोद में आए हुए भी गीदड़ को छोड़कर, हाथी को मारता है। विपत्ति में पड़े हुए भी सभी लोग (अपने) स्वाभिमान के अनुरूप ही फल चाहते हैं।

व्याख्या- इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं— प्रथम वे जो कुछ तुच्छ भी प्राप्त करके संतुष्ट होकर बैठ जाते हैं। इसके विपरीत दूसरे वे जो अपनी शक्ति एवं स्वभाव के अनुरूप ही वस्तु को प्राप्त करने पर संतुष्ट होते हैं, भले ही उसके लिए उन्हें कितना ही परिश्रम क्यों न करना पड़े।


१. स्वल्पं स्नायुवसावसेक (थोड़े से स्नायु और चर्बी से लिपटे)
२. अस्थिगोः (गाय की हड्डी)