भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 194 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

नीतिशतकम् ३९

इसी बात को कवि कुत्ते और शेर का उदाहरण देकर समझाता है— कुत्ता ऐसे छोटे से हड्डी के टुकड़े को पाने पर ही संतुष्ट हो जाता है भले ही उसमें जरा भी मांस नहीं हो, कितना भी गंदा क्यों न हो तथा स्नायु और चरबी लेशमात्र ही क्यों न लगा हो, हालाँकि यह टुकड़ा उसकी भूख को शान्त करने में समर्थ नहीं होता। इस प्रकार का स्वभाव, स्वाभिमान रहित और आलसी व्यक्ति का होता है।

इसके विपरीत गीदड़ शेर की गोद में स्वयं ही आकर क्यों न बैठ जाए और उससे उसे खाने की स्वयं ही प्रार्थना क्यों न करे। वह उसे त्याग कर अपने स्वभाव एवं स्वाभिमान के अनुरूप हाथी को मारकर ही अपनी भूख को शान्त करता है। भले ही इसमें वह स्वयं भी घायल क्यों न हो जाए, उसे कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े।

इस प्रकार इस संसार में लोग अपने स्वभाव और स्वाभिमान के अनुरूप ही वस्तु को प्राप्त करना चाहते हैं।

विशेष- १. यहाँ शेर स्वाभिमानी एवं परिश्रमी व्यक्ति का और कुत्ता आलसी तथा स्वाभिमान रहित क्षुद्र व्यक्ति का प्रतीक है। २. कुत्ता हड्डी के टुकड़े को चबाने में मांस रहित होने पर भी अपने ही दांतों से निकले खून को पीकर अत्यन्त आनन्दित होता है। वह समझता है कि वह खून उस हड्डी से निकल रहा है। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. स्वल्पयोः स्नायुवस्योः अवशेषः, स्वल्पस्नायुवसावशेषः तेन मलिनम्— स्वल्प स्नायुवसावशेषमलिनम्। २. निर्गतं मांसं यस्मात् तत् (अव्ययी भाव) ३. √लभ् + क्त्वा = लब्ध्वा ४. क्षुधायाः शान्तये = क्षुधाशान्तये (षष्ठी तत्पुरुष) ५. द्वाभ्याम् पिबति इति द्विपः तम् द्विपम् ६. नि + √हन् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) ७. कृच्छे गतः, कृच्छगतः (सप्तमी तत्पुरुष) ८. सत्त्वस्य अनुरूपम् सत्त्वानुरूपम्। ९. अस्थिकं में क प्रत्यय का प्रयोग तुच्छता मात्रा की, अल्पता की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। १०. √त्यज् + क्त्वा = त्यक्त्वा ११. √वाञ्छ् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = वाञ्छति १२. सिंहः + जम्बुक = सिंहोजम्बुक (विसर्ग, हशि च) १३. अङ्के आगतः अंकागतः तम् (सप्तमी तत्पुरुष)