नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं,
भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु,
धीरं बिलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते॥२९॥
अन्वय- पिण्डदस्य (प्रति) श्वा लाङ्गूलचालनम्, अधः चरणावपातम्, भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनम् च कुरुते, गजपुङ्गवः तु धीरं विलोकयति, चाटुशतैः च भुङ्क्ते।
अनुवाद- अन्न देने वाले के (प्रति) कुत्ता पूँछ हिलाना नीचे चरणों में गिरना और भूमि पर गिरकर मुँह और पेट दिखाना (आदि क्रियाएँ) करता है। (इसके विपरीत) गजश्रेष्ठ तो धैर्यपूर्वक देखता है और सैकड़ों खुशामदों से खाता है।
व्याख्या- क्षुद्र व्यक्ति मात्र अपना पेट भरने के लिए कितनी तुच्छ क्रियाएँ करता है, इस बात को कुत्ते के उदाहरण से तथा स्वाभिमानी व्यक्ति का इसी विषय में कैसा व्यवहार होता है, इसे हाथी के उदाहरण से बताते हुए कवि कहता है कि— कुत्ता मात्र थोड़ा सा अन्न प्राप्त करने के लिए अन्न देने वाले अपने स्वामी के प्रति बार-बार पूँछ हिलाता है, उसके पैरों में गिरकर भूमि पर लेट-लेट कर अपना मुँह और पेट दिखाते हुए अनेक तुच्छ क्रियाएँ करता है, ठीक इसी प्रकार नीच लोग मात्र अपना पेट भरने के लिए धनवानों के सामने अनेक प्रकार से गिड़गिड़ाते हैं तथा उनकी अनेक प्रकार से झिड़कियाँ भी सुनते रहते हैं।
किन्तु इसके विपरीत श्रेष्ठ गजराज जब उसे भोजन दिया जाता है तो वह उस पर टूट कर नहीं पड़ता, अपितु भोजन को दूर से ही अत्यन्त धैर्य के साथ देखता है और अपने अन्नदाता महावत द्वारा अनेक प्रकार की खुशामद किए जाने पर ही स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, उस भोजन को खाता है। इसी प्रकार की क्रियाएँ स्वाभिमानी व्यक्तियों की होती हैं वे अपने स्वामी के सामने गिड़गिड़ाते नहीं, अपितु जहाँ तक होता है, प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हैं।
विशेष- १. कुत्ते और हाथी के मनोविज्ञान को अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
२. यहाँ कुत्ता निम्न स्वभाव वाले क्षुद्र व्यक्ति का तथा हाथी स्वाभिमानी व्यक्ति का प्रतीक है।
३. यहाँ अप्रस्तुत कुत्ते और हाथी के उदाहरण से प्रस्तुत क्षुद्र और स्वाभिमानी व्यक्ति की क्रियाओं की अभिव्यञ्जना की गई है। अतः अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार, लक्षण इस प्रकार है—
अप्रस्तुतस्य कथनात्, प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुतप्रशंसेयं, सारूप्यादि नियन्त्रिता॥