नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ४१
४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
५. स्वाभिमानी व्यक्ति का स्वभाव होता है कि वे भूखों भले ही मर जाए, किन्तु अपने स्वाभिमान की पूर्णरूप से रक्षा करते हैं, महाराणा प्रताप इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पिण्डम् ददाति इति पिण्डदः, तस्य पिण्डदस्य
२. लाङ्गूलस्य चालनम् इति (षष्ठी तत्पुरुष) लाङ्गूलचालनम्
३. चरणयोः अवपातम् (सप्तमी तत्पुरुष) चरणावपातम्
४. नि + √पत् + ल्यप् = निपत्य
५. अव + √पत् + घञ् = अवपातः
६. वदनं च उदरं च वदनोदरं तयोः दर्शनम् वदनोदरदर्शनम् (द्वन्द्व)
७. गजेषु पुङ्गवः गजपुङ्गवः (सप्तमी तत्पुरुष)
८. √भुज् + त (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन, आत्मने) भुङ्क्ते
९. चाटूनाम् शतैः चाटुशतैः। चाटुशतैः + च = स्तोःश्चुनाश्चुः
१०. √चल् + णिच् + ल्युट् = चालनम्
११. वि + √लोक् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विलोकयति
१२. गजपुङ्गवः + तु = गजपुङ्गवस्तु (विसर्ग— विसर्जनीयस्य सः)
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते।
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्॥३०॥
अन्वय- परिवर्तिनि संसारे कः मृतः न (कः) वा (न) जायते, येन जातेन वंशः समुन्नतिम् याति, सः (एव वस्तुतः) जातः।
अनुवाद- परिवर्तनशील संसार में कौन मरता नहीं है और कौन उत्पन्न नहीं होता है। जिसके उत्पन्न होने से वंश उन्नति को प्राप्त होता है, वही वस्तुतः उत्पन्न हुआ है।
व्याख्या- यह संसार परिवर्तनशील है, यहाँ कोई भी व्यक्ति शाश्वत नहीं है, इसीलिए जो भी यहाँ जन्म लेता है उसका मरण निश्चित ही है। ऐसी कोई भी वस्तु इस संसार में नहीं है, जिसका विनाश नहीं होता हो, किन्तु वास्तव में उसका जन्म लेना ही सार्थक है, जिसके उत्पन्न होने से उसके वंश का नाम ऊँचा होता हो, वह उन्नति को प्राप्त करे।
इसलिए इस संसार में आने के पश्चात् अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए व्यक्ति को सदा ही ऐसे कार्य करने चाहिएँ जिनसे उसका, उसके वंश का इस संसार में यश फैले।