नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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विशेष- १. जन्म लेकर पेट भरते हुए जीवित रहना ही मनुष्य का लक्ष्य नहीं होना चाहिए, अपितु उसे यहाँ अच्छे-अच्छे कार्य करने चाहिएँ, जिनसे उसका वंश का यश दिग्दिगन्त में प्रसारित हो। २. संसार का शाश्वत नियम है, जो जन्म लेता है वह मरता अवश्य है। ३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्वि चतुष्पादयोर्ह्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
४. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. परिवर्तन + इनि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) परिवर्तनि
२. √मृ + क्त = मृतः
३. √जनि (प्रादुर्भावे) + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जायते
४. √जन् + क्त = जातः (तृतीया विभक्ति, एकवचन) जातेन
५. सम् + उत् + √नम् + क्तिन् (द्वितीया विभक्ति, एकवचन) समुन्नतिम्
६. √इण् (गतौ) + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) याति
कुसुमस्तबकस्येव द्वयी वृत्ति१ र्मनस्विनः।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्यते वनेऽथवा॥३१॥
अन्वय- कुसुमस्तबकस्य इव मनस्विनः द्वयी वृत्तिः (भवति) ! (सः) सर्वलोकस्य मूर्ध्नि वा, अथवा वने विशीर्यते।
अनुवाद- पुष्प के गुच्छे के समान मनस्वी (व्यक्ति) की दो (ही) स्थितियाँ (होती हैं) (वह) या तो सभी लोगों के सिर पर (विराजमान रहता है) अथवा वन में नष्ट हो जाता है।
व्याख्या- जिस प्रकार पुष्प का गुच्छा देवताओं या अन्य व्यक्तियों द्वारा आभूषण के रूप में अपने सिर पर धारण किया जाता है या फिर अनुपयोग की स्थिति में वह अपने उत्पत्ति स्थान वन में ही खिल कर, वहीं नष्ट हो जाता है।
ठीक इसी प्रकार जो मनस्वी लोग होते हैं, वे या तो अपनी योग्यता, क्षमता आदि के कारण समाज में सर्वोच्च स्थान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं या फिर यदि समाज उनकी योग्यता का सम्मान नहीं करता है तो वैराग्य भाव को प्राप्त होकर वन का सेवन करते हैं और वहीं मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
१. द्वे गती स्तो (दो गतियाँ होती हैं)