नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ४३
विशेष- १. मनस्वी की पुष्प के गुच्छ से दी गई उपमा अत्यन्त सुन्दर है तथा भावबोध में सहायक है।
२. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
''प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।''
३. अनुष्टुप् छन्द, लक्षण पूर्ववत्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. कुसुमानां स्तबकः कुसुमस्तबकः तस्य, कुसुमस्तबकस्य
२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुंलिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) मनस्विनः
३. कुसुमस्तबकस्य + इव (गुण, आद् गुणः)
४. वि + √शॄ + णिच् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विशीर्यते
५. सर्वेषाम् लोकः सर्वलोकः तस्य सर्वलोकस्य (षष्ठी तत्पुरुष) सर्वस्य लोकस्य (अव्ययी भाव)
सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषा-
स्तान् प्रत्येव विशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव ग्रसते दिवाकरनिशाप्राणेश्वरौ भास्वरौ,
भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषीकृतः॥३२॥
अन्वय- बृहस्पतिप्रभृतयः अन्ये अपि पञ्चषाः सम्भाविताः (ग्रहाः) सन्ति, विशेषविक्रमरुचिः एषः राहुः तान् प्रति न वैरायते। भ्रातः! पश्य, शीर्षावशेषीकृतः दानवपतिः पर्वणि भास्वरौ दिवाकरनिशा- प्राणेश्वरौ द्वौ एव ग्रसते।
अनुवाद- बृहस्पति आदि दूसरे भी पाँच छः सम्मानित (ग्रह) हैं, विशेष पराक्रम में रुचि रखने वाला यह राहू उन (ग्रहों) के प्रति वैरभाव नहीं रखता। भाई! देखो, सिर रूप में अवशेष हुआ (यह) दैत्यराज पर्व पर प्रदीप्त होते हुए सूर्य और चन्द्रमा दोनों को ही ग्रसता है।
व्याख्या- तेजस्वी व्यक्ति का स्वभाव होता है कि वह अपने से शक्ति में कमजोर के साथ संघर्ष नहीं करता है, इसी बात को राहू के उदाहरण द्वारा प्रतिपादित करता हुआ कवि कहता है कि— आकाश में बृहस्पति आदि दूसरे भी पाँच, छः बड़े प्रभावशाली ग्रह विराजते हैं, किन्तु यह राहू जिसकी पराक्रम में विशेष रुचि है, उन ग्रहों के साथ शत्रुता का भाव नहीं रखता, क्योंकि यह तो अपने सत्व के अनुरूप अत्यधिक तेजस्वी सूर्य और चन्द्रमा को पूर्णिमा और अमावस्या पर्वों पर आक्रान्त करता है। यदि सूर्य और चन्द्रमा जैसे परम तेजस्वी ग्रहों के स्थान पर वह दूसरे ग्रहों को आक्रान्त करता तो उसमें उसकी किसी प्रकार की प्रशंसा की बात नहीं होती। अतः उसके लिए यह अत्यन्त गौरव की