नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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बात है कि वह प्रथम तो केवल शीर्षमात्र अवशेष है और द्वितीय उस स्थिति में भी वह दैत्यराज जीवित है तथा परम तेजस्वी, यशस्वी सूर्य और चन्द्रमा के प्रति ही पराक्रम प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि अपने से कमजोर पर बल-प्रदर्शन करना प्रशंसा का नहीं, अपितु निन्दा का कारण ही बनता है।
विशेष- १. जो केवल सिरमात्र अवशिष्ट रह कर भी इतना प्रभावशाली है, उसके सामान्य स्थिति के शौर्य की स्थिति, कल्पनातीत अभिव्यंजित हो रही है।
२. महाकवि भर्तृहरि के काल में नवग्रह की कल्पना स्थिर नहीं हो पायी थी, ऐसा प्रतीत होता है।
३. यहाँ पर्व से अभिप्राय अमावस्या और पूर्णिमा से है।
४. तेजस्वी लोगों का स्वभाव होता है कि वे छोटे अपेक्षाकृत अपने से कमजोरों के प्रति वैरभाव नहीं रखते हैं।
५. अन्यत्र भी कहा गया है— "महान् महत्येव करोति विक्रमम्।"
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण पूर्ववत्।
७. अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. सन्ति + अन्ये + अपि (यण् – इकोयणचि, पूर्वरूपं, एडः पदान्तादति)
२. प्रति + एषः (यण् – इकोयणचि) = प्रत्येषः
३. राहुः + न (विसर्ग – ससजुषोरुः) = राहुर्न
४. द्वावेव (अयादि – एचोऽयवायावः) द्वौ + एव
५. शीर्ष + अवशेष + आकृतिः (दीर्घ – अकःसवर्णे दीर्घः)
६. विशेष विक्रमे रुचिः यस्य सः, विशेषविक्रमरुचिः (बहुव्रीहि)
७. शीर्ष एव अवशेषः यस्य सः, (बहुव्रीहि) शीर्षावशेषः, (शीर्षाविशेषा तादृशी आकृतिर्यस्य सः)
८. √भास् + वरप् (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) = भास्वरौ
९. वैर + क्यङ् (य) (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वैरायते, वैरं करोति इति
१०. बृहताम् पतिः, बृहस्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
११. सम् + √भू + णिच् + क्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सम्भाविताः
१२. दानवानाम् पतिः, (षष्ठी तत्पुरुष) दानवपतिः
१३. दनोः अपत्यम् पुमान् इति दानवः
वहति भुवनश्रेणीं शेषः फणाफलकस्थितां,
कमठपतिना मध्येपृष्ठं सदा स च धार्यते।