भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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नीतिशतकम् ४५

तमपि कुरुते क्रोडाधीनं पयोधिरनादराद्,
अहह! महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः॥३३॥

अन्वय- शेषः फणाफलकस्थिताम् भुवनश्रेणीम् वहति, स चं कमठपतिना सदा मध्ये पृष्ठम् धार्यते। तम् अपि पयोधिः अनादरात् क्रोडाधीनम् कुरुते। अहह! महताम् चरित्र-विभूतयः निस्सीमानः (भवन्ति)।

अनुवाद- शेषनाग (अपने) फणरूपी फलक पर स्थित, लोकों की पंक्ति को वहन करता है और वह कूर्मराज के द्वारा सदैव पीठ के मध्य में धारण किया जाता है (और) उसे भी समुद्र तिरस्कारपूर्वक अपनी गोद में रख लेता है। अहो! महान् लोगों के कार्यों की महिमा अपार (होती है)।

व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य सीमारहित एवं कल्पनातीत होती है, इसी बात की पुष्टि में शेषनाग, कूर्मराज और समुद्र के उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि- प्रथम तो शेषनाग का चरित आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि वह चौदह भुवनों के विशाल समूह को मात्र अपने फणों के फलक पर थामे हुए है, इस आचरण से उसके सामर्थ्य और शक्ति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उससे भी बढ़कर आश्चर्य तब होता है कि उस चौदह भुवन सहित शेषनाग को भी कच्छपावतार अपनी पीठ के केवल मध्य भाग में ही धारण कर लेते हैं, किन्तु यह आश्चर्य की श्रृंखला यहीं पूरी नहीं होती, अपितु चौदहभुवन पंक्ति सहित शेषनाग एवं उन्हें धारण किए कच्छपराज को प्रलयकालीन समुद्र अत्यन्त सहज रूप में तिरस्कारपूर्वक अपनी गोद में इस प्रकार धारण कर लेता है जैसे कोई छोटी सी चीज हो।

इस प्रकार इस संसार में महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है अर्थात् इससे अधिक कार्य नहीं हो सकेगा अथवा यह अत्यन्त कठिन है ऐसा उनके विषय में नहीं कहा जा सकता है, यह सब देखकर वास्तव में अत्यन्त आश्चर्य होता है।

विशेष- १. पुराणों में उल्लेख हुआ है कि ये सम्पूर्ण लोक जिनकी संख्या चौदह बताई गई है। शेषनाग के फन पर टिके हुए हैं। उसी की ओर प्रस्तुत श्लोक में संकेत किया गया है।
२. 'अहह' अव्यय पद का यहाँ आश्चर्यातिशय की अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग हुआ है।
३. माना जाता है कि प्रलयकाल में सब कुछ जलप्लावित हो जाता है।
४. प्रस्तुत श्लोक में पूर्व-पूर्व वर्णित की अपेक्षा उत्तरोत्तर वर्णित का उत्कर्ष वर्णित होने से माला- दीपक अलंकार है। लक्षण इस प्रकार है-
मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।
५. हरिणी छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-