नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
रसयुगहयैन्सौँम्रौ स्लौ गो यदा हरिणी तदा॥
६. अर्थान्तरन्यास अलंकार का भी प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. भुवनानां श्रेणिः भुवन श्रेणिः तां भुवनानां श्रेणीम् (षष्ठी तत्पुरुष) २. कमठानां पतिः, कमठपतिः तेन कमठपतिना (षष्ठी तत्पुरुष) ३. पयस् + √धा + कि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) पयोधिः ४. न आदरात् (नञ् समास) अनादरात् ५. चरित्राणां विभूतयः (षष्ठी तत्पुरुष) चरित्रविभूतयः ६. फणा एव फलकं, तस्मिन् स्थिताम्, फणाफलकस्थिताम् ७. √धृ + णिच् + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) धार्यते ८. नास्ति सीमा यासां ताः, निःसीमानः (बहुव्रीहि) ९. पयोधिः + अनादरात् (विसर्ग, ससजुषो रुः) १०. निःसीमानः + चरित्रविभूतयः (विसर्ग, स्तोःश्चुना श्चुः) ११. √वह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)
वरं पक्षच्छेदः¹ समदमघवन्मुक्तकुलिश-
प्रहारैरुद्गच्छद्वहल² दहनोद्गारगुरुभिः।
तुषाराद्रेः सूनोरहह! पितरि क्लेशविवशे
न चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः॥३४॥
अन्वय- उद्गच्छत् - वहलदहनोद्गारगुरुभिः समदमघवन् मुक्तकुलिशप्रहारैः तुषाराद्रेः सूनोः पक्षच्छेदः वरम् (आसीत्) अहह,! पितरि क्लेशविवशे पयसाम् पत्युः पयसि च असौ सम्पातः उचितः न (आसीत्)।
अनुवाद- ऊपर उठती हुई, घनी आग की चिनगारियों से प्रबल, मदयुक्त इन्द्र द्वारा छोड़े हुए वज्र के प्रहारों के द्वारा हिमालय के पुत्र (मैनाक) के पंखों का कट जाना अच्छा (था), (किन्तु) महान् दुःख है, पिता के क्लेश से विवश होने पर जलों के स्वामी (समुद्र) के जल में वह गिरना (छिपना) उचित नहीं (था)।
व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक एक पौराणिक कथा की ओर संकेत कर रहा है, प्राचीनकाल में पर्वतों के भी पंख होते थे और वे पक्षियों के समान उड़ सकते थे, उस स्थिति में वे स्वेच्छा से कहीं भी बैठ जाते थे। जिससे धन एवं जन की अत्यधिक हानि होती थी। इससे क्रोधित इन्द्र ने उनके पंखों को अपने वज्र से काटना प्रारम्भ किया।
१. प्राणोच्छेदः (प्राणों का नष्ट होना)
२. बहुलदहनो (अत्यधिक अग्नि के)