भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 194 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

नीतिशतकम् ४७

जिस समय पर्वतराज हिमालय के पंखों को काटा जा रहा था, तभी उसका पुत्र मैनाक स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गया।

इसी घटना की ओर संकेत करते हुए कवि कहता है कि— शक्तिशाली इन्द्र के वज्र के द्वारा, पर्वतों के पंखों को काटते समय टकराने के कारण अग्नि की ऊँची-ऊँची चिनगारियाँ निकलती थी, ऐसे भयावह समय में जब पिता हिमालय के पंख काटे जा रहे थे तब उसका पुत्र मैनाक स्वयं को बचाने के लिए भाग कर समुद्र के जल में जाकर छिप गया। मैनाक के इस घृणित कार्य के प्रति ही निन्दा व्यक्त करता हुआ कवि कहता है कि भले ही मैनाक के पंख क्यों नहीं कट जाते, प्राण ही क्यों नहीं चले जाते, किन्तु उसका आपत्तिग्रस्त पिता को छोड़कर आत्मरक्षा के लिए समुद्र में जाकर छिपना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, क्योंकि पिता के आपत्ति में पड़ने पर पुत्र का कर्तव्य होता है कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने पिता की रक्षा करे।

विशेष— १. वज्र जैसी कठोर वस्तु जब पर्वतों के कठोर पंखों से टकराई तो भयावह अग्नि की ज्वालाएँ निकलने लगी तब इस रक्तपात से डरकर पुत्र मैनाक अपने प्राण बचाने के लिए समुद्र जाकर छिप गया।
२. यहाँ मनुष्य की स्वार्थमयी वृत्ति की निन्दा की गई है।
३. शिखरिणीछन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।
४. अहह, अव्यय का प्रयोग यहाँ अत्यधिक दुःख की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
५. पर्यायोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. √दह् + ल्युट् = दहन
२. उत् + √गम् + शतृ = उद्गच्छत्
३. √मुच् + क्त= मुक्तः
४. मदेन सहित समदः (अव्ययीभाव)
५. √छिद् + घञ् = छेदः
६. क्लेशेन विवशे क्लेशविवशे (तृतीया तत्पुरुष)
७. सम् + √पत् + घञ् = सम्पातः (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
८. उत् + √गृ + घञ् = उद्गारः
९. पक्षाणां छेदः (षष्ठी तत्पुरुष) पक्षच्छेदः
१०. बहलदहन + उद्गारगुरुभिः (गुण, आद् गुणः)
११. च + असौ (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१२. पत्युः + उचितः (विसर्ग - ससजुषो रुः)
१३. सूनोः + अहह (विसर्ग - ससजुषो रुः)