भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 194 में से

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पृष्ठ 70

४८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

१४. प्रहारैः + उद्गच्छद् (विसर्ग - ससजुषो रुः)

यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिं कथं सहते॥३५॥

अन्वय- सवितुः पादैः स्पृष्टः यत् अचेतनः अपि इनकान्तः प्रज्वलति, तत् तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिम् कथम् सहते।

अनुवाद- सूर्य की किरणों से स्पर्श किया गया जब अचेतन भी सूर्यकान्त मणि जल उठता है, तब (भला) तेजस्वी पुरुष दूसरे के द्वारा किए गए अपकार को किस प्रकार सहन कर सकता है।

व्याख्या- तेजस्वी व्यक्ति किसी दूसरे द्वारा किए गए अपकार को किसी भी स्थिति में सहन नहीं कर सकते हैं, इसी बात के औचित्य को सिद्ध करते हुए कवि सूर्यकान्त मणि का उदाहरण देते हुए कहता है कि जब पूरी तरह अचेतन, निष्प्राण, जड़ सूर्यकान्त मणि सूर्य जैसे तेजस्वी (व्यक्ति) के किरणों रूपी पैरों से ताडित, (अपमानित) होकर उत्तर में, अपने तेज को प्रदर्शित करते हुए प्रतिकार करती हैं।

यदि अचेतन, निष्प्राण वस्तु की यह स्थिति है तो फिर तेजस्वी व्यक्ति तो सचेतन है। अतः वह दूसरों द्वारा किए गए अपमान को कैसे सहन कर सकता है।

विशेष- १. स्वाभिमानी व्यक्ति कभी भी दूसरों द्वारा किए गए अपमान को सहन करने में असमर्थ रहता है।
२. सूर्यकान्त मणि की यह विशेषता होती है कि सूर्य की किरणों के सम्पर्क में आने पर वह जल उठती है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है—

यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥

४. यत् और तत् पदों का प्रयोग जब और तब अर्थ में हुआ है।
५. दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. यत् + अचेतनः + अपि (झलांजशोऽन्ते, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
२. √स्पृश् + क्त = स्पृष्टः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. परैःकृतम् (तृतीया तत्पुरुष) परकृतम्
४. नि + √कृ + क्तिन् (द्वितीया विभक्ति, एकवचन) निकृतिम्
५. √सह् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन, लट् लकार)

सिंहः शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिषु गजेषु।
प्रकृतिरियं सत्त्ववतां न खलु वयस्तेजसो हेतुः॥३६॥