नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
| ४२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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विशेष- १. जन्म लेकर पेट भरते हुए जीवित रहना ही मनुष्य का लक्ष्य नहीं होना चाहिए, अपितु उसे यहाँ अच्छे-अच्छे कार्य करने चाहिएँ, जिनसे उसका वंश का यश दिग्दिगन्त में प्रसारित हो। २. संसार का शाश्वत नियम है, जो जन्म लेता है वह मरता अवश्य है। ३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्वि चतुष्पादयोर्ह्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
४. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. परिवर्तन + इनि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) परिवर्तनि
२. √मृ + क्त = मृतः
३. √जनि (प्रादुर्भावे) + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जायते
४. √जन् + क्त = जातः (तृतीया विभक्ति, एकवचन) जातेन
५. सम् + उत् + √नम् + क्तिन् (द्वितीया विभक्ति, एकवचन) समुन्नतिम्
६. √इण् (गतौ) + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) याति
कुसुमस्तबकस्येव द्वयी वृत्ति१ र्मनस्विनः।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्यते वनेऽथवा॥३१॥
अन्वय- कुसुमस्तबकस्य इव मनस्विनः द्वयी वृत्तिः (भवति) ! (सः) सर्वलोकस्य मूर्ध्नि वा, अथवा वने विशीर्यते।
अनुवाद- पुष्प के गुच्छे के समान मनस्वी (व्यक्ति) की दो (ही) स्थितियाँ (होती हैं) (वह) या तो सभी लोगों के सिर पर (विराजमान रहता है) अथवा वन में नष्ट हो जाता है।
व्याख्या- जिस प्रकार पुष्प का गुच्छा देवताओं या अन्य व्यक्तियों द्वारा आभूषण के रूप में अपने सिर पर धारण किया जाता है या फिर अनुपयोग की स्थिति में वह अपने उत्पत्ति स्थान वन में ही खिल कर, वहीं नष्ट हो जाता है।
ठीक इसी प्रकार जो मनस्वी लोग होते हैं, वे या तो अपनी योग्यता, क्षमता आदि के कारण समाज में सर्वोच्च स्थान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं या फिर यदि समाज उनकी योग्यता का सम्मान नहीं करता है तो वैराग्य भाव को प्राप्त होकर वन का सेवन करते हैं और वहीं मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
१. द्वे गती स्तो (दो गतियाँ होती हैं)
नीतिशतकम् ४३
विशेष- १. मनस्वी की पुष्प के गुच्छ से दी गई उपमा अत्यन्त सुन्दर है तथा भावबोध में सहायक है।
२. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
''प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।''
३. अनुष्टुप् छन्द, लक्षण पूर्ववत्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. कुसुमानां स्तबकः कुसुमस्तबकः तस्य, कुसुमस्तबकस्य
२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुंलिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) मनस्विनः
३. कुसुमस्तबकस्य + इव (गुण, आद् गुणः)
४. वि + √शॄ + णिच् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विशीर्यते
५. सर्वेषाम् लोकः सर्वलोकः तस्य सर्वलोकस्य (षष्ठी तत्पुरुष) सर्वस्य लोकस्य (अव्ययी भाव)
सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषा-
स्तान् प्रत्येव विशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव ग्रसते दिवाकरनिशाप्राणेश्वरौ भास्वरौ,
भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषीकृतः॥३२॥
अन्वय- बृहस्पतिप्रभृतयः अन्ये अपि पञ्चषाः सम्भाविताः (ग्रहाः) सन्ति, विशेषविक्रमरुचिः एषः राहुः तान् प्रति न वैरायते। भ्रातः! पश्य, शीर्षावशेषीकृतः दानवपतिः पर्वणि भास्वरौ दिवाकरनिशा- प्राणेश्वरौ द्वौ एव ग्रसते।
अनुवाद- बृहस्पति आदि दूसरे भी पाँच छः सम्मानित (ग्रह) हैं, विशेष पराक्रम में रुचि रखने वाला यह राहू उन (ग्रहों) के प्रति वैरभाव नहीं रखता। भाई! देखो, सिर रूप में अवशेष हुआ (यह) दैत्यराज पर्व पर प्रदीप्त होते हुए सूर्य और चन्द्रमा दोनों को ही ग्रसता है।
व्याख्या- तेजस्वी व्यक्ति का स्वभाव होता है कि वह अपने से शक्ति में कमजोर के साथ संघर्ष नहीं करता है, इसी बात को राहू के उदाहरण द्वारा प्रतिपादित करता हुआ कवि कहता है कि— आकाश में बृहस्पति आदि दूसरे भी पाँच, छः बड़े प्रभावशाली ग्रह विराजते हैं, किन्तु यह राहू जिसकी पराक्रम में विशेष रुचि है, उन ग्रहों के साथ शत्रुता का भाव नहीं रखता, क्योंकि यह तो अपने सत्व के अनुरूप अत्यधिक तेजस्वी सूर्य और चन्द्रमा को पूर्णिमा और अमावस्या पर्वों पर आक्रान्त करता है। यदि सूर्य और चन्द्रमा जैसे परम तेजस्वी ग्रहों के स्थान पर वह दूसरे ग्रहों को आक्रान्त करता तो उसमें उसकी किसी प्रकार की प्रशंसा की बात नहीं होती। अतः उसके लिए यह अत्यन्त गौरव की
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बात है कि वह प्रथम तो केवल शीर्षमात्र अवशेष है और द्वितीय उस स्थिति में भी वह दैत्यराज जीवित है तथा परम तेजस्वी, यशस्वी सूर्य और चन्द्रमा के प्रति ही पराक्रम प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि अपने से कमजोर पर बल-प्रदर्शन करना प्रशंसा का नहीं, अपितु निन्दा का कारण ही बनता है।
विशेष- १. जो केवल सिरमात्र अवशिष्ट रह कर भी इतना प्रभावशाली है, उसके सामान्य स्थिति के शौर्य की स्थिति, कल्पनातीत अभिव्यंजित हो रही है।
२. महाकवि भर्तृहरि के काल में नवग्रह की कल्पना स्थिर नहीं हो पायी थी, ऐसा प्रतीत होता है।
३. यहाँ पर्व से अभिप्राय अमावस्या और पूर्णिमा से है।
४. तेजस्वी लोगों का स्वभाव होता है कि वे छोटे अपेक्षाकृत अपने से कमजोरों के प्रति वैरभाव नहीं रखते हैं।
५. अन्यत्र भी कहा गया है— "महान् महत्येव करोति विक्रमम्।"
६. शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण पूर्ववत्।
७. अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. सन्ति + अन्ये + अपि (यण् – इकोयणचि, पूर्वरूपं, एडः पदान्तादति)
२. प्रति + एषः (यण् – इकोयणचि) = प्रत्येषः
३. राहुः + न (विसर्ग – ससजुषोरुः) = राहुर्न
४. द्वावेव (अयादि – एचोऽयवायावः) द्वौ + एव
५. शीर्ष + अवशेष + आकृतिः (दीर्घ – अकःसवर्णे दीर्घः)
६. विशेष विक्रमे रुचिः यस्य सः, विशेषविक्रमरुचिः (बहुव्रीहि)
७. शीर्ष एव अवशेषः यस्य सः, (बहुव्रीहि) शीर्षावशेषः, (शीर्षाविशेषा तादृशी आकृतिर्यस्य सः)
८. √भास् + वरप् (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) = भास्वरौ
९. वैर + क्यङ् (य) (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वैरायते, वैरं करोति इति
१०. बृहताम् पतिः, बृहस्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
११. सम् + √भू + णिच् + क्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सम्भाविताः
१२. दानवानाम् पतिः, (षष्ठी तत्पुरुष) दानवपतिः
१३. दनोः अपत्यम् पुमान् इति दानवः
वहति भुवनश्रेणीं शेषः फणाफलकस्थितां,
कमठपतिना मध्येपृष्ठं सदा स च धार्यते।
नीतिशतकम् ४५
तमपि कुरुते क्रोडाधीनं पयोधिरनादराद्,
अहह! महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः॥३३॥
अन्वय- शेषः फणाफलकस्थिताम् भुवनश्रेणीम् वहति, स चं कमठपतिना सदा मध्ये पृष्ठम् धार्यते। तम् अपि पयोधिः अनादरात् क्रोडाधीनम् कुरुते। अहह! महताम् चरित्र-विभूतयः निस्सीमानः (भवन्ति)।
अनुवाद- शेषनाग (अपने) फणरूपी फलक पर स्थित, लोकों की पंक्ति को वहन करता है और वह कूर्मराज के द्वारा सदैव पीठ के मध्य में धारण किया जाता है (और) उसे भी समुद्र तिरस्कारपूर्वक अपनी गोद में रख लेता है। अहो! महान् लोगों के कार्यों की महिमा अपार (होती है)।
व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य सीमारहित एवं कल्पनातीत होती है, इसी बात की पुष्टि में शेषनाग, कूर्मराज और समुद्र के उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि- प्रथम तो शेषनाग का चरित आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि वह चौदह भुवनों के विशाल समूह को मात्र अपने फणों के फलक पर थामे हुए है, इस आचरण से उसके सामर्थ्य और शक्ति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उससे भी बढ़कर आश्चर्य तब होता है कि उस चौदह भुवन सहित शेषनाग को भी कच्छपावतार अपनी पीठ के केवल मध्य भाग में ही धारण कर लेते हैं, किन्तु यह आश्चर्य की श्रृंखला यहीं पूरी नहीं होती, अपितु चौदहभुवन पंक्ति सहित शेषनाग एवं उन्हें धारण किए कच्छपराज को प्रलयकालीन समुद्र अत्यन्त सहज रूप में तिरस्कारपूर्वक अपनी गोद में इस प्रकार धारण कर लेता है जैसे कोई छोटी सी चीज हो।
इस प्रकार इस संसार में महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है अर्थात् इससे अधिक कार्य नहीं हो सकेगा अथवा यह अत्यन्त कठिन है ऐसा उनके विषय में नहीं कहा जा सकता है, यह सब देखकर वास्तव में अत्यन्त आश्चर्य होता है।
विशेष- १. पुराणों में उल्लेख हुआ है कि ये सम्पूर्ण लोक जिनकी संख्या चौदह बताई गई है। शेषनाग के फन पर टिके हुए हैं। उसी की ओर प्रस्तुत श्लोक में संकेत किया गया है।
२. 'अहह' अव्यय पद का यहाँ आश्चर्यातिशय की अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग हुआ है।
३. माना जाता है कि प्रलयकाल में सब कुछ जलप्लावित हो जाता है।
४. प्रस्तुत श्लोक में पूर्व-पूर्व वर्णित की अपेक्षा उत्तरोत्तर वर्णित का उत्कर्ष वर्णित होने से माला- दीपक अलंकार है। लक्षण इस प्रकार है-
मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।
५. हरिणी छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-
४६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
रसयुगहयैन्सौँम्रौ स्लौ गो यदा हरिणी तदा॥
६. अर्थान्तरन्यास अलंकार का भी प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. भुवनानां श्रेणिः भुवन श्रेणिः तां भुवनानां श्रेणीम् (षष्ठी तत्पुरुष) २. कमठानां पतिः, कमठपतिः तेन कमठपतिना (षष्ठी तत्पुरुष) ३. पयस् + √धा + कि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) पयोधिः ४. न आदरात् (नञ् समास) अनादरात् ५. चरित्राणां विभूतयः (षष्ठी तत्पुरुष) चरित्रविभूतयः ६. फणा एव फलकं, तस्मिन् स्थिताम्, फणाफलकस्थिताम् ७. √धृ + णिच् + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) धार्यते ८. नास्ति सीमा यासां ताः, निःसीमानः (बहुव्रीहि) ९. पयोधिः + अनादरात् (विसर्ग, ससजुषो रुः) १०. निःसीमानः + चरित्रविभूतयः (विसर्ग, स्तोःश्चुना श्चुः) ११. √वह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)
वरं पक्षच्छेदः¹ समदमघवन्मुक्तकुलिश-
प्रहारैरुद्गच्छद्वहल² दहनोद्गारगुरुभिः।
तुषाराद्रेः सूनोरहह! पितरि क्लेशविवशे
न चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः॥३४॥
अन्वय- उद्गच्छत् - वहलदहनोद्गारगुरुभिः समदमघवन् मुक्तकुलिशप्रहारैः तुषाराद्रेः सूनोः पक्षच्छेदः वरम् (आसीत्) अहह,! पितरि क्लेशविवशे पयसाम् पत्युः पयसि च असौ सम्पातः उचितः न (आसीत्)।
अनुवाद- ऊपर उठती हुई, घनी आग की चिनगारियों से प्रबल, मदयुक्त इन्द्र द्वारा छोड़े हुए वज्र के प्रहारों के द्वारा हिमालय के पुत्र (मैनाक) के पंखों का कट जाना अच्छा (था), (किन्तु) महान् दुःख है, पिता के क्लेश से विवश होने पर जलों के स्वामी (समुद्र) के जल में वह गिरना (छिपना) उचित नहीं (था)।
व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक एक पौराणिक कथा की ओर संकेत कर रहा है, प्राचीनकाल में पर्वतों के भी पंख होते थे और वे पक्षियों के समान उड़ सकते थे, उस स्थिति में वे स्वेच्छा से कहीं भी बैठ जाते थे। जिससे धन एवं जन की अत्यधिक हानि होती थी। इससे क्रोधित इन्द्र ने उनके पंखों को अपने वज्र से काटना प्रारम्भ किया।
१. प्राणोच्छेदः (प्राणों का नष्ट होना)
२. बहुलदहनो (अत्यधिक अग्नि के)
नीतिशतकम् ४७
जिस समय पर्वतराज हिमालय के पंखों को काटा जा रहा था, तभी उसका पुत्र मैनाक स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गया।
इसी घटना की ओर संकेत करते हुए कवि कहता है कि— शक्तिशाली इन्द्र के वज्र के द्वारा, पर्वतों के पंखों को काटते समय टकराने के कारण अग्नि की ऊँची-ऊँची चिनगारियाँ निकलती थी, ऐसे भयावह समय में जब पिता हिमालय के पंख काटे जा रहे थे तब उसका पुत्र मैनाक स्वयं को बचाने के लिए भाग कर समुद्र के जल में जाकर छिप गया। मैनाक के इस घृणित कार्य के प्रति ही निन्दा व्यक्त करता हुआ कवि कहता है कि भले ही मैनाक के पंख क्यों नहीं कट जाते, प्राण ही क्यों नहीं चले जाते, किन्तु उसका आपत्तिग्रस्त पिता को छोड़कर आत्मरक्षा के लिए समुद्र में जाकर छिपना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, क्योंकि पिता के आपत्ति में पड़ने पर पुत्र का कर्तव्य होता है कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने पिता की रक्षा करे।
विशेष— १. वज्र जैसी कठोर वस्तु जब पर्वतों के कठोर पंखों से टकराई तो भयावह अग्नि की ज्वालाएँ निकलने लगी तब इस रक्तपात से डरकर पुत्र मैनाक अपने प्राण बचाने के लिए समुद्र जाकर छिप गया।
२. यहाँ मनुष्य की स्वार्थमयी वृत्ति की निन्दा की गई है।
३. शिखरिणीछन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।
४. अहह, अव्यय का प्रयोग यहाँ अत्यधिक दुःख की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
५. पर्यायोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. √दह् + ल्युट् = दहन
२. उत् + √गम् + शतृ = उद्गच्छत्
३. √मुच् + क्त= मुक्तः
४. मदेन सहित समदः (अव्ययीभाव)
५. √छिद् + घञ् = छेदः
६. क्लेशेन विवशे क्लेशविवशे (तृतीया तत्पुरुष)
७. सम् + √पत् + घञ् = सम्पातः (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
८. उत् + √गृ + घञ् = उद्गारः
९. पक्षाणां छेदः (षष्ठी तत्पुरुष) पक्षच्छेदः
१०. बहलदहन + उद्गारगुरुभिः (गुण, आद् गुणः)
११. च + असौ (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१२. पत्युः + उचितः (विसर्ग - ससजुषो रुः)
१३. सूनोः + अहह (विसर्ग - ससजुषो रुः)
४८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
१४. प्रहारैः + उद्गच्छद् (विसर्ग - ससजुषो रुः)
यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिं कथं सहते॥३५॥
अन्वय- सवितुः पादैः स्पृष्टः यत् अचेतनः अपि इनकान्तः प्रज्वलति, तत् तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिम् कथम् सहते।
अनुवाद- सूर्य की किरणों से स्पर्श किया गया जब अचेतन भी सूर्यकान्त मणि जल उठता है, तब (भला) तेजस्वी पुरुष दूसरे के द्वारा किए गए अपकार को किस प्रकार सहन कर सकता है।
व्याख्या- तेजस्वी व्यक्ति किसी दूसरे द्वारा किए गए अपकार को किसी भी स्थिति में सहन नहीं कर सकते हैं, इसी बात के औचित्य को सिद्ध करते हुए कवि सूर्यकान्त मणि का उदाहरण देते हुए कहता है कि जब पूरी तरह अचेतन, निष्प्राण, जड़ सूर्यकान्त मणि सूर्य जैसे तेजस्वी (व्यक्ति) के किरणों रूपी पैरों से ताडित, (अपमानित) होकर उत्तर में, अपने तेज को प्रदर्शित करते हुए प्रतिकार करती हैं।
यदि अचेतन, निष्प्राण वस्तु की यह स्थिति है तो फिर तेजस्वी व्यक्ति तो सचेतन है। अतः वह दूसरों द्वारा किए गए अपमान को कैसे सहन कर सकता है।
विशेष-
१. स्वाभिमानी व्यक्ति कभी भी दूसरों द्वारा किए गए अपमान को सहन करने में असमर्थ रहता है।
२. सूर्यकान्त मणि की यह विशेषता होती है कि सूर्य की किरणों के सम्पर्क में आने पर वह जल उठती है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है—
यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥
४. यत् और तत् पदों का प्रयोग जब और तब अर्थ में हुआ है।
५. दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. यत् + अचेतनः + अपि (झलांजशोऽन्ते, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
२. √स्पृश् + क्त = स्पृष्टः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. परैःकृतम् (तृतीया तत्पुरुष) परकृतम्
४. नि + √कृ + क्तिन् (द्वितीया विभक्ति, एकवचन) निकृतिम्
५. √सह् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन, लट् लकार)
सिंहः शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिषु गजेषु।
प्रकृतिरियं सत्त्ववतां न खलु वयस्तेजसो हेतुः॥३६॥
नीतिशतकम् ४९
अन्वय- सिंहः शिशुः अपि मदमलिन कपोलभित्तिषु गजेषु निपतति, खलु इयम् सत्त्ववताम् प्रकृतिः, वयः खलु तेजसः हेतुः न (भवति)।
अनुवाद- शेर का बच्चा भी मद से मलिन गण्डस्थलों वाले हाथियों पर आक्रमण करता है, निश्चय ही यह तेजस्वियों का स्वभाव (है), आयु ही तेज का कारण नहीं (होती)।
व्याख्या- पराक्रम तेजस्वी प्राणी का स्वभाव ही होता है, चाहे वह किसी भी आयु का क्यों न हो। अतः पराक्रम प्रदर्शन का सम्बन्ध आयु से नहीं, अपितु व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर है।
यही कारण है कि शेर का बच्चा अल्पायु होने पर भी छोटे-मोटे प्राणियों को अपना शिकार नहीं बनाता है, अपितु ऐसे शक्तिशाली हाथी, जिनके गण्डस्थल मदजल के निरन्तर बहने के कारण मलिन हैं, पर ही शिकार करने के लिए आक्रमण करता है।
विशेष- १. पराक्रम का सम्बन्ध आयु से नहीं, अपितु व्यक्ति या प्राणी के स्वभाव से है। २. प्रस्तुत श्लोक में आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत् है। ३. मद-शक्तिशाली एवं नवयुवक श्रेष्ठश्रेणी के हाथी की कनपटियों से निकलने वाला द्रव पदार्थ। ४. काव्यलिंग अलंकार।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. प्रकृतिः + इयम् (ससंजुषो रुः विसर्ग) प्रकृतिरियम् २. शिशुः + अपि (ससजुषो रुः, विसर्ग) शिशुरपि ३. नि + √पत् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निपतति ४. सत्त्व + मतुप् = सत्त्वत् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) ५. मदेन मलिनाः कपोलानाम् भित्तयः येषाम् तेषु ६. तेजसः + हेतुः (विसर्ग, हशि च)
मालतीकुसुमस्येव द्वे गती स्तो मनस्विनः।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य शीर्यते वन एव वा॥३७॥
अन्वय- मालती कुसुमस्य इव मनस्विनः द्वे गती स्तः। सर्वलोकस्य मूर्ध्नि वने एव वा शीर्यते।
अनुवाद- मालती पुष्प के समान मनस्वी की दो स्थितियाँ हैं। (वह या तो) सभी लोगों के ऊपर (रहता है) या (फिर) वन में ही नष्ट हो जाता है।
व्याख्या- जो लोग स्वाभिमानी होते हैं, उनकी स्थिति मालती के फूल के समान दो प्रकार की होती है— जिस प्रकार पुष्प, देवता आदि के मस्तक पर आरूढ होकर सम्मान
५० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
प्राप्त करता है या फिर वन में ही नष्ट हो जाता है। ठीक उसी प्रकार या तो वह सम्पूर्ण समाज अथवा राष्ट्र में सर्वोपरि पद पर रहकर शासन करते हुए सम्मान प्राप्त करता है अथवा फिर वह वैराग्य भावना से युक्त होकर वन में ही तपस्या करता हुआ प्राण त्याग देता है और संसार के लोग उसे जान भी नहीं पाते हैं।
विशेष- १. मनस्वी व्यक्ति की उपमा मालती पुष्प के साथ दी गई है। अतः उपमालंकार-लक्षण-
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
२. मनस्वी लोगों की विशेषता है कि वे निकृष्ट जीवन की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेष्ठ समझते हैं। ३. स्वाभिमानी व्यक्ति के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है। ४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है-
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्रलघुपञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मनस् + विनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) मनस्विनः २. सर्वेषाम् लोकः सर्वलोकः तस्य सर्वलोकस्य ३. $\sqrt{\text{शृ}}$ + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शीर्यते
एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्।
क्रियते भास्करेणेव परिस्फुरिततेजसा१॥३८॥
अन्वय- परिस्फुरिततेजसा भास्करेण इव एकेन अपि शूरेण हि महीतलम् पादाक्रान्तम् क्रियते।
अनुवाद- प्रखर तेज से युक्त सूर्य के समान अकेले शूर के द्वारा भी निश्चय ही (सम्पूर्ण) पृथ्वी तल पादाक्रान्त कर लिया जाता है।
व्याख्या- जिस प्रकार देदीप्यमान तेज से युक्त सूर्य अपनी किरणों से सम्पूर्ण संसार को आक्रान्त कर लेता है, ठीक उसी प्रकार एक अकेला शूरवीर भी अपनी शक्ति, तेज एवं यश के द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीतल को आक्रान्त कर लेता है अर्थात उसका प्रभाव सम्पूर्ण संसार में सूर्य के समान प्रसारित होता है।
विशेष- १. शूरवीर की उपमा सूर्य के साथ दी गई है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'पाद' पद में श्लेष है, सूर्य के पक्ष में इसका अर्थ 'किरण' होगा तथा शूर के पक्ष में इसका 'चरण' अर्थ होगा। अतः श्लेष अलंकार है। लक्षण है-
१. स्फारस्फुरित
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
नीतिशतकम् ५१
श्लिष्टैः पदैरनेकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. पादैः आक्रान्तम् (तृतीया तत्पुरुष) पादाक्रान्तम्
२. आ + √क्रम् + क्त = आक्रान्तम्
३. परि + √स्फुर् + क्त = परिस्फुरितम्
४. परिस्फुरितं तेजो यस्य सः, तेन परिस्फुरित तेजसा (बहुव्रीहि)
५. √कृ + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) क्रियते
६. भास्करेण + इव (आद् गुणः) (अ + इ = ए)
७. एकेन + अपि (अकः सवर्णे दीर्घः, अ + अ = आ)
लज्जागुणौघजननीं जननीमिव स्वां,
अत्यन्तशुद्धहृदयामनुवर्तमानम्।
तेजस्विनः सुखमसूनपि सन्त्यजन्ति,
सत्यव्रतव्यसनिनो च पुनः प्रतिज्ञाम्॥३९॥
अन्वय— सत्यव्रतव्यसनिनः, तेजस्विनः असून् अपि सुखम् सन्त्यजन्ति, पुनः अत्यन्त-शुद्धहृदयम् अनुवर्तमानम् जननीम् इव लज्जागुणौघजननीम् स्वाम् प्रतिज्ञाम् न त्यजन्ति।
अनुवाद— सत्यव्रत में रुचि रखने वाले, तेजस्वी (लोग) प्राणों को भी सुखपूर्वक छोड़ देते हैं, किन्तु (वे) अत्यन्त शुद्ध हृदय वाली, अनुकूल आचरण करने वाली, माता के समान लज्जा आदि गुणों के समूह को उत्पन्न करने वाली, अपनी प्रतिज्ञा को नहीं छोड़ते हैं।
व्याख्या— इस संसार में जो लोग सदा सत्यभाषण का व्रत लिए हुए हैं तथा तेजस्वी और स्वाभिमानी हैं, दृढ़प्रतिज्ञ वे, भले ही प्राण क्यों न चले जाएँ, कितना भी कष्ट क्यों न हो स्वयं द्वारा की गयी प्रतिज्ञा का अत्यन्त शुद्ध हृदय वाली, अनुकूल आचरण करने वाली माता के समान, कभी भी त्याग नहीं करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि दृढ़प्रतिज्ञ लोग अपने वचन का पालन करते के लिए प्राणों की भी परवाह नहीं करते और लज्जा आदि गुणों की समूह अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा हृदय से प्रेम करने वाली, अनुकूल आचरण करने वाली माँ के समान पूरे मनोयोग से करते हैं।
| ५२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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विशेष- १. श्रेष्ठ पुरुषों के लिए अपने वचनों का पालन किया जाना अत्यन्त प्रशंसनीय है।
२. अन्यत्र भी कहा गया है— अंगीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।
३. प्रतिज्ञा को माता के समान सदैव प्राणों की बलि देकर भी रक्षा के योग्य बताया गया है।
४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
५. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।
६. अन्यत्र भी कहा गया है— रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाएँ पर वचन न जाई।
७. 'असु' प्राणवाची शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है।
८. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सत्यव्रत व्यसन + इनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सत्यव्रतव्यसनिनः २. तेजस् + वनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) तेजस्विनः ३. अत्यन्तं शुद्धं हृदयं यस्याः सा, ताम् (बहुव्रीहि) अत्यन्तशुद्धहृदयाम् ४. अनु + √वृत् + शानच् + टाप् = अनुवर्तमाना ताम् ५. लज्जा च गुणाश्च, लज्जागुणाः, तेषाम् लज्जागुणानाम् ओघः, लज्जागुणौघः तस्य जननी, लज्जागुणौघजननी ताम् लज्जागुणौघजननीम्।
अर्थ पद्धतिः
जातिर्यातु रसातलं गुणगणैस्तस्याप्यधो गच्छतु,
शीलं शैलतटात्पतत्वभिजनः सन्दह्यतां वह्निना।
शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्तु नः केवलं,
येनैकेन विना गुणास्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे॥४०॥
अन्वय- जातिः रसातलं यातु, गुणगणः तस्य अपि अधः गच्छतु, शीलम् शैलतटात् पततु, अभिजनः वह्निना संदह्यताम्, वैरिणि शौर्ये आशु वज्रम् निपततु, नः तु केवलम् अर्थः अस्तु, येन एकेन विना इमे समस्ताः गुणाः तृणलवप्रायाः सन्ति।
अनुवाद- (भले ही) जाति पाताल में चली जाए, गुणों का समूह उससे भी नीचे चला जाए, श्रेष्ठ स्वभाव पर्वत की चोटी से गिर पड़े, उच्चकुल अग्नि से जल जाए, शत्रु शूरता पर शीघ्र ही वज्र गिर जाए, किन्तु हमारे पास तो केवल धन हो, जिस एक के बिना ये सारे गुण तिनके के एक अंश मात्र के बराबर हैं।
नीतिशतकम् ५३
व्याख्या- इस संसार में जाति, गुण, शील, उच्चकुल, शौर्य, आदि सभी गुण पूर्णतया निरर्थक है, यदि व्यक्ति के पास धन नहीं है, इसी का प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में करते हुए कवि कहता है कि—
मैं नहीं चाहता कि मैं उच्च जाति में उत्पन्न होऊँ, जाति जाए भाड़ में (पाताल में) ठीक इसी प्रकार तुम गुणों की बात करते हो, एक गुण ही नहीं, अपितु इस संसार में जितने भी गुणों का समूह है वह सारा ही, पाताल से भी नीचे यदि कोई लोक है तो वहाँ चला जाए मुझे उनसे भी कुछ लेना देना नहीं है।
शील की बात करते हो, वह भी पर्वत की चोटी से गिरकर नष्ट हो जाए, मेरा उसके प्रति भी कोई मोह नहीं है। उच्चकुल, नहीं चाहिए मुझे, जल जाए आग में वह भी, वीरता भी मुझे नहीं चाहिए मैं तो कहता हूँ कि वीरता नामक तत्त्व पर वज्र ही क्यों न गिर जाए, उसका अस्तित्व ही नष्ट क्यों न हो जाए।
तब प्रश्न उठता है कि तुम्हें ये सब यदि नहीं चाहिएँ तो फिर चाहते क्या हो ? कवि कहता है कि मुझे तो केवल धन चाहिए। जिस एक के बिना ऊपर बताए गए सारे गुण तिनके के समान तुच्छ हैं। अतः इस संसार में एकमात्र धन की ही महिमा है, अन्य गुणों की नहीं।
विशेष- १. एकमात्र धन को ही सर्वोच्च प्रतिपादित किया गया है। २. जाति, कुल, गुण, शील एवं शौर्य आदि गुणों के प्रति उपेक्षा प्रतिपादित की गई है! ३. वैरिणि पद का प्रयोग शूरता के लिए गाली के रूप में किया गया है। ४. विना के योग में एकेन में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। ५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण इस प्रकार है— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ६. काव्यलिंग एवं उपमालंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. गुणानाम् गणः (षष्ठी तत्पुरुष) गुणगणः २. वैर + इनि = वैरिन्, तस्मिन् वैरिणि ३. शूर + ष्यञ् = शौर्य तस्मिन् शौर्ये (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ४. √गम् + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गच्छतु ५. शैलस्य तटात् (षष्ठी तत्पुरुष) शैलतटात् ६. सम् + √दह् + णिच्, संदह्यताम्
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः।
स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
५४ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्
स एव वक्ता स च दर्शनीयः,
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते॥४१॥
अन्वय- यस्य वित्तम्, सः नरः कुलीनः अस्ति, सः पण्डितः, सः श्रुतवान्, (सः) गुणज्ञः, सः एव वक्ता, सः च दर्शनीयः (अस्ति)। सर्वे गुणाः काञ्चनम् आश्रयन्ते।
अनुवाद- जिसके पास धन (है), वह व्यक्ति कुलीन (है), वह पण्डित (है), वह शास्त्रज्ञ (है), (वह) गुणों को जानने वाला है, वही वक्ता (है) और वह दर्शन के योग्य है। सभी गुण सोने के आश्रित होते हैं।
व्याख्या- इस संसार में जिस व्यक्ति के पास धन है उसके कुलादि को कोई भी व्यक्ति नहीं देखता अथवा यों कहें कि धन के कारण वह उच्चकुल वाले के समान देखा जाता है, भले ही निम्न कुल में उत्पन्न क्यों न हुआ हो। लोगों की दृष्टि में वह सबसे बड़ा पण्डित और शास्त्रों को जानने वाला विद्वान् होता है।
इसी धन के कारण वह सबसे बड़ा गुणों का पारखी होता है, वक्तृत्व कला का ज्ञाता और दर्शन को योग्य अर्थात् सुन्दर भी वही है जो ऐश्वर्य सम्पन्न है। वास्तव में लोक में यही देखा जाता है कि यदि व्यक्ति के पास धन है तो उपरोक्त सभी गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं, भले ही इनमें से एक भी उसके पास नहीं हो।
अतः संक्षेप में यही कहना उचित प्रतीत होता है कि सभी गुण एकमात्र सोने में ही निवास करते हैं।
विशेष-
१. मनुष्य को इन गुणों की परवाह न करके अपने जीवन का लक्ष्य केवल धन के अर्जन को ही बनाना चाहिए।
२. धन के सामने उक्त सभी गुण पूर्णतया निरर्थक हैं।
३. धन के अभाव में उपर्युक्त गुणों का होते हुए भी कोई महत्त्व नहीं है।
४. प्रस्तुत श्लोक में असम्बन्ध में भी सम्बन्ध का कथन किया गया है। अतः अतिशयोक्ति अलंकार है। लक्षण इस प्रकार है—
सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते।
५. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है। इस छन्द में उपेन्द्रवज्रा एवं इन्द्रवज्रा दोनों संयुक्त रूप से रहते हैं।
यत्र द्वयोरप्यनयोस्तु पादा भवन्ति मेघाजितवादि बुद्धे।
विद्वद्भिराद्यैः परिकीर्तिता सा प्रयुज्जतामित्युपजातिरेषा॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. कुल + ख (ईन) (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = कुलीनः
२. पण्डा + इतच् (पुंलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = पण्डितः
३. श्रुत + मतुप् (पुंलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = श्रुतवान्
नीतिशतकम् ५५
४. गुण + ज्ञा + क (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = गुणज्ञः ५. √वच् + तृच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = वक्ता ६. √दृश् + अनीयर् ((पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = दर्शनीयः ७. आ + √श्रि + णिच् (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) ८. √विद् + क्त = वित्तम् ९. श्रुतम् अस्य अस्ति इति, श्रुतवान् १०. यस्य + अस्ति = (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) = यस्यास्ति ११. यहाँ सर्वत्र सः के विसर्गों का लोप "एतत्तदोः सुलोपोऽकोर नञ् समासे हलि" इत्यादि सूत्र से हुआ है। १२. स एव में विसर्ग का लोप "सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम्" सूत्र से हुआ है।
दौर्मन्त्र्यान्नृपति र्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालनात्,
विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्।
ह्रीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्,
मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात् त्यागात्प्रमादाद् धनम्॥४२॥
अन्वय- दौर्मन्त्र्यात् नृपतिः, सङ्गात् यतिः, लालनात् सुतः, अनध्ययनात् विप्रः, कुतनयात् कुलम्, खलोपासनात् शीलम्, मद्यात् ह्रीः, अनवेक्षणात् कृषिः, अपि प्रवासाश्रयात् स्नेहः, अप्रणयात् मैत्री, अनयात् समृद्धिः, त्यागात् च धनम् विनश्यति।
अनुवाद- अनुचित सलाह से राजा, (विषयों के) सङ्ग से सन्यासी, लाड़-प्यार से पुत्र, अनध्ययन से ब्राह्मण, कुपुत्र से वंश, दुष्टों की संगति से सदाचार, मदिरा से लज्जा, देखभाल न करने से खेती भी, विदेश में रहने से प्रेम, प्रेम के अभाव में मित्रता, अनीति से समृद्धि, त्याग और आलस्य से धन नष्ट हो जाता है।
व्याख्या- यदि राजा को गलत सलाह देने वाले मन्त्री मिल जाएँ तो वह नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार यदि सन्यासी इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाए अर्थात् सांसारिक भोगों में लिप्त हो जाए तो वह नष्ट हो जाता है। यदि पुत्र को बहुत अधिक लाड़-प्यार दिया जाए तो वह बिगड़ जाता है अर्थात् गलत मार्ग पर चल कर नष्ट हो जाता है।
यदि ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन न करे तो उसका प्रभाव ज्ञान के अभाव में कम होने के कारण, वह नष्ट हो जाता है। यदि वंश में बुरी आदतों वाला, दुष्टों की संगति में रहने वाला पुत्र रहे तो वह कुल ही नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार यदि व्यक्ति दुष्टों की संगति में रहता है तो उसका सदाचरण नष्ट हो जाता है अर्थात् वह दुराचरण करने लगेगा।
यदि व्यक्ति शराब पी ले तो उसकी लज्जा नष्ट हो जाती है, वह किसी भी गलत
५६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
कार्य करने में तनिक भी शर्म अनुभव नहीं करेगा और इसी प्रकार खेती की देखभाल यदि नियमित रूप से न की जाए तो वह खेती भी नष्ट हो जाती है।
इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति विदेश में रहने लगता है तो दूर रहने का कारण उसके अपने प्रियजनों का प्रेम धीरे-धीरे उसके साथ कम होकर अन्त में समाप्त ही हो जाएगा और यदि एक मित्र दूसरे मित्र से अत्यधिक प्रेम करता हो और दूसरा मित्र उसके साथ बराबर प्रेम प्रदर्शित नहीं करे तो वह मित्रता भी नष्ट हो जाती है।
इसी प्रकार यदि व्यक्ति अनीतिपूर्वक आचरण करता है तो उसका ऐश्वर्य, समृद्धि सब कुछ नष्ट हो जाता है और अन्त में कवि कहता है कि यदि धन का निरन्तर व्यर्थ में त्याग किया जाए अर्थात् उसे खर्च किया जाए और कमाने में आलस्य भी करें तो कितना भी बड़ा खजाना क्यों न हो, वह भी नष्ट हो जाता है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में अत्यन्त सुन्दर शैली में व्यक्ति को सावधान रहने के लिए कहा गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में प्रतिपादित बातें अत्यन्त व्यावहारिक एवं सत्य हैं।
३. प्रस्तुत श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण-
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. काव्यलिंग एवं दीपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. नृणाम् पतिः, नृपतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
२. √सञ्ज् + घञ् = सङ्गः तस्मात् सङ्गात् (पंचमी विभक्ति, एकवचन)
३. अधि + √इ + ल्युट् = अध्ययनं, न अध्ययनं इति, अनध्ययनं, तस्मात् = अनध्ययनात् (नञ् समास)
४. कुत्सितः तनयः इति कुतनयः तस्मात् कुतनयात् (अव्ययीभाव)
५. खलस्य उपासनम्, खलोपासनम्, तस्मात् खलोपासनात् (षष्ठी तत्पुरुष)
६. उप + √आस् + ल्युट् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) उपासनात्
७. न अवेक्षणात् इति (नञ् समास) अनवेक्षणात्
८. अव + √ईक्ष् + ल्युट् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) अवेक्षणात्
९. प्रवासस्य आश्रयात्, प्रवासाश्रयात् (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. प्र + √वस् + घञ् = प्रवासः, तस्मात् प्रवासात् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन)
११. आ + √श्रि + अच् = आश्रयः, तस्मात् आश्रयात् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन)
१२. √स्नेह् + घञ् = स्नेहः
१३. न प्रणयः इति अप्रणयः, तस्मात् अप्रणयात् (नञ् समास)
१४. √नी + अच् = नयः। प्र + √मद् + घञ् = प्रमादः
नीतिशतकम् ५७
दानं भोगो नाशः तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥४३॥
अन्वय- वित्तस्य तिस्रः गतयः भवन्ति, दानम्, भोगः, नाशः च। यः न ददाति, न भुङ्क्ते, तस्य (धनस्य) तृतीया गतिः भवति।
अनुवाद- धन की तीन स्थितियाँ होती है— दान, भोग (और) नाश। जो (व्यक्ति) न देता है, न भोगता है, उस (धन) की तीसरी गति होती है।
व्याख्या- धन की तीन स्थितियाँ होती है— प्रथम दान देना, द्वितीय उसका भोग करना और तृतीय विनाश। यदि व्यक्ति के पास धन है तो उसे उसका यथाशक्ति जरूरतमंदों को, निर्धनों को दान अवश्य करना चाहिए और अपनी सामर्थ्य के साथ उसका स्वयं के लिए एवं अपने परिवार के लिए अधिक से अधिक भोग भी करना चाहिए।
किन्तु यदि व्यक्ति के पास धन है और वह उसे न तो याचकों को दान देता है और न ही उसका स्वयं भोग ही करता है, तो फिर उस धन की तीसरी गति अर्थात् विनाश ही होता है। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।
विशेष-
१. प्रस्तुत श्लोक में धन की तीन गतियों का उल्लेख किया गया है।
२. व्यक्ति को यदि उसके पास धन है तो खुले मन से उसका दान और उपभोग करना चाहिए। अन्यथा उसका विनाश सुनिश्चित है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
यस्या पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √गम् + क्तिन् = गतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) गतयः
२. √दा + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = दानम्
३. √भुज् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = भोगः
४. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = नाशः
५. √भू + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = भवन्ति
६. √दा + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = ददाति
मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेति निहतो,
मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः।
कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालवनिता, ¹
¹ बालललना— अर्थ वही होगा।
५८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः॥४४॥
अन्वय- शाणोल्लीढः मणिः, हेति निहतः समरविजयी, मदक्षीणः नागः, शरदि श्यान-पुलिनाः सरितः, कलाशेषः चन्द्रः, सुरतमृदिता बालवनिता, अर्थिषु गलितविभवाः जनाः च तनिम्नाः शोभन्ते।
अनुवाद- शाण पर चढ़ाया हुआ मणि, शस्त्रों से घायल युद्ध-विजयी, मद से दुर्बल हाथी, शरद् (ऋतु) में सूखे तटों वाली नदियाँ, एक कलामात्रे अवशिष्ट चन्द्रमा, सम्भोग द्वारा मर्दन की गई बाला स्त्री और याचकों में नष्ट हो गया है ऐश्वर्य जिनका, ऐसे लोग (ये सब) कृशता में ही शोभित होते हैं।
व्याख्या- चमक एवं सुन्दरता बढ़ाने के लिए शाण पर चढ़ाया हुआ हीरा आदि मणि यद्यपि खरादने से पतला (दुर्बल) हो जाता है, किन्तु फिर भी वह अच्छा लगता है। इसी प्रकार युद्ध में शत्रु के शस्त्रों से घायल, किन्तु विजय को प्राप्त हुआ वीर अत्यन्त कमजोर अवस्था में भी सुन्दर प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त निरन्तर मद के स्राव से दुर्बल हुए हाथी की सुन्दरता देखते ही बनती है, क्योंकि यह मद-पंक्ति इस बात का प्रमाण है कि भले ही अब यह हाथी कमजोर हो गया हो, किन्तु एक समय यह अत्यन्त शक्तिशाली और उच्चकोटि का रहा है।
इसीप्रकार यद्यपि शरद् ऋतु में नदियों के तटों पर दूर-दूर तक रेत दिखाई देता है और जलप्रवाह सीमित विस्तार में रह जाता है, किन्तु फिर भी अपनी पूर्व समृद्धि की स्मृति के साथ इस दशा में भी वे दर्शनीय लगते हैं।
ऐसे ही दूज का चन्द्रमा जिसकी एक कला मात्र ही शेष है, निर्बल दशा में पतला सा भी सुन्दर लगता है। ठीक इसी प्रकार सम्भोग के बाद दुर्बल एवं शिथिल हुई भी बाल स्त्री, कम आयु वाली बाला स्त्री, आकर्षक एवं मनमोहक प्रतीत होती है।
ठीक इसी प्रकार ऐसे लोग जिनका ऐश्वर्य याचकों को देने से समाप्त हो गया है, निर्धन अवस्था में भी (अर्थात् दुर्बल भी) सुन्दर प्रतीत होते हैं। इस प्रकार ये सब निम्न अवस्था में भी सुन्दर लगते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में वस्तुतः उन सबको गिनाया गया है, जो दुर्बल अवस्था में भी आकर्षक प्रतीत होते हैं। २. यदि दान देने से व्यक्ति धनहीन भी हो जाता है तो उसके आंकर्षण व सम्मान में कमी नहीं आती है, अपितु वृद्धि ही होती है। ३. दाने देना धन का सर्वाधिक उत्तम उपयोग है। ४. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
नीतिशतकम् ५९
५. यहाँ अप्रस्तुत मणि आदि का प्रस्तुत मनुष्यों के साथ एक धर्मरूप सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— ‘‘अप्रस्तुतप्रस्तुतयोर्दीपकन्तु निगद्यते।।’’
व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. उत् + √लिह् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) २. हेतिभिः निहतः = हेतिनिहतः (तृतीया तत्पुरुष) √हन् + क्तिन् ३. नि + √हन् + क्त = निहतः ४. वि + √जि + अच् = विजय + इनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √क्षि + क्त = क्षीणः ६. श्यानानि पुलिनानि यासां ता, श्यानपुलिनाः (बहुव्रीहि) ७. √श्यै + क्त = श्यानः ८. कला एव शेषः यस्यः सः = कलाशेषः (बहुव्रीहि) ९. गलिताः विभवाः येषां ते, गलितविभवाः (बहुव्रीहि) १०. तनु + इमनिच् = तनिमन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन) तनिम्ना ११. सुरते मृदिता सुरतमृदिता (सप्तमी तत्पुरुष) १२. मदेन क्षीणः मदक्षीणः (तृतीया तत्पुरुष)
परिक्षीणः कश्चित् स्पृहयति यवानां प्रसृतये, स पश्चात् सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसमाम्। अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्थेषु धनिनां, अवस्था वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च॥४५॥
अन्वय- (कदापि) कश्चित् परिक्षीणः यवानाम् प्रसृतये स्पृहयति। पश्चात् सम्पूर्णः सः (एव) धरित्रीम् तृणसमाम् गणयति। अतः अनैकान्त्यात् धनिनाम् अवस्था अर्थेषु गुरुलघुतया वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च।
अनुवाद- (कभी) कोई दरिद्र धान की अंजलि के लिए लालायित होता है, बाद में (धन से) परिपूर्ण वही (सम्पूर्ण) पृथिवी को तिनके के समान मानता है। अतः धनों में अनेक अवस्था वाला होने के कारण धनवानों की अवस्था छोटी बड़ी होने का कारण, वस्तुओं को घटाती और बढ़ाती रहती है।
व्याख्या- व्यक्ति गरीबी की अवस्था में यह विचार करता है कि काश मुझे आज पेट भरने के लिए कोई मुट्ठी भर धान दे दे। इस स्थिति में उसके लिए मुट्ठी भर चावल का अत्यधिक महत्त्व होता है, किन्तु वही व्यक्ति, समय के परिवर्तन के साथ यदि धनाढ्य अथवा राजा बन जाता है तो सारी धरती को तिनके के समान तुच्छ मानने लगता है। इसी आकस्मिक परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है कि—
६० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
वास्तव में इस संसार की कोई भी वस्तु न तो महत्त्वपूर्ण है और न ही महत्त्वहीन, अपितु यदि उससे मनुष्य की आवश्यकता पूरी होती है तो उसके लिए महत्त्व की है और यदि उससे उसकी आवश्यकता पूरी नहीं होती तो वह उसके लिए महत्त्वहीन होती है।
अतः धन की कोई स्थिति अथवा मूल्य नहीं, अपितु उसके प्रति व्यक्ति की कितनी चाह है वही उसके महत्त्व को घटाती बढ़ाती रहती है। इसलिए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि व्यक्ति की अपनी अवस्था ही जो दुर्बल और सबल अनेक रूपों वाली होती है, छोटी या बड़ी होने का कारण वस्तुओं के महत्त्व को घटाती या बढ़ाती रहती है। वस्तु का स्वयं में कोई महत्त्व नहीं होता।
विशेष– १. यह बात पूर्णतः सत्य है कि भूखे के लिए रोटी का जो महत्त्व है, वह पेट भरे हुए व्यक्ति के लिए नहीं।
२. मनुष्य की दृष्टि धनों के प्रति सदैव एक जैसी नहीं होती, बदलती रहती है, इसी का कथन प्रस्तुत श्लोक में हुआ है।
३. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. संसार की वस्तुओं का अपना कोई मूल्य नहीं, उसका मूल्य मनुष्य की दृष्टि पर निर्भर है।
५. दीपक एवं काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. परि + √क्षि + क्त = परिक्षीणः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
२. प्र + √सृ + क्तिन् = प्रसृतिः (स्त्रीलिंग, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन) प्रसृतये
३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति
४. एकान्तस्य भावः एकान्त्यम्, न एकान्त्यम्, अनैकान्त्यम् तस्मात्— अनैकान्त्यात् (नञ् तत्पुरुष)
५. गुरु च लघु च तयोः भावः गुरुलघुता, तया गुरुलघुतया
६. गुरुलघु + तल् = गुरुलघुता
७. सम् + √कुच् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) संकोचयति
८. सम्पूर्णः + गणयति (विसर्ग, हशि च)
९. गुरुलघुतया + अर्थेषु (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)
१०. √पृथु (विस्तरणे) + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रथयति
११. तृणेन समाम् तृणसमाम् (तृतीया तत्पुरुष)
नीतिशतकम् ६१
राजन् दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमेतां,
तेनाद्य वत्समिव लोकममुं पुषाण।
तस्मिंश्च सम्यगनिशं परिपोष्यमाणे,
नाना फलं^१ फलति कल्पलतेव भूमिः॥४६॥
अन्वय- (हे) राजन्! यदि (त्वम्) एताम् क्षितिधेनुम् दुधुक्षसि, तेन अमुम् लोकम् अद्य वत्सम् इव पुषाण। तस्मिन् अनिशम् सम्यक् परिपोष्यमाणे (एषा) भूमिः कल्पलता इव नानाफलैः फलति।
अनुवाद- (हे) राजन्, यदि (तुम) इस पृथिवी रूपी गाय को दुहना चाहते हो (तो) उसके लिए इस प्रजा को आज बछड़े के समान पुष्ट करो और उसके निरन्तर ठीक प्रकार परिपुष्ट होने पर (यह) भूमि कल्पलता के समान अनेक फलों को निष्पादित करती है।
व्याख्या- ऐसे राजा को जो सदा ही प्रजा का शोषण करता रहता है, सम्बोधित करते हुए कवि कहता है कि— हे राजन्, यदि तुम इस पृथिवी रूपी गाय से अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त करना चाहते हो तो पहले इस प्रजा रूपी बछड़े की ठीक प्रकार सेवा-सुश्रूषा करो, क्योंकि इस बछड़े के संतुष्ट एवं पुष्ट होने पर ही यह पृथिवी तुम्हें कल्पलता के समान अनेक फलों को बिना माँगे ही प्रदान करेगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रजा के प्रसन्न और संतुष्ट होने पर ही राजा को उससे ठीक प्रकार करादि की प्राप्ति होती है। जो राजा की आय का प्रमुख साधन है। प्रजा भी उस स्थिति में मन से परिश्रम करेगी और अनेक प्रकार के उत्पादों को इस धरती से प्राप्त करेगी। इसलिए राजा की सुख समृद्धि के लिए प्रथम प्रजा का सुखी और समृद्ध होना आवश्यक है।
अतः प्रजा पर कर वसूली में बल प्रदर्शन की अपेक्षा पहले उनकी कठिनाइयों को दूर करना तथा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करके उन्हें प्रसन्न करना अनिवार्य है, तभी राजा भी स्थिर, सुखी तथा समृद्ध हो सकता है।
विशेष-
१. 'क्षितिधेनुम्' में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः
२. प्रजा की बछड़े के साथ तथा पृथिवी की कल्पलता के साथ उपमा दी गई है। अतः उपमा अलंकार—
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
३. अत्यन्त सुन्दर राजनीतिक तथ्य को उद्घाटित किया गया है।
४. यहाँ वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
१. नानाफलैः— अनेक फलों के द्वारा